किस्सागोई: घर वालों ने पैदा किया अलका यागनिक में गायकी का जुनून

अलका यागनिक बॉलीवुड की प्रसिद्ध गायिका हैं.

“बचपन में मैं बहुत बदमाश थी. उससे भी ज्यादा बातूनी. भाई के साथ खूब झगड़ा करती थी. भाई मुझसे करीब तीन साल छोटा है. वो भी बहुत कमाल का गाता है."

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    बचपन में गायकी और उनके बीच 36 का आंकड़ा था. गाना पसंद था लेकिन अपने मन से. ये नहीं कि कोई घर आया और घरवालों ने कहा- बेटा, जरा अंकल को एक गाना तो सुनाओ. मां को कई बार रियाज करते देखा था. लिहाजा संस्कार तो संगीत के थे. रुचि भी थी. मुसीबत बस इतनी थी कि कोई और गाने को ना कहे. ये कहानी जिस गायिका की है उनका कल ही जन्मदिन था. 20 मार्च को कोलकाता में पैदा हुई अलका यागनिक में गायकी का जुनून घरवालों ने पैदा किया. घरवालों ने उन्हें इस तरह से बड़ा किया कि वो गायकी से जुड़ी रहें. गायकी सीखती रहें. घरवालों की यही मेहनत थी कि अलका यागनिक ने जब प्लेबैक गायकी शुरू की तो उन्होंने एक के बाद एक हिट गाने दिए. रिकॉर्ड सात बार उन्होंने फिल्मफेयर अवॉर्ड जीता. दो बार नेशनल अवॉर्ड जीता. आप आजकल उन्हें टीवी चैनल पर रिएलिटी शो की जज के तौर पर भी देखते होंगे. हमने उनके बचपन को झांकने की कोशिश की-

    अलका कहती हैं, “ मेरे पिता जी नेवी में थे और कलकत्ता में ही ‘पोस्टेड’ थे. मैंने जब से होश संभाला तब से मैंने देखा था कि मम्मी रियाज करती थीं. उनके गुरु आते थे और वो तानपुरे पर रियाज करती थीं. ये जानने के लिए कि क्या हो रहा है मैं अक्सर उनके पास जाकर बैठ जाया करती थी. मां के अलावा मेरी मौसी भी शास्त्रीय संगीत सीख चुकी थीं. लिहाजा संगीत का संस्कार मुझे मेरी मां के परिवार की तरफ से मिला. मैं जब तीन-चार साल की थी तब ही मम्मी ने ये नोटिस कर लिया था कि मेरी रुचि संगीत की तरफ है. जिस उम्र में बच्चे पूरा दिन खेलते-कूदते रहते हैं, उस उम्र में मैं सारा दिन रेडियो के सामने बैठी रहती थी और गाने सुनती रहती थी. उन्हीं गानों को सुन-सुन कर मैं गाती भी थी. उनकी नकल करने की कोशिश करती थी. मेरी इन्हीं सब आदतों को देखकर मम्मी को लगा कि मेरे अंदर संगीत है. मैं ‘गॉड गिफ्टेड’ हूं. तब उन्होंने मुझे थोड़ा-थोड़ा ट्रेनिंग देना शुरू किया. फिर जब मैं पांच साल की थी तब मैंने पहली बार ऑल इंडिया रेडियो में बच्चों के लिए भजन का एक कार्यक्रम था, उसके लिए गाया. धीरे धीरे वो ‘डेवलप’ होता गया. जैसे जैसे मैं बड़ी होती गई मम्मी को लगा कि मेरे अंदर कुछ ‘एक्स्ट्राऑर्डिनरी टैलेंट’ हैं और मुझे ‘सपोर्ट’ करना चाहिए. जिससे मैं अपनी कला को निखार सकूं. पापा का भी बड़ा सपोर्ट था. उन्होंने संगीत की कोई तालीम नहीं ली थी लेकिन वो भी स्वाभाविक तौर पर ही अच्छा गाते थे. उन्हें संगीत का बड़ा शौक था”.

    जब संगीत की जड़ें इतनी मजबूत हों तो कई बार बच्चे बचपन से ही काफी गंभीर हो जाते हैं. आपकी क्या यादें हैं बचपन की, अलका कहती हैं-

    “बचपन में मैं बहुत बदमाश थी. उससे भी ज्यादा बातूनी. भाई के साथ खूब झगड़ा करती थी. भाई मुझसे करीब तीन साल छोटा है. वो भी बहुत कमाल का गाता है. बचपन में भाई के साथ खूब झगड़े-झमेले होते थे. वो मेरी तुलना में बहुत सीधा था. जबकि मैं एक नंबर की जिद्दी थी. पूरे घर में मेरी दादागिरी चलती थी. हम दोनों ‘म्यूजिक’  को लेकर कई तरह के खेल खेलते थे. मैं गा रही हूं वो बजा रहा है. ऐसे ही तीन अलग अलग ‘लेवल’ पर गमले रखने का ‘प्लांटर’ हुआ करता था तो भाई उन पर तीन थालियां रख देता था. उसमें सिक्के डाल देता था और उसके बाद ‘रूलर’ लेकर उसे ड्रम की तरह बजाया करता था. उसी के साथ मैं गाती थी. हम लोग बाकयदा इसकी टेप रिकॉर्डर में रिकॉर्डिंग करते थे और बाद में सुनते भी थे. ज्यादातर ‘डुएट’ गाने गाते थे.

