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मनीषा कोइराला: एक ऐसी एक्ट्रेस जिसने हर बाजी 'मन' से जीती

News18Hindi
Updated: October 19, 2019, 10:01 AM IST
मनीषा कोइराला: एक ऐसी एक्ट्रेस जिसने हर बाजी 'मन' से जीती
मनीषा कोइराला ने बॉलीवुड में अपने दम पर बड़ा मुकाम हासिल किया है.

हर शख्स का एक बचपन होता है और उसके तमाम किस्से होते हैं. उस शख्सियत को दुनिया जाने-पहचाने, उससे पहले की तमाम कहानियां होती हैं. उन्हीं कहानियों को लेकर हम एक सीरीज शुरू कर रहे हैं. हम हर शनिवार आपके लिए ये कहानियां लेकर आएंगे. इस सीरीज में पढ़िए अभिनेत्री मनीषा कोइराला (manisha koirala) का संघर्ष भरा सफर...

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  • Last Updated: October 19, 2019, 10:01 AM IST
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मनीषा कोइराला के परदादा नेपाल के बड़े बिजनेसमैन थे. नेपाल के जाने माने लोगों में उनकी गिनती थी. हुआ यूं कि किसी बात पर नेपाल के शासक के साथ उनकी अनबन हो गई. बात इतनी बढ़ गई कि उन्हें सबकुछ छोड़छाड़ कर हिंदुस्तान आना पड़ा. हिंदुस्तान आने के बाद उनका संघर्ष बहुत बड़ा था. उन्होंने सड़क पर फूल-माला बेचकर अपने बच्चों को पढ़ाया. मनीषा कोईराला की स्मृतियों में ये सारी बातें इसलिए दर्ज हो गईं क्योंकि बचपन में उनकी दादी ये सब उन्हें बताया करती थीं कि हम किस तरह के संघर्षों के बाद आगे आए हैं. मनीषा बताती हैं, 'बचपन की मेरी जो यादें ताजा हैं उनमें काफी सारा संघर्ष है और ढेर सारा स्वाभिमान. मैं एक स्वतंत्रता सेनानी के परिवार से हूं. एक ऐसे परिवार से जिसने स्वतंत्रता के लिए जितने संघर्ष मुमकिन हैं किए. जितनी यातनाएं संभव हैं सब झेली हैं. दादी बताती थीं कि मेरे दादाजी के पास सिर्फ एक जोड़ी कपड़ा हुआ करता था. दिन भर उसी कपड़े को वो पहनते थे, फिर शाम को वो कपड़ा धुला जाता था और रात में दादा जी गमछे में रहते थे. ‘लैंपपोस्ट’ के नीचे पढ़ाई किया करते थे. एक ही चप्पल जो फट चुकी थी उसी को पहनते थे. इस तरह का मुश्किल वक्त उन्होंने देखा था'.

मनीषा कोइराला इन्हीं बातों को सुन सुन कर बड़ी हुईं. आदर्शवाद,संघर्ष, त्याग ये सब कुछ उन्होंने अपने बचपन में देखा.


शहर था बनारस. मनीषा को बनारस अब भी अच्छी तरह याद है-''मैंने बसंत कन्या महाविद्यालय से शुरुआती पढ़ाई की है. मुझे याद है और अब मैं समझ भी सकती हूं कि बचपन में मेरे घर का माहौल वैसा ही था जैसा एक स्वतंत्रता सेनानी के घर का होता है. घर पर काफी विद्वान लोग आते थे. आदर्शवादी लोग आते थे. प्रोफेसर, लेखक, बुद्धिजीवी, राजनेता, चिंतक हर तरह के लोग. मेरे दादा जी की वजह से ज्यादातर ऐसे लोगों का ही घर पर आना जाना था. मुझे याद है कि हमारे घर में दस से ज्यादा लोग होते थे और पूरे घर का खर्च तीन से पांच हजार रुपये में चलता था. मेरा बचपन बेहद औसत और साधारण माहौल में बीता है. जिसमें बहुत सारा आदर्श और बहुत सारी शिक्षा थी".

मनीषा कोइराला की दादी भरतनाट्यम और मणिपुरी डांसर थीं और मां कथक डांसर. लिहाजा उनके घर पर शास्त्रीय गीत-संगीत का बड़ा माहौल था. मनीषा कोइराला ने 3 साल की उम्र से ही मणिपुरी, भरतनाट्यम और कथक सीखना शुरू कर दिया. गीत संगीत सीखने के साथ-साथ जब मनीषा थोड़ी बड़ी हुईं तो वो मुंशी प्रेमचंद और शिवानी की किताबें पढ़ा करती थी. अंग्रेजी के 'क्लासिक' उपन्यासों को भी वो पढ़ती थीं.


बचपन की शरारतों को यादकर मनीषा की आवाज खनक जाती है-''स्कूल में खेल कूद में बहुत मन लगता था. हम लोग बॉस्केटबॉल खूब खेलते थे. मैंने 'स्टेट-लेवल' पर बास्केटबॉल खेला भी है. शरारत के नाम पर यही था कि हम लोग पूरी की पूरी टीम क्लास 'बंक' करके बास्केटबॉल की प्रैक्टिस के लिए चले जाते थे. हम दोस्तों ने ऐसी मस्ती खूब की है. मेरे जो स्कूल के दोस्त थे उनके साथ अच्छा वक्त बीतता था. चूंकि मैं एक राजनीतिक परिवार से थी इसलिए वहां खाने-वाने का माहौल कोई बहुत अच्छा नहीं था. मेरे मुकाबले मेरे दोस्तों के टिफिन बहुत अच्छे थे. उनके यहां से कुछ बनाकर आता था मेरे साथ से 'रेडीमेड टाइप्स' टिफिन मिलता था. यूं समझिए कि दोस्तों की मां रोटी, अचार, सब्जियां देती थीं. जबकि मेरे टिफिन में बड़ा बोरिंग खाना होता था, बहुत हुआ तो ब्रेड-बटर. मुझे याद है कि मैं स्कूल जाने के बाद से ही 'इंटरवल' का इंतजार करने लगती थी. जैसे ही इंटरवल होता था मैं दोस्तों का टिफिन खