International Women's Day 2021: जानें छत्तीसगढ़ में रहने वालीं एक कैंसर सरवाइवर के बारे में, करती हैं खेती किसानी

पूनम (बदला हुआ नाम) कहती हैं, मेरी मां को भी ब्रेस्ट कैंसर हुआ था.

पूनम (बदला हुआ नाम) कहती हैं, मेरी मां को भी ब्रेस्ट कैंसर हुआ था.

International Women's Day 2021: अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर, मिलिए एक ऐसी महिला कैंसर सरवाइवर (Cancer Survivor) से, जो खेती किसानी करती हैं. इन्होंने लास्ट स्टेज में पहुंच चुके ब्रेस्ट कैंसर (Breast Cancer) को मात दी है.

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International Women's Day 2021: अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर आइए आपको मिलवाते हैं 65 वर्षीय एक ऐसी महिला से जो कैंसर सरवाइवर हैं. इन्होंने कैंसर से जंग लड़ते हुए अपने शरीर का एक अंग तो गवां दिया है, लेकिन इस जंग को जीत लिया है. फ़िलहाल वह बिलकुल ठीक हैं और छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के कोमड़ो गांव में खेती-किसानी करते हुए बेहतर जीवन जी रही हैं.

लास्ट स्टेज के ब्रेस्ट कैंसर से जीती है जंग

कैंसर सरवाइवर पूनम (बदला हुआ नाम) बताती हैं, बुखार, खुजलाहट और खाने-पीने में हो रही दिक्कतों को काफी दिनों तक बर्दाश्त करने के बाद, जब मैं  डॉक्टर के पास पहुंची और टेस्ट करवाए तो पता चला की मुझे ब्रेस्ट कैंसर है, वो भी लास्ट स्टेज का. इतना सुनने के बाद से ही मुझे घबराहट होने लगी थी. उस पर डॉक्टर ने कहा कि आप बीस दिनों की मेहमान है. फ़ौरन ऑपरेशन करवाइये. सोचिये क्या बीती होगी मुझ पर. लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी और ऑपरेशन करवाया. एक ऑपरेशन मेरा रांची में हुआ और दूसरा मुंबई में. साल 2013  में हुए  दूसरे ऑपरेशन के बाद मेरा दाहिना स्तन शरीर से अलग कर दिया गया था. जिसके बाद से मुझे कैंसर से निजात मिल गयी थी. मैं बिलकुल ठीक महसूस करती हूं. लेकिन मेरा ट्रीटमेंट और चेकअप अभी एक साल पहले तक होता रहा है, जिससे दोबारा मुझे कोई दिक्कत न होने पाए. लेकिन कोरोना की वजह से मैं पिछले एक साल से चेकअप करवाने मुंबई नहीं जा सकी हूं.



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मां को भी था ब्रेस्ट कैंसर

पूनम (बदला हुआ नाम) कहती हैं, मेरी मां को भी ब्रेस्ट कैंसर हुआ था. उन्होंने भी कैंसर से लम्बी लड़ाई लड़ी थी, लेकिन वो इस जंग को जीत नहीं सकी थीं. मैं खुशकिस्मत हूं, जो कैंसर के लास्ट स्टेज तक पहुंचने के बाद भी मैंने इस जंग को जीता है और अब एक स्वस्थ जीवन जी रही हूं.

कर रही हैं खेती किसानी

जशपुर जिले से लगभग 30 किलोमीटर दूर स्थित कोमड़ो गांव में खेती-किसानी करते हुए पूनम बेहतर जीवन जी रही हैं. वो कहती हैं, खेती-किसानी हमारा खानदानी काम है. मेरे पति सरकारी नौकरी में थे और सुबह काम पर चले जाते थे. इसलिए खेती-किसानी का सारा काम मैं देखती थी. अब मेरे पति सेवानिवृत्त हो चुके हैं तो अब वो भी काम में हाथ बंटा देते हैं. हमारे यहां खरीफ फसल की खेती होती है. जिसका ज्यादा काम अगस्त से दिसंबर तक का होता है. उसके बाद आराम करते हैं.

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परिवार के साथ ऐसे बिताती हैं समय

वो बताती हैं, वैसे तो मेरे परिवार में दो बेटियां और एक बेटा है, लेकिन सबकी शादी हो चुकी है. बेटियां अपनी ससुराल में हैं. बेटा टीचर की नौकरी करता है, इसलिए गांव में हमारे साथ न रहकर जशपुर में रहता है. हमारे गांव से जषपुर केवल 30 किलोमीटर दूर है इसलिए मैं अपने पति के साथ अक्सर यहां आती रहती हूं. इन दिनों भी मैं अपने बेटे के घर आयी हुई हूं और बहू-बेटे और उसके बच्चों के साथ जीवन का आनंद ले रही हूं.
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