    ये तो हुई घर में भाई के साथ की जाने वाली शरारतें स्कूल के किस्से भी तो होंगे? अलका बड़े जोश के साथ बताती हैं-

    “हां हा, स्कूल में भी जब पापा मम्मी पैरेंटस टीचर मीटिंग में जाते थे तो मेरी टीचर्स हमेशा एक ही शिकायत करती थीं कि अलका बहुत ‘इंटैलिजेंट’ है लेकिन बात बहुत करती है. इसका ध्यान बात करने में ज्यादा होता है. कुछ बच्चे होते हैं ना खूब शोर मचाते हैं. चिल्लमचिल्ली करते हैं. मुझे बचपन से ही फिल्म देखने का बहुत शौक था. जब भी पापा मम्मी मुझे छोड़कर फिल्म देखने जाते थे तो मैं साथ जाने के लिए खूब जिद करती थी. यहां तक कि जमीन पर लेट जाती थी कि मुझे भी साथ चलना है. मेरे बिना आप लोग फिल्म देखने नहीं जा सकते हैं. कई बार तो पापा मम्मी को मुझे लेकर जाना पड़ता था. इसी तरह की जिद के चलते कई बार तो मम्मी से पिटाई भी खाई है. पापा तो खैर मेरे मारते नहीं थे. मारने की बात सोचते तक नहीं थे. कई बार तो इसलिए भी पिट जाती थी क्योंकि मुझे रियाज नहीं करना होता था. मैं कहती थी कि मैं रियाज नहीं करूंगी. मम्मी गुस्से में कहती थीं कि ऊपरवाले ने तुम्हें इतना हुनर दिया है उसका कुछ करोगी या उसे ऐसे ही बर्बाद कर दोगी. वो मेरे रियाज को लेकर बहुत ‘पर्टिकुलर’ रहती थीं कि मुझे जो हुनर मिला है मैं उसे जितना बेहतर कर सकती हूं करूं और मैं बहुत आलसी थी. मैं रियाज से दूर भागती थी कि मुझे खेलना है. लिहाजा दूसरी बदमाशियों के अलावा रियाज ना करने की वजह से भी बचपन में कई बार मेरी पिटाई हो जाती थी”.

    अलका के मां-पिता की कमिटमेंट ही अलग थी. उन्होंने अलका को बहुत सपोर्ट किया. अलका के पिता ने अपनी नौकरी से प्री मेच्योर रिटायरमेंट ले लिया जिससे वो उन्हें बॉम्बे ले जा सकें. अलका अपने माता-पिता के इस ‘सेक्रिफाइस’ को कैसे याद करती हैं, “आज मैं जो कुछ हूं उन्हीं की बदौलत हूं क्योंकि मैं कभी खुद को लेकर बहुत महात्वाकांक्षी नहीं थी. बहुत ज्यादा रुचि भी नहीं थी. मैं गाना इसलिए गाती थी क्योंकि मुझे गाना अच्छा लगता था. मुझे ये बनना है या वो बनना है जैसी कोई चाहत मेरे अंदर नहीं थी. बल्कि मुझे तो इस बात पर गुस्सा भी आता था कि हर छुट्टियों में मुझे बॉम्बे ले आते हैं. और कहीं घुमाने नहीं ले जाते हैं. जब मैं गुस्सा होती थी तो मम्मी समझाती थीं कि तुम भाग्यशाली हो कि तुम्हें ये टैलेंट मिला है. इसे खराब नहीं करना चाहिए. अपने हुनर को और संवारना चाहिए. जबकि मुझे बहुत चिढ़ होती थी कि मुझे हर बार छुट्टियों में बॉम्बे ले जाते हैं कहते हैं गाना गाओ.


    इसके बाद अलका के पैरेंट्स ने ही उन्हें बड़े बड़े संगीतकारों के पास ले जाना शुरू किया था. इसमें लक्ष्मीकांत प्यारेलाल और कल्याण जी आनंद जी जैसे बड़े नाम थे. वो तजुर्बा कैसा था-

    “जिन संगीतकारों ने भी मुझे सुना मेरा बड़ा हौसला बढ़ाया और साथ ही मेरे पापा मम्मी से ये भी कहा कि अभी अलका बहुत छोटी है. इनकी आवाज में थोड़ी ‘मेच्योरिटी’ आए तब ही इसको ‘प्लेबैक सिंगिग’ करनी चाहिए.  फिर एक रोज ऐसा हुआ कि फिल्म लावारिस के गाने की रिकॉर्डिंग होनी थी. मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है, जब अमित जी ये गाना रिकॉर्ड कर रहे थे तो मैं अपने मम्मी पापा के साथ कल्याण जी आनंद जी के स्टूडियो गई भी थी. मैंने अपनी आंखों से इस गाने को अमित जी को गाते और रिकॉर्ड करते देखा था. इसके बाद ही कल्याण जी भाई ने बोला कि आज हम आपका वॉयस टेस्ट भी लेंगे. अमित जी का वर्जन रिकॉर्ड हुआ. तब तक मैं बैठी बैठी उस गाने को सुन रही थी. कल्याण जी आनंद जी ने रिकॉर्डिंग के बाद मुझसे बोला कि अब इसी गाने को बतौर ऑडिशन आप माइक पर गाइए. मैंने गाना गा दिया. उसके बाद जब मैं बाहर आई तो कल्याण जी आनंद जी ने मुझसे कहा- देखा तुमने आज प्लेबैक सिंगिग कर ली. तुमने आज राखी जी के लिए गाना गा दिया. उसके बाद कल्याण जी आनंद जी मुझे प्यार से अलका यागनिक की जगह अंगना यागनिक बुलाते थे”.

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