• Home
  • »
  • News
  • »
  • lifestyle
  • »
  • किस्सागोई: अनूप जलोटा के 'भजन सम्राट' बनने की पूरी कहानी

किस्सागोई: अनूप जलोटा के 'भजन सम्राट' बनने की पूरी कहानी

अनूप जलोटा ने‘ऐसी लागी लगन’, ‘जग में सुंदर हैं दो नाम’, ‘चदरिया झीनी रे झीनी’ से लेकर ‘रंग दे चुनरिया’ तक दर्जनों मशहूर भजन गाए हैं.

अनूप जलोटा ने‘ऐसी लागी लगन’, ‘जग में सुंदर हैं दो नाम’, ‘चदरिया झीनी रे झीनी’ से लेकर ‘रंग दे चुनरिया’ तक दर्जनों मशहूर भजन गाए हैं.

"एक बार मैने और मेरी माताजी ने ऑल इंडिया रेडियो का ऑडिशन साथ में दिया था. दिलचस्प बात ये है कि जब ऑडिशन के नतीजे आए तो मेरी मां पास हो गई थीं और मैं फेल हो गया था”.

  • Share this:
    जब कला और कलाकार एक दूसरे के नाम से जाने जाएं तो समझिए कि रिश्ता खास है. ये बात हम इसलिए कर रहे हैं क्योंकि आप भजन और अनूप जलोटा को अलग अलग करके सोच हीं नहीं सकते. आप ‘ऐसी लागी लगन’, ‘जग में सुंदर हैं दो नाम’, ‘चदरिया झीनी रे झीनी’ से लेकर ‘रंग दे चुनरिया’ जैसे दर्जनों भजन सुनेंगे तो आपके सामने अनूप जलोटा की तस्वीर खुद ब खुद सामने आ जाएगी. उन्हें भजन सम्राट कहा जाता है. यूं तो उन्होंने गजलें भी गाई हैं लेकिन उनकी पहचान भजन गायक के तौर पर सबसे ज्यादा सशक्त है. आप अनूप जलोटा से मिलेंगे तो सबसे पहले आपके मन में यही सवाल आएगा कि भक्ति रचनाओं को गाने वाले इस कलाकार का बचपन तो काफी धीर-गंभीर किस्म का रहा होगा. लेकिन जब इस सवाल का जवाब मिलेगा तो आपके चेहरे पर मुस्कान बिखर जाएगी.

    उनके बचपन के बारे में पूछने पर अनूप कहते हैं, “अपने बचपन में बड़े भाई अनिल के साथ का एक किस्सा मुझे हमेशा याद आता है. वो भी गाना गाते थे. हम लोग बचपन में रेडियो- रेडियो खेला करते थे. एक दिन भैया ने कहा कि वो गाना गाएंगे और मैं ‘एनाउंसमेंट’ करूं. मैंने कहाकि मैं क्यों ‘एनाउंसमेंट’ करूंगा, आप ‘एनाउंसमेंट’ करिए मैं गाना गाऊंगा. ऐसा करते-करते बात बढ़ गई. मैं जिद पर उतर आया कि नहीं मैं गाना गाऊंगा और आप ‘एनाउंसमेंट’ करिए. उन्होंने गुस्से में मुझे एक थप्पड़ रसीद कर दिया. वो उम्र में मुझसे बड़े थे इसलिए आखिरकार ‘एनाउंसमेंट’ मुझे करना पड़ा. एक थप्पड़ मैं खा ही चुका था तो अंदर से गुस्सा भी आ रहा था. मैंने ‘एनाउंसमेंट’ शुरू की- ये आकाशवाणी का विविध भारती प्रोग्राम है. रात के 11 बज चुके हैं और कार्यक्रम समाप्त होता है. इतना ‘एनाउंसमेंट’ करने के साथ ही दोबारा पिटने के डर से मैं वहां से भाग गया.”

    ये किस्सा इस बात को समझने के लिए काफी है कि अनूप जलोटा का बचपन भी आम बच्चों की तरह ही रहा. अनूप जलोटा का जन्म नैनीताल में हुआ था. कई बार लोग उनसे पूछते हैं कि आप तो लखनऊ के रहने वाले थे फिर जन्म नैनीताल में कैसे हुआ?

