Ismat Chughtai Birth Anniversary: विद्रोही लेखिका इस्‍मत चुग़ताई, जिनकी क़लम शोले उगलती थी

अपने समय की विवादास्पद और लोकप्रिय लेखिका इस्‍मत चुग़ताई.

अपने समय की विवादास्पद और लोकप्रिय लेखिका इस्‍मत चुग़ताई.

अपने समय की विद्रोही लेखिका इस्‍मत चुग़ताई (Ismat Chughtai) की आज यानी 21 अगस्‍त को जयंती मनाई जाती है. उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के एक छोटे से शहर बदायूं (Badaun) में जन्‍मीं इस्‍मत आपा के लेखन की ख़ासियत यह है कि जहां इसमें स्‍त्री के अधिकारों की बात की गई है, वहीं उन्‍होंने अपने किरदारों के जरिये महिलाओं के अहम सवालों को भी नए सिरे से उठाया है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 21, 2020, 4:37 PM IST
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उर्दू अदब की बेबाक लेखिका इस्‍मत चुग़ताई (Ismat Chughtai) का जन्‍म 21 अगस्त, 1915 को उत्तर प्रदेश के बदायूं (Badaun) में हुआ था. उन्हें 'इस्मत आपा' के नाम से भी जाना जाता है. उनकी छवि एक नारीवादी लेखिका की रही है. प्रभावशाली महिला किरदार उनके लेखन की ख़ास पहचान हैं. उन्‍हें अपने समय के मशहूर प्रगतिशील लेखकों में शुमार किया जाता है. वह अपने समय की विवादास्पद और लोकप्रिय लेखिका रहीं. उन्होंने महिलाओं के अहम सवालों को नए सिरे से उठाया. उनके किरदार महिला आज़ादी और उसके अधिकारों की बात करते नज़र आते हैं. उनके लेखन में धर्मनिरपेक्षता और आधुनिकता पर ज़ोर रहा है. यही वजह है कि उनके कई उपन्‍यास और कहानियां आज भी अपनी बेबाकी और अलग अंदाज़ की वजह से काफ़ी लोकप्रिय हैं. चोटें, छुईमुई, एक बात, कलियां, एक रात, दो हाथ दोज़खी, शैतान उनके प्रमुख कहानी संग्रह हैं. वहीं टेढ़ी लकीर, जिद्दी, एक कतरा ए खून, दिल की दुनिया, मासूमा, बहरूप नगर, सैदाई, जंगली कबूतर, अजीब आदमी, बांदी उनके अहम उपन्‍यास हैं. प्रस्‍तुत है उनकी आत्‍मकथा 'काग़ज़ी है पैरहन' से पुस्‍तक अंश.

'काग़ज़ी है पैरहन' : पुस्‍तक अंश

अम्मां मेरे मुस्तकबिल से मुतमइन (संतुष्ट) होकर बहुत मेहरबान हो गई थीं. उन्होंने कुछ नकली रेशम की गुलाबी, फ़िरोज़ी साड़ियां खरीदी थीं. उनके साथ ही कालरदार, मर्दाना वज़ा की कमीज़ें बनवाई थीं. दो-चार बनारसी पान खरीद लिए थे, अब और खरीद-फरोख्त बंद कर दी थी. आठ तोले के कड़े, पहुंचियां, झुमके भी बनवाए थे. मुझे उनमें से कुछ भी नहीं चाहिए था. मुझे सादा शलवार-क़मीज़ और दुपट्टे चाहिए थे. चादर, तकिया के गिलाफ़, तौलिए और पलंगपोश, साल भर के लिए कपड़ों की ज़रूरत थी. लट्ठे के थान घर में रहते ही थे, मैंने आठ शलवारें बनाईं, अम्मां से कहा सिर्फ़ तीन बनाई हैं. उन्हें पता भी न चला. तीन-चार लट्ठेकी क़मीजें बना लीं, अभी दुपट्टे चाहिए थे समझ में नहीं आता था कि अम्मां से कहे बगैर सामान कैसे तैयार करूंगी. उस वक्त एक लालटेन और लोटा भी ले जाना पड़ता था. मैंने साबुत दुपट्टे छिपा दिए और फटे दुपट्टे और फाड़कर पहननेलगी. मगर उन्होंने कुछ नोटिस न लिया. कौन था देखने वाला. पूरा बिस्तर भी ले जाना था.

