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19 की उम्र में दे चुकी हैं 200 लाइव परफॉर्मेंस, 12 की उम्र से शुरू किया 'ढोल' बजाना

19 की उम्र में दे चुकी हैं 200 लाइव परफॉर्मेंस, 12 की उम्र से शुरू किया 'ढोल' बजाना

लड़कियां ढोल नहीं बजातीं. कुछ नहीं होना, बस, हाथ में छाले पड़ जाने हैं

लड़कियां ढोल नहीं बजातीं. कुछ नहीं होना, बस, हाथ में छाले पड़ जाने हैं

अब 19 साल की जहां गीत सिंह देश की सबसे कम उम्र की महिला ढोली (ढोल बजाने वाली) मानी जा रही हैं. वे बताती हैं कि 5 मिनट तक ढोल बजाने में एक घंटा जिम करने जितना पसीना बहता है. जहां अपना सफर hindi.news18.com से साझा करती हैं.

    काली गुंथी चोटियों और चमकीली आंखों के साथ सितार या वायलिन जैसी चीजें ही मेल खाती हैं. छह किलो का ढोल गले में लटकाने पर गर्दन के साथ हाथों पर भी छाले पड़ जाने हैं. वही करो, जो लड़कियों के बस का हो. ये बात जितनी बार सुनी, इरादा उतना ही पक्का होता गया.

    अब 19 साल की जहां गीत सिंह देश की सबसे कम उम्र की महिला ढोली (ढोल बजाने वाली) मानी जा रही हैं. वे बताती हैं कि 5 मिनट तक ढोल बजाने में एक घंटा जिम करने जितना पसीना बहता है. जहां अपना सफर hindi.news18.com से साझा करती हैं.



    छोटी थी तब गर्मियों की छुट्टियां कुछ नया करने का वक्त हुआ करती थीं. फिर चाहे वो पड़ोसी के घर की घंटी बजाकर भागना हो या फिर पतंगबाजी करना. साथ-साथ में पेरेंट्स की तसल्ली के लिए कुछ सीखना भी होता था. उसी दौर में मैंने कभी हारमोनियम बजाया तो कभी डांस सीखा लेकिन ज्यादा वक्त ये सोचते हुए बीता कि मुझे ये नहीं करना.

    संगीत आकर्षित तो करता था लेकिन ऐसी किसी भी चीज के साथ मैं कोई कनेक्शन नहीं पाती थी. बेमन से सब सीखती और सब छोड़ देती.

    गर्मियों की ऐसी ही सुस्त दोपहर पूरा परिवार बैठा हुआ था. पेरेंट्स पूछ रहे थे कि आखिर मेरा ही क्यों कुछ सीखने में मन नहीं लगता. वे सचमुच परेशान थे. जान-पहचान की सारी बच्चियां कुछ न कुछ सीख रही थीं लेकिन उनकी बच्ची 'कनेक्शन' खोज रही थी. मैंने धीरे-धीरे समझाया कि मुझे कुछ और करना है लेकिन 'कुछ और' की परिभाषा मेरे पास नहीं थी.



    पापा ने एक के बाद एक गिनाना शुरू किया कि मैं क्या-क्या सीख सकती हूं. वे दरअसल मेरे साथ खुद भी खोज रहे थे कि मैं किस पर ठिठकती हूं. ज्यों ही उन्होंने ढोल कहा, मैंने तपाक से कहा- हां, मैं ढोल सीखने को भी एक ट्राय देना चाहती हूं. यहीं से मेरे संघर्ष का सफर शुरू हुआ. जहां भी जाती, उस्ताद हंसते कि लड़कियां ढोल नहीं बजातीं. कुछ नहीं होना, बस, हाथ में छाले पड़ जाने हैं. दुनिया-जहान के चक्कर लगाने और यकीन दिलाने पर मुझे उस्ताद मिल सके. शुरू-शुरू में वे सोचते थे कि कुड़ी जल्द ही क्लास छोड़कर चली जाएगी.

    मैं तब 12 साल की थी. लगभग 6 किलो का ट्रैडिशनल ढोल गले पर लटकाने में खुद भी नीचे झुक जाती. फिर उतनी ही ऊर्जा से उसे बजाना. शुरुआत में हाथों से खून निकलने लगता, पीठ-कंधे-गर्दन सबमें दर्द रहता. लेकिन उस्ताद जी कहते- रुको मत, और जोर से बजाओ. वो इंतजार कर रहे थे कि मैं खुद ही इससे नाता तोड़ दूं लेकिन हुआ इसका उल्टा. मुझे ढोल में ही वो कनेक्शन मिला.



    घर पर लौटती तो धीरे-धीरे प्रैक्टिस करती ताकि पड़ोसी मजाक न उड़ाएं लेकिन धीरे-धीरे सबको पता चल गया और सबको मेरा बजाना पसंद भी आने लगा. असल दिक्कत शुरू हुई स्टेज परफॉर्मेंस में.

    पहले-पहल जब स्टेज पर जाती तो सुनती- 'कुड़ियां वी हुण ढोल बजानगीयां...'(अब लड़कियां भी ढोल बजाएंगी!). लोग गुस्सा जताते, मजाक उड़ाते. फिर वक्त के साथ ये ढोल और मैं एक-दूसरे की पहचान बन गए.

    पांच मिनट तक लगातार ढोल बजाना घंटेभर जिम करने के बराबर मेहनत मांगता है. लड़की हूं तो इस काम में कई और दिक्कतें भी होतीं. एक वो वक्त भी था, जब इतनी मेहनत के कारण मेरा हीमोग्लोबिन लेवल घटकर 5 ग्राम रह गया. पीरियड्स के दौरान ढोल बजाने में और भी ज्यादा ताकत लगती. फिर समझ आया कि ढोल से जुड़े रहना है तो अपने शरीर का भी ख्याल रखना होगा.

    कितनी सारी लड़कियां सिर्फ इसलिए सपने देखने से घबराती हैं क्योंकि उनके लिए आंखें बंद कर सोचना भी एक लग्ज़री है. मैं खुशकिस्मत हूं, मुझे परिवार का साथ मिला लेकिन उस साथ से पहले मैंने खुद को साबित किया. सारी रात दर्द में जागती लेकिन दूसरी सुबह रियाज़ के वक्त दोगुनी ताकत से ढोल बजाती. 

    Tags: Punjab

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