    अनूप जी खुद ही मुस्कराते हुए इस सवाल का जवाब देते हैं-“दरअसल पहाड़ी इलाकों में नैनीताल ही था जो लखनऊ के सबसे करीब था जहां  लोग गर्मियों में घूमने जाते थे. ऐसी ही एक गर्मियों में मेरे मम्मी पापा भी नैनीताल घूमने गए थे और जब दोबारा वहां गए तो दो से तीन होकर वापस आए. मैंने अपनी मां की कोख से नैनीताल देखा था और बाद में मेरा मन हुआ कि मैं बाहर आकर भी नैनीताल देखूं तो मैं वहीं पैदा हो गया. फिर जन्म के बाद हम लोग लखनऊ आ गए”.

    अनूप जलोटा के पिता पुरुषोत्तम दास जलोटा संगीत की दुनिया में बड़ा नाम थे. वो शास्त्रीय संगीत और भजन गायकी के जाने माने कलाकार थे. यूं तो उनका जन्म पंजाब में हुआ था. उन्होंने अपनी गायकी की शुरुआत भी वहीं से की थी. लेकिन बाद में वो लखनऊ आकर बस गए और फिर वहीं के होकर रह गए. 2004 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित भी किया गया था. अनूप जलोटा की मां का नाम कमला खन्ना था. वो शादी से पहले बहुत ही अच्छा कथक नृत्य करती थीं लेकिन शादी के बाद उन्होंने पारिवारिक जिम्मेदारियों को प्राथमिकता देते हुए कथक करना छोड़ दिया. वो बहुत शानदार गाती भी थीं. मां की गायकी से ही अनूप जलोटा के पहले ऑडिशन की एक दिलचस्प कहानी जुड़ी है.

    अनूप बताते हैं- “ मैं लखनऊ में पहली बार ऑल इंडिया रेडियो का ऑडिशन देने जा रहा था तो मेरी मां ने कहा कि चलो मैं भी तुम्हारे साथ ऑडिशन देकर आती हूं. मैंने कहा कि मां आप रियाज तो करती नहीं है आप ऑडिशन कैसे देंगी. उन्होंने कहा कि नहीं तुम मेरा भी फॉर्म भर दो मैं भी ऑडिशन दूंगी. मैंने उनका भी फॉर्म भर दिया. दिलचस्प बात ये है कि जब ऑडिशन के नतीजे आए तो मेरी मां पास हो गई थीं और मैं फेल हो गया था”.

    अनूप जलोटा के पहले गुरु उनके पिता जी ही थे. उन दिनों जितने बड़े कलाकार लखनऊ आते थे सो सभी उनके पिता से मिलने जाते थे. अनूप जलोटा को इसका फायदा मिला,  “ बचपन में लखनऊ में ही मैंने पहली बार पंडित जसराज जी को सुना था. फिल्मी गायकों में मैंने मुकेश जी और हेमंत कुमार साहब को वहीं सुना. बेगम अख्तर तो लखनऊ में रहती भी थीं तो उन्हें भी सुनने का सौभाग्य मिला. संगीत की दुनिया में पिता जी के बड़े कद का एक और फायदा था. हमारे यहां कई बड़े कलाकार आया जाया करते थे. बिरजू महाराज जी, गुदई महाराज जी, किशन महाराज जी, पंडित रवि शंकर, उस्ताद अली अकबर खान जी ये सभी लोग पिता जी के मिलने जुलने वालों में थे. पिता जी की वजह से इन सभी कलाकारों का आशीर्वाद हमें मिलता रहा”.