रात भर मैं बोर्डिंग के ख्वाब देखती. ऐसी लगन तो विलायत जाने की भी नहीं लगी थी. अजीब बेकसी का एहसास था कि दम घोटे दे रहा था. वह शादी जिस पर अम्मां मुतमइन बैठी थीं, नहीं होनेवाली थी कि मैंने जुगनू को क़सम दी थी. मैं तो किसी बादशाह से भी शादी के मूड में नहीं थी. स्कूल खुलने का वक़्तआ रहा था, मैंने एडमिशन फॉर्म भी नहीं मंगाए थे.
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फिर एक दिन मैंने टूटे-फूटे हथियार संभाले और मैदान में उतर गई. इतवार का दिन था. अब्बा मियां नाश्ता करके अख़बार पढ़ रहे थे. अम्मां चौके पर बैठी छालियां कतर रही थीं. मैंने आंख खोलकर यही मंज़र देखा था. पुराना दमघोंट माहौल मेरी हिम्मत पस्त किए दे रहा था. अजीब अकेलेपन का एहसास दमघोंट रहा था. इतने बड़े कुनबे के बावजूद में अपने महाज़ (मोर्चा) पर तनहा थी. किसी तरफ़ से कुमक आने की उम्मीद न थी. कई दिन से अजीब डरावने ख़्वाब देख रही थी, मैं मरी पड़ी हूं और सारा घर मातम-कुनां' है. मैं बैन सुन रही हूं. वही लाखों औरतों के बैन, जो न जाने किसे रो रही हैं.

फिर मेरी आंख खुल जाती, तेल खत्म हो जाने पर लालटेन भड़ककर बुझ जाती. मैं पसीना-पसीना, सूखी-सूखी आंखों से मुख़्तसर से सेहन में से झांकता हुआ आसमान देखती, तारे मद्धम हो जाते, दूर कहीं मदकूक (क्षयरोगी) मुअज्ज़िन की आवाज़ मुझे बजाय सुकून बख़्शने के दहला देती.



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एक और दिन गुज़र गया और मेरी मंज़िल एक क़दम आगे के बजाय पीठे ही हट गई. उस दिन मैंने बंबे के पास बैठकर वजू किया और फ़जिर की नमाज़ पढ़ी थी. बेलफ्ज़ दुआएं मांगी थीं. ख़ुदा को मेरे दिल का हाल मालूम था, बल्कि उस वक़्त ऐसा महसूस हुआ, ख़ुदा मेरे दिल में उतर आया है अजीब हलचल सी, बेआवाज़, बेमकसद, मेरे वजूद को मिसमार (ध्वस्त) किए दे रही है. मगर जितनी टूटती हूं, उतनी ही दीवारें संगीन होती जा रही हैं. नाउम्मीदी में कभी कोई अनजानी सी ताकत न जाने कहां. से उभरकर हाथ थाम लेती है और वह अनजानी ताकत मुझे मक्रतल की जानिब घसीटे लिए जा रही थी.

मैं थोड़ी देर मोंढें पर बैठी रही. अम्मां छालियों में से सड़ा हुआ हिस्सा कुतरकर बड़े तास्सुफ़ से देख रही थीं. अब्बा की नज़रें अख़बार पर घूम रही थीं. मैं बारी-बारी दोनों को निगाहों की तराजू में तौल रही थी. शायद मेरी निगाहों की चुभन ने अब्बा मियां को मेरी तरफ़ देखने पर मजबूर किया.

थोड़ी देर बड़ी-बड़ी गिलाफ़ी आंखें खामोश मेरी आंखों से उलझी रहीं. मैंने पलक नहीं झपकाई, ऐसा कभी नहीं हुआ था. अब्बा मियां की आंखों में आंखें डालना मज़ाक न था. कहते हैं, अक्‍सर मुजरिम उनकी एक ही नज़र से पानी हो जाते थे और झूठ की सारी कहानियां वरक़-वरक़ हो जाती थीं. "मैं पढ़ने के लिए अलीगढ़ जाना चाहती हूं." मैंने कह ही दिया. और मेरी आवाज़ में कोई लर्ज़िश (कंपन) न थी.

"पढ़ती तो हो अपने बड़े अब्बा से"

"मैं मैट्रिक का इम्तिहान देना चाहती हूं." "किस काम आएगा, दो साल रह गए हैं जुगनू के ...फिर...बेकार..."

"मैं मैट्रिक करना चाहती हूं"

"मगर ज़रा सोचो, क्या फायदा है. इससे बेहतर है तुम खाना पकाना और सिलाई वगैरह सीखो. तुम्हारी तीनों बहनें कितनी सलीक़ामंद हैं और तुम" मुझे सलीक़ा से दिलचस्पी

नहीं, मैं पढ़ना चाहती हूं."

"नहीं, बेकार..."

"तो मैं चली जाऊंगी."

कहां चली जाओगी?" अब्बा मियां ने अख़बार रख दिया.

"स्कूल..."

"स्कूल ?...कौन-से स्कूल?" "किसी भी स्कूल में..."

