बच्‍चों के साथ होने वाले यौन अपराधों के लिए पोर्नोग्राफी कितनी जिम्‍मेदार?

पोर्नोग्राफी देखने वाले व्‍यक्ति का दिमाग इस तरह संचालित होता है कि वह इन चीजों को सामान्‍य मानने लगता है. उसे यह बात समझ नहीं आती कि यह सच नहीं है. इसे सिर्फ बेचने के लिए लिखा जा रहा है

News18Hindi
Updated: May 3, 2018, 2:52 PM IST
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Updated: May 3, 2018, 2:52 PM IST
(हमने एक नई सीरीज शुरू की है. इस सीरीज का मकसद बाल यौन अपराधी यानी पीडोफाइल के मनोविज्ञान के विभिन्‍न पहलुओं की पड़ताल करना है. आज आप इस सीरीज की सातवीं किश्त पढ़ रहे हैं. लंदन स्थित प्रतिष्ठित मनोचिकित्‍सक डॉ. द्रोण शर्मा इस सीरीज में पीडोफाइल के मनोविज्ञान के विभिन्‍न पहलुओं पर प्रकाश डालेंगे. आठ भागों में चलने वाली यह सीरीज आप रोज दोपहर news18hindi पर पढ़ सकेंगे. अगर आपके मन में कोई सवाल है तो आप इस पते पर हमें भेज सकते हैं – ask.life@nw18.com.)

बच्‍चों के साथ होने वाले यौन अपराधों में एक बड़ी भूमिका पोर्नोग्राफी की भी है. अगर आप पीडियो पोर्नोग्राफी या लिखित पोर्नोग्राफी का अध्‍ययन करें तो पाएंगे कि ऐसी कोई रिलेशनशिप नहीं है, जिसे पोर्नोग्राफी में नहीं दर्शाया गया हो. माज ने इसके लिए कुछ नियम बनाए हैं कि आपके किसके साथ यौन संबंध हो सकते हैं और किसके साथ नहीं. पिता-बेटी, मां-बेटा, भाई-बहन, नजदीकी रक्‍त संबंध, ऐसे कई रिश्‍ते हैं, जिसमें समाज में और कानूनन भी यौन संबंधों की अनुमति नहीं है. लेकिन पोर्नोग्राफी ऐसे किसी नियम को नहीं मानती. उसमें हर तरह के रिश्‍तों के बीच यौन संबंध दिखाया जाता है, चाहे वह भाई-बहन का रिश्‍ता हो, भाभी- देवर का रिश्‍ता हो.



अब सवाल यह उठता है कि इन चीजों का हमारे मानस पर असर क्‍या पड़ता है? अगर कोई कम उम्र में और बड़े होने की प्रक्रिया में इस तरह की पोर्नोग्राफी के संपर्क में आता है तो दिमाग के अवचेतन हिस्‍से में उसका असर काफी खतरनाक होता है. हम जो भी देख रहे हैं, जाहिर है उससे सीख भी रहे हैं. उससे अपने लिए मूल्‍य तय कर रहे हैं, समझ विकसित कर रहे हैं. इस तरह की पोर्नोग्राफी देखने वाले व्‍यक्ति का दिमाग इस तरह संचालित होता है कि वह इन चीजों को सामान्‍य मानने लगता है. उसे यह बात समझ नहीं आती कि यह सच नहीं है. इसे सिर्फ बेचने के लिए लिखा जा रहा है.

यौन इच्‍छा और जरूरतें किसी भी मनुष्‍य की बहुत बुनियादी इच्‍छा और जरूरत है. एक पीडोफाइल अपराधी अपनी उस बेसिक जरूरत से तो संचालित है, लेकिन उसमें सही-गलत, नैतिक-अनैतिक का बोध खत्‍म हो गया है. एक तो उसे यह बोध अपनी परवरिश और आसपास के माहौल से नहीं मिला, दूसरे पोर्नोग्राफी ने उसे बताया कि हर तरह का रिश्‍ता जायज है. आप जो भी देखते हैं, आपका दिमाग यह समझता है कि दुनिया में ऐसा होता है और बहुत सारे लोग ऐसा करते हैं, इसलिए ऐसा करने में कुछ भी बुराई नहीं है.

इंटरनेट के युग में पोर्नोग्राफी अब हर किसी को बहुत आसानी से उपलब्‍ध है. लोग अपने मोबाइल में पोर्नोग्राफी देख रहे हैं और उससे प्रभावित हो रहे हैं, जिसका नतीजा ये है कि यौन अपराध बढ़ रहे हैं. यौन अपराधों के लिए पूरी तरह पोर्नोग्राफी ही जिम्‍मेदार है, ऐसा नहीं है, लेकिन उसकी भूमिका से भी इनकार नहीं किया जा सकता.

पहली किश्‍त - पीडोफाइल होने का क्‍या अर्थ है?
दूसरी किश्‍त - एक पीडोफाइल या बाल यौन अपराधी का मनोविज्ञान क्या होता है?
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तीसरी किश्‍त - बच्‍चों के साथ यौन अपराध की घटनाएं कैसे घटती हैं ?
चौथी किश्‍त - बच्‍चे के साथ स्‍नेह और परवरिश का रिश्‍ता कैसे बदल जाता है यौन अपराध में?
पांचवी किश्‍त - क्‍या दवाइयों और काउंसिलिंग के जरिए एक पीडोफाइल का इलाज संभव है ?
छठी किश्‍त - क्‍यों होता है घरों के अंदर बच्‍चों के साथ यौन अपराध?
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