    ये तो हुई बचपन की शैतानियां और संगीत के संस्कार लेकिन पढ़ाई लिखाई का हाल चाल भी जान लेते हैं. अनूप जी कहते हैं-

    “स्कूल में मेरा गाना खूब पसंद किया जाता था. कई टीचर तो ऐसे थे जो इम्तिहान के बाद मुझे घर बुलाया करते थे. मुझे घर भी उस दिन बुलाया जाता था जिस दिन मेरी कॉपी जंचनी होती थी. मैं टीचरों के घर जाकर गाया करता था और मनमर्जी के नंबर मिल जाते थे. बचपन में तो मैं टीचरों को गाने सुना सुनाकर ही पास होता चला गया. उनमें से कुछ टीचर मुझे अब भी मिलते हैं. ये सहाय सिंह स्कूल की बात है. पांचवीं तक की मेरी पढ़ाई उसी स्कूल में हुई थी. मैंने सात साल की उम्र से ही स्टेज शो करने शुरू कर दिए थे. इसका एक फायदा ये था कि मुझे उसी उम्र से पैसे मिलने लगे थे. कहीं पांच रुपया, कहीं 10 रुपया और कहीं 30 रुपया मिलता था. उन दिनों ये बड़ी रकम हुआ करती थी. लिहाजा रुपये पैसे के लिहाज से मुझे कोई परेशानी नहीं थी. इसके अलावा मेरे अंदर स्टेज को लेकर कभी कोई डर नहीं था. फिर बारहवीं तक कानपुर कॉलेज में पढ़े और फिर लखनऊ विश्वविद्यालय से बीए किया. बीए में मेरा विषय था- राजनीति शास्त्र, समाजशास्त्र और हिंदी साहित्य. उसी दौरान मैंने लखनऊ के भातखंडे संस्थान से संगीत की विधिवत तालीम ली. जब मैं थोड़ा और बड़ा हुआ तो मैंने रॉयल कम्पेनियन नाम से एक ऑरकेस्ट्रा बनाया. उस ऑरकेस्ट्रा से हम लोगों ने कई कार्यक्रम किए. उन दिनों स्टेज पर मैं किशोर कुमार के गाने गाता था, गजलें गाता था और भजन भी गाता था. ग्रेजुएशन की पढ़ाई के बाद मैं मुंबई आ गया. उस वक्त मेरी उम्र बीस साल थी. मुंबई में मैंने ऑल इंडिया रेडियो ‘ज्वाइन’ कर लिया. हमें कोरस में गवाया जाता था. करीब 30 गायकों की टोली थी जो एक साथ गाती थी, मैं भी उसी में से एक था. उस समय हमें महीने के 320 रुपये तनख्वाह मिला करती थी. वहां हमें बहुत कुछ सिखने को मिला. उसी दौरान मैंने मुंबई में छोटे-छोटे कार्यक्रम करने भी शुरू कर दिए.



    लेकिन अनूप जलोटा के करियर में असली कहानी 70 के दशक में शुरू हुई. जो किस्सा अभिनेता मनोज कुमार के साथ जुड़ा हुआ है. अनूप जी याद करते हैं- “अभिनेता मनोज कुमार ने मेरा गाना सुना था. उन्हें मेरी आवाज बहुत पसंद आई. उन्होंने सीधा ही ऑफर कर दिया कि तुम मेरी फिल्म में गाओ. उन्होंने फिल्म ‘शिरडी के साईं बाबामें मेरा गाना रख दिया. ये फिल्म 70 के दशक के आखिरी सालों  में आई थी. फिल्म के गाने भी हिट हुए और फिल्म तो खैर हिट हुई ही. इससे ये हुआ कि संगीत की दुनिया में लोगों ने मेरा नाम जानना शुरू किया. लोगों को मेरी आवाज मेरा, अंदाज पसंद आने लगा और फिल्मों में मेरी गायकी का सिलसिला शुरू हो गया. यहीं से भजन गायकी का दौर भी शुरू हुआ”.

    ये भी पढ़ें- किस्सागोई: संतूर और तबला दोनों बजाने की शर्त ने पंडित शिवकुमार के लिए खोले बॉलीवुड के दरवाजे

    पढ़ें Hindi News ऑनलाइन और देखें Live TV News18 हिंदी की वेबसाइट पर. जानिए देश-विदेश और अपने प्रदेश, बॉलीवुड, खेल जगत, बिज़नेस से जुड़ी News in Hindi.

    विज्ञापन
    विज्ञापन

    विज्ञापन

    टॉप स्टोरीज