"नहीं, हम तुम्हें स्कूल वगैरह नहीं भेजेंगे कल से तुम मुतंजन की तरकीब सीखो और हब्शी हलवा सोहन..."

बेगम इस दफ़ा हलवा सोहन गोल कर गईं.

"ऐ, गर्मियों में मुआ, हब्शी, हलवा सोहन कैसे बनेगा...हां गाजरें..."

"मुझे मुतंजन से कै आती है. मीठे चावलों में गोश्त और हब्शी हलवा भी पसंद नहीं. मैं स्कूल जाना चाहती हूं, सिर्फ एक हफ्ता रह गया है. अलीगढ़..."

"हम तुम्हें अलीगढ़ नहीं भेज सकते. शौकत बड़ी लापरवाही हैं और तुम बहुत ख़ुदसर हो. उसका कहना नहीं मानोगी. कोई ऐसी-वैसी बात हुई तो ख़ानदान की बदनामी होगी."

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"तो मैं खुद चली जाऊंगी." मेरे ऊपर भूत सवार हो गया. उनकी शोलाबार आंखें पूरी तरह खुल गईं. मैं भस्म न हुई. मुझे ऐसा महसूस हो रहा था, ताजमहल की मशरिकी बुर्जी से लटकी हुई हूं, रस्सी कमजोर है, मेरी हथेलियां खूनम-खून हो रही हैं, कोई दम में रस्सी टूट जाएगी और संगमरमर के बेरहम फर्श की तरफ़ मेरा जिस्म लपकेगा और मैं पाश-पाश" हो जाऊंगी.

"कहां चली जाओगी?"

"कहीं भी."

"बस यूं ही चल दोगी?"

"हां, घर से निकलकर तांगा लूंगी, वहां से स्टेशन जाकर किसी भी डब्बे मैं बैठ जाऊंगी."

"फिर?"

"किसी भी स्टेशन पर उतरकर मिशन स्कूल का पता पूछती पहुंच जाऊंगी. वहां ईसाई हो जाऊंगी. वहां मुझे जितना चाहेंगे, पढ़ने का मौक़ा मिलेगा."

थोड़ी देर सन्नाटा गूंजता रहा. अम्मा को सरौता मफ़लूज (पक्षपात का शिकार) हो गया.

"सुन रही हो बेगम, ये क्या बक रही है?"

"ख़ुदा ग़ारत करे कमबख़्त को, ख़ानादन के मुंह को क़ालिख लगाएगी."

"मगर तांगा तो सांभर में है ही नहीं." अब्बा मियां की आंखों में शरारत चमक उठी और हमारी रथें और सरकारी ऊंट तुम्हें हमारी इजाज़त के बगैर नहीं मिलेंगी." "मैं पैदल चली

जाऊंगी." मैंने नज़र की मीनार से लटकती हुई रस्सी को मजबूती से थाम लिया. मेरी हथेलियों में सांभर झील का नमक हौले-हौले जज्ब हो रहा था.

फ़िर ख़ामोशी तारी हो गई. अम्मां ने साड़ी के पल्लू से आंखें पोंछीं.

"मैं जफ़र को क्या मुंह दिखाऊंगी."

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"ज़फर ही ने अच्छे-भले पैगाम में खंडत डाल दी. वरना अब तक तो इस कमबख़्त के बोझ से सुबुकदोश हो चुके होते."

"तो बस, मेरा भाई ही गुनहगार ठहरा. अरे, उनके बेटे के लिए नवाब जादियां मिल रही हैं, मगर उसने मेरी ख़ातिर मेरा बोझ हलका करना चाहा, अरे मेरे पैर पकड़े, कहा जब तक हां नहीं करोगी, नहीं छोडूंगा."

अम्मां धरों-धार रोने लगीं.

"गारत हो कलमूही." अम्मां ने जूती खींचके मारी, जो दाना की मुतलाशी (तलाश कर रही) मुर्गी के लगी और न जाने क्यों मैं हंसी दबाती भागी.

मुजाहिद खूनम-खून सही मगर जांबाज़ी से मोर्चा वक्ती तौर पर छोड़ने पर मजबूर हो गया. मैंने दो-तीन गिलास सुराही का पानी चढ़ाया और अंदर की कोठरी में दरवाजे-खिड़कियां बंद करके बैठी रही. पता नहीं मुझे अपनी ढिठाई पर बजाय शरमिंदगी के बड़ा सुकून मिल रहा था. किताब उठाई अल्लामा राशिदुल-खैरी की तिलिस्मातन का सफ़ेद बाल. जी जलके कोयला हो गया. उठाकर दीवार से मार दी और औंधी हो गई. रात भर ठीक से सोई न थी, फौरन सो गई और कोई ख़्वाब न आया.

(साभार/राजकमल प्रकाशन)
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