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Kishwar Naheed Nazms: 'ये हम गुनहगार औरतें हैं...' पढ़ें किश्वर नाहीद की चुनिंदा नज़्में

Kishwar Naheed Nazms: 'ये हम गुनहगार औरतें हैं...' पढ़ें किश्वर नाहीद की चुनिंदा नज़्में

किश्वर नाहीद की नज़्म (Kishwar Naheed Nazms)

किश्वर नाहीद की नज़्म (Kishwar Naheed Nazms)

Kishwar Naheed Nazms: किश्वर नाहीद (Kishwar Naheed) अपने स्त्री वादी विचारों के लिए मशहूर हैं. उर्दू शायरी विदेशों में भी प्रकाशित हो चुकी हैं. उनका जन्म उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के बुलंदशहर में हुआ था.

Kishwar Naheed Nazms: किश्वर नाहीद (Kishwar Naheed) का जन्म 17 जून 1940 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में हुआ था. ‘नाहिद’ खासतौर पर अपने स्त्री वादी विचारों के लिए मशहूर हैं. उनकी उर्दू शायरी विदेशों में भी प्रकाशित हो चुकी हैं. जानकारी के मुताबिक मुख़्तार सिद्दीक़ी उनके गुरु थे.

पढ़ें, उनकी नज़्म (Nazm) ‘हम गुनहगार औरतें’ और ‘ख़ुदाओं से कह दो’

हम गुनहगार औरतें

ये हम गुनहगार औरतें हैं
जो अहल-ए-जुब्बा की तमकनत से न रोब खाएँ
न जान बेचें
न सर झुकाएँ
न हाथ जोड़ें
ये हम गुनहगार औरतें हैं
कि जिन के जिस्मों की फ़स्ल बेचें जो लोग
वो सरफ़राज़ ठहरें
नियाबत-ए-इम्तियाज़ ठहरें
वो दावर-ए-अहल-ए-साज़ ठहरें
ये हम गुनहगार औरतें हैं
कि सच का परचम उठा के निकलें
तो झूट से शाहराहें अटी मिले हैं
हर एक दहलीज़ पे सज़ाओं की दास्तानें रखी मिले हैं
जो बोल सकती थीं वो ज़बानें कटी मिले हैं
ये हम गुनहगार औरतें हैं
कि अब तआक़ुब में रात भी आए
तो ये आँखें नहीं बुझेंगी
कि अब जो दीवार गिर चुकी है
उसे उठाने की ज़िद न करना!
ये हम गुनहगार औरतें हैं
जो अहल-ए-जुब्बा की तमकनत से न रोब खाएँ
न जान बेचें
न सर झुकाएँ न हाथ जोड़ें!

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ख़ुदाओं से कह दो

जिस दिन मुझे मौत आए
उस दिन बारिश की वो झड़ी लगे
जिसे थमना न आता हो
लोग बारिश और आँसुओं में
तमीज़ न कर सकें
जिस दिन मुझे मौत आए
इतने फूल ज़मीन पर खिलें
कि किसी और चीज़ पर नज़र न ठहर सके
चराग़ों की लवें दिए छोड़ कर
मेरे साथ साथ चलें
बातें करती हुई
मुस्कुराती हुई
जिस दिन मुझे मौत आए
उस दिन सारे घोंसलों में
सारे परिंदों के बच्चों के पर निकल आएँ
सारी सरगोशियाँ जल-तरंग लगें
और सारी सिसकियाँ नुक़रई ज़मज़मे बन जाएँ

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जिस दिन मुझे मौत आए
मौत मेरी इक शर्त मान कर आए
पहले जीते-जी मुझ से मुलाक़ात करे
मिरे घर-आँगन में मेरे साथ खेले
जीने का मतलब जाने
फिर अपनी मन-मानी करे
जिस दिन मुझे मौत आए
उस दिन सूरज ग़ुरूब होना भूल जाए
कि रौशनी को मेरे साथ दफ़्न नहीं होना चाहिए(साभार-रेख़्ता)

Tags: Literature, Poet

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