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जितिया व्रत 2019: महाभारत में हुई इस घटना के बाद से शुरु हुआ था जितिया का व्रत

News18Hindi
Updated: September 22, 2019, 6:12 AM IST
जितिया व्रत 2019: महाभारत में हुई इस घटना के बाद से शुरु हुआ था जितिया का व्रत
Jitiya vrat 2019/जितिया व्रत 2019: इस साल जिउतिया का शुभ मुहूर्त 21 सितंबर की सुबह से 22 सितंबर की शाम 7:50 बजे तक है. जितिया व्रत से जुड़ी दो पौराणिक कथाएं बहुत प्रचलित हैं. आइए जानते हैं इन दोनों कथाओं के बारे में-

Jitiya vrat 2019/जितिया व्रत 2019: इस साल जिउतिया का शुभ मुहूर्त 21 सितंबर की सुबह से 22 सितंबर की शाम 7:50 बजे तक है. जितिया व्रत से जुड़ी दो पौराणिक कथाएं बहुत प्रचलित हैं. आइए जानते हैं इन दोनों कथाओं के बारे में-

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Jitiya vrat 2019/जितिया व्रत 2019: जितिया कहिए या जीवित्पुत्रिका, अपने संतान की लंबी उम्र की कामना और खुशहाल जीवन के लिए हर साल बिहार, पूर्वांचल और नेपाल की कुछ जगहों पर रहने वाली माताओं द्वारा किया जाता है. यह व्रत अपने आप में बहुत कठिन है. इस साल जितिया व्रत 22 सितंबर को पड़ रहा है. वैसी महिलाएं जिनकी संतान हैं वो इस दिन निर्जला व्रत रखती हैं. व्रत के एक दिन पहले वो नहाय खाय करती हैं. यानी इस दिन महिलाएं नहाकर खाती हैं. अगले दिन निर्जला व्रत रखा जाता है. इस साल जिउतिया का शुभ मुहूर्त 21 सितंबर की सुबह से 22 सितंबर की शाम 7:50 बजे तक है. जितिया व्रत से जुड़ी दो पौराणिक कथाएं बहुत प्रचलित हैं. आइए जानते हैं इन दोनों कथाओं के बारे में-


पहली कथा जिसका कनेक्शन महाभारत से है-

जितिया की शुरुआत के पीछे एक पौराणिक कथा प्रचलित है. आप सभी महाभारत की कहानी से तो परिचित होंगे ही. तो जब महाभारत के युद्ध में पांडवों ने छल से अश्वथामा के पिता यानी द्रोणाचार्य को मार दिया था. अश्वथामा गुस्से में उबलता हुआ अपने पिता की मौत का बदला लेने को आतुर था. गुस्से में एक दिन उसने पांडवों के शिविर में घुसकर पांडवों के पांच बच्चों को मार डाला. असल में अश्वथामा को लगा था कि वो पांच बच्चे पांडव हैं, लेकिन वो पांचों द्रौपदी के बच्चे थे. अश्वथामा की इस गलती के वजह से अर्जुन ने उसे गिरफ्तार कर लिया और उसकी मणि छीन ली. अश्वथामा ने बदले में अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे बच्चे पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर दिया. बच्चा गर्भ में ही मर जाता लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सभी पुण्य का फल उत्तरा की गर्भ में मरे संतान को दे दिया और वह जीवित हो गया. गर्भ में मरकर दोबारा जीवित होने की वजह से ही उत्तरा के पुत्र का नाम जीवित्पुत्रिका पड़ा और यह रीत व्रत के रूप में तभी से प्रचलित है.

दूसरी कथा- गन्धर्वराज जीमूतवाहन एक धर्मात्मा और त्यागी पुरुष थे. युवावस्था में ही राजपाट छोड़कर जंगल में पिता की सेवा करने चले गए थे. एक दिन जंगल में भ्रमण करते हुए उन्हें नागमाता मिली. नागमाता परेशानी में रो रही थीं. जीमूतवाहन ने उनके विलाप करने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि नागवंश गरुड़ से काफी परेशान है. नागवंश की रक्षा करने के लिए उन लोगों ने गरुड़ से समझौता किया है कि वे प्रतिदिन उसे एक नाग खाने के लिए देंगे और इसके बदले वो हमारा सामूहिक शिकार नहीं करेगा. इस प्रक्रिया में आज उसके पुत्र को गरुड़ के सामने जाना है. नागमाता की पूरी बात सुनकर जीमूतवाहन ने उन्हें वचन दिया कि वे उनके पुत्र को कुछ नहीं होने देंगे और उसकी जगह कपड़े में लिपटकर खुद गरुड़ के सामने उस शिला पर लेट जाएंगे, जहां से गरुड़ अपना आहार उठाता है. जीमूतवाहन ने ऐसा ही किया. गरुड़ जीमूतवाहन को अपने पंजों में दबाकर पहाड़ की तरफ उड़ चला. जब गरुड़ ने देखा कि हमेशा की तरह नाग चिल्लाने और रोने की जगह शांत है, तो उसने कपड़ा हटाकर जीमूतवाहन को पाया. जीमूतवाहन ने सारी कहानी गरुड़ को बता दी, जिसके बाद उसने जीमूतवाहन को छोड़ दिया और नागों को ना खाने का भी वचन दिया.

Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.

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First published: September 22, 2019, 6:12 AM IST
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