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क्रीम बेचने से ज्य़ादा खुद की मानसिकता पर लगाम है जरूरी!

News18Hindi
Updated: February 10, 2020, 10:45 AM IST
क्रीम बेचने से ज्य़ादा खुद की मानसिकता पर लगाम है जरूरी!
क्या क्रीम लगाने से चेहरे की खूबसूरती को बढ़ाया जा सकता है, ये सवाल अब खुद से पूछना जरूरी हो गया है

समाज और दुनिया को गलत ठहराने से ज्यादा जरूरी है इसकी जड़ को खत्म करने की. आजकल सोशल मीडिया, टीवी, अखबार, मैगजीन हर जगह लड़कियों की सुंदरता को बढ़ाने के प्रोडक्ट्स के विज्ञापन मिल जाएंगे.

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  • Last Updated: February 10, 2020, 10:45 AM IST
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लंबी हाइट, पतली कमर, काले घने बाल, गुलाबी होंठ और खूबसूरत दिखने वाला गोरा चेहरा भारत, रूस, अमेरिका और दुनिया के हर कोने में लड़की की सुंदरता का पैमाना फिक्स है. पैमाने के इतर खूबसूरती हुई तो समाज या दूसरे शब्दों में कहें तो सौंदर्य की दुनिया में उन लड़कियों को वो तवज्जों को नहीं मिलती है. हो सकता है मेरी इन बातों से कुछ लोग इत्तेफाक न रखें. आजकल की सोच, मॉर्डन जमाने का हवाला देकर इन बातों को नकार दें, लेकिन सच्चाई आज भी यही है. वैश्विक स्तर और हमारे समाज में सुंदरता के इस पैमाने की पकड़ कोने-कोने में हैं. हो सकता है कुछ लोगों को मेरी बात चुभे कि आखिरकार मैं 'लड़की' शब्द पर इतना फोकस क्यों कर रही हूं. ऐसा इसलिए क्योंकि किसी लड़के की बजाय डार्क कलर, पिंपल वाला चेहरा, कॉम्प्लेक्शन के लिए लड़कियों को ज्यादा बातें सुननी पड़ती है.

समाज और दुनिया को गलत ठहराने से ज्यादा जरूरी है इसकी जड़ को खत्म करने की. आजकल सोशल मीडिया, टीवी, अखबार, मैगजीन हर जगह लड़कियों की सुंदरता को बढ़ाने के प्रोडक्ट्स के विज्ञापन मिल जाएंगे. इस तरह के प्रोडक्ट्स को बढ़ावा देने वाला कोई और नहीं बल्कि सामाज है, जिसे वक्त के साथ बाजार ने भापा है और इन कॉन्सेप्ट्स को उतारा है. क्योंकि वो इस बात से पूरी तरह वाकिफ हैं कि जनता उनके झांसे में आ ही जाएगी. कंपनियों ने अपने विस्तार के लिए सिर्फ़ हमारी उस नब्ज को पकड़ा, जिसका दर्द न होते हुए भी सब गा रहे हैं.



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आज बाजार में हजारों की संख्या में प्रोडक्ट्स मौजूद हैं, जो इंसान की काया, रंग रूप को पूरी तरह से बदल देने का वादा करते हैं. पतली कमर, लंबी हाइट, गोरा रंग, लंबे बाल खूबसूरती शब्दों को बयां करने के लिए जितने पैमाने तय किए गए हैं ये प्रोडक्ट्स उन पर खरे उतरने की बात कहते हैं. जिस वक्त ये विज्ञापन आते हैं उस वक्त लोगों की आंखों पर एक काली पट्टी बंध जाती है. वो इस बात को भूल जाते हैं कि ये दावा नहीं बल्कि बहकावा है. इसी बहकावे को रोकने के लिए पिछले दिनों केंद्र सरकार द्वारा ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज़ (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम, 1954 में संशोधन करने का विचार किया गया है. नए कानून में सरकार ग्राहकों को भ्रमित करने वाले प्रोडक्ट्स पर जुर्माना और सजा दोनों का प्रावधान किया गया है.

इसे केंद्र सरकार का एक अनोखा कदम ही कहा जाएगा, क्योंकि वो इन सफेद झूठों से देश की आम जनता को बचाना चाहती है. वास्तविकता में खुद को बदलने के लिए लड़कियां जितने प्रयास करती हैं उतना तो शायद वैज्ञानिक भी किसी शोध को करने में नहीं करते होंगे. मानिए या मत मानिए, कॉलेज-ट्यूशन से लेकर शादी-ब्याह तक के बीच एक लड़की के मन में ब्यूटी प्रोडक्ट्स को लेकर चुनाव चलता ही रहता है कि आखिर वो किस तरह समाज के बनाए पैमानों पर निखर पाएगी और कैसे अन्य लड़कियों की तरह खुद को सुंदर बना पाएगी.

आज हम समाज में गढ़ी गई इन भ्रांतियों से जकड़ गए हैं कि सरकार को इस तरह के कदम उठाने पड़ रहे हैं. सरकार कोई कदम उठाती उससे पहले ही हमें इस तरह की चीजें कर लेनी चाहिए थी. वर्तमान के हालातों में समाज को विविधताओं, शिक्षा को लेकर बात होनी चाहिए. वहां आज भी रंगभेद पर ही बात हो रही है. जिसकी गांठ इतनी मजबूत है कि सरकार को आगे आना पड़ रहा है उसे जबरन खोलने के लिए. घर में अक्सर मां कहा करती थी कि समाज किसी और से नहीं बल्कि मेरे तुमसे और घर से ही बनता है इसलिए रंगभेद पर बातें पूरी तरह से खत्म हो इसके लिए जरूरी है शुरुआत घर से हो. एक घर में जब इस तरह की बातें बंद होगी, तभी समाज में बंद हो पाएंगीं. लाजिमी सी बात है कि समाज में बंद होंगी तो देश में और देश से वैश्विक स्तर पर इन चीजों पर लगाम लगेगी.

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First published: February 10, 2020, 10:31 AM IST
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