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वक्त को समझाती जावेद अख़्तर की नज़्म- 'ये वक़्त क्या है', जरूर पढ़ें

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Updated: December 12, 2019, 6:32 PM IST
वक्त को समझाती जावेद अख़्तर की नज़्म- 'ये वक़्त क्या है', जरूर पढ़ें
जावेद अख़्तर अपनी इस नज्म में समय को लेकर 'टिप्पणी' और 'सवाल' दोनों एक साथ करते हुए नजर आ रहे हैं.

इस नज्म में जावेद अख़्तर समय के फेर को समझाने की कोशिश करते हैं. वह समझाना चाहते हैं कि समय किसी के लिए नहीं रुकता. वह गुजरता चला जाता है.

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जावेद अख़्तर- जावेद अख़्तर का नाम देश का बहुत ही जाना-पहचाना नाम है. जावेद अख्तर शायर, फिल्मों के गीतकार और पटकथा लेखक तो हैं हीं साथ ही सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी एक मशहूर हस्ती हैं. इनका जन्म 17 जनवरी 1945 को ग्वालियर में हुआ था. वह एक ऐसे परिवार के सदस्य हैं जिसके ज़िक्र के बिना उर्दु साहित्य का इतिहास अधुरा रह जाएगा. शायरी तो पीढ़ियों से उनके खून में दौड़ रही है.

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जावेद अख़्तर अपनी इस नज्म में समय को लेकर 'टिप्पणी' और 'सवाल' दोनों एक साथ करते हुए नजर आ रहे हैं. जावेद साहब अपनी पहली पंक्ति 'ये वक़्त क्या है' में पहले सवाल करते हैं कि यह समय क्या है और दूसरी पंक्ति 'ये क्या है आख़िर कि जो मुसलसल गुज़र रहा है' में टिप्पणी करतें हैं कि यह क्या है जो लगातार गुजर रहा है. यहां मुसलसल का अर्थ 'लगातार' शब्द से है. इस नज्म में जावेद अख़्तर समय के फेर को समझाने की कोशिश करते हैं. वह समझाना चाहते हैं कि समय किसी के लिए नहीं रुकता. वह गुजरता चला जाता है.

देखें वीडियो-



नज़्म- ये वक़्त क्या है

ये वक़्त क्या हैये क्या है आख़िर कि जो मुसलसल गुज़र रहा है
ये जब न गुज़रा था
तब कहां था
कहीं तो होगा
गुज़र गया है
तो अब कहां है
कहीं तो होगा
कहाँ से आया किधर गया है
ये कब से कब तक का सिलसिला है
ये वक़्त क्या है

ये वाक़िए
हादसे
तसादुम
हर एक ग़म
और हर इक मसर्रत
हर इक अज़िय्यत
हर एक लज़्ज़त
हर इक तबस्सुम
हर एक आंसू
हर एक नग़्मा
हर एक ख़ुशबू
वो ज़ख़्म का दर्द हो
कि वो लम्स का हो जादू
ख़ुद अपनी आवाज़ हो कि माहौल की सदाएं
ये ज़ेहन में बनती और बिगड़ती हुई फ़ज़ाएं
वो फ़िक्र में आए ज़लज़ले हों कि दिल की हलचल
तमाम एहसास
सारे जज़्बे
ये जैसे पत्ते हैं
बहते पानी की सतह पर
जैसे तैरते हैं
अभी यहां हैं
अभी वहां हैं
और अब हैं ओझल
दिखाई देता नहीं है लेकिन
ये कुछ तो है
जो कि बह रहा है
ये कैसा दरिया है
किन पहाड़ों से आ रहा है
ये किस समुंदर को जा रहा है
ये वक़्त क्या है

कभी कभी मैं ये सोचता हूं
कि चलती गाड़ी से पेड़ देखो
तो ऐसा लगता है
दूसरी सम्त जा रहे हैं
मगर हक़ीक़त में
पेड़ अपनी जगह खड़े हैं
तो क्या ये मुमकिन है
सारी सदियां
क़तार-अंदर-क़तार अपनी जगह खड़ी हों
ये वक़्त साकित हो
और हम ही गुज़र रहे हों
इस एक लम्हे में
सारे लम्हे
तमाम सदियां छुपी हुई हों
न कोई आइंदा
न गुज़िश्ता
जो हो चुका है
जो हो रहा है
जो होने वाला है
हो रहा है
मैं सोचता हूं
कि क्या ये मुमकिन है
सच ये हो
कि सफ़र में हम हैं
गुज़रते हम हैं
जिसे समझते हैं हम
गुज़रता है
वो थमा है
गुज़रता है या थमा हुआ है
इकाई है या बटा हुआ है
है मुंजमिद
या पिघल रहा है
किसे ख़बर है
किसे पता है
ये वक़्त क्या है
ये काएनात-ए-अज़ीम
लगता है
अपनी अज़्मत से
आज भी मुतइन नहीं है
कि लम्हा लम्हा
वसीअ-तर और वसीअ-तर होती जा रही है
ये अपनी बांहें पसारती है
ये कहकशाओं की उंगलियों से
नए ख़लाओं को छू रही है
अगर ये सच है
तो हर तसव्वुर की हद से बाहर
मगर कहीं पर
यक़ीनन ऐसा कोई ख़ला है
कि जिस को
इन कहकशाओं की उंगलियों ने
अब तक छुआ नहीं है
ख़ला
जहाँ कुछ हुआ नहीं है
ख़ला
कि जिस ने किसी से भी ''कुन'' सुना नहीं है
जहां अभी तक ख़ुदा नहीं है
वहाँ
कोई वक़्त भी न होगा
ये काएनात-ए-अज़ीम
इक दिन
छुएगी
इस अन-छुए ख़ला को
और अपने सारे वजूद से
जब पुकारेगी
''कुन''
तो वक़्त को भी जनम मिलेगा
अगर जनम है तो मौत भी है
मैं सोचता हूं
ये सच नहीं है
कि वक़्त की कोई इब्तिदा है न इंतिहा है
ये डोर लम्बी बहुत है
लेकिन
कहीं तो इस डोर का सिरा है
अभी ये इंसां उलझ रहा है
कि वक़्त के इस क़फ़स में
पैदा हुआ
यहीं वो पला-बढ़ा है
मगर उसे इल्म हो गया है
कि वक़्त के इस क़फ़स से बाहर भी इक फ़ज़ा है
तो सोचता है
वो पूछता है
ये वक़्त क्या है

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First published: December 12, 2019, 6:28 PM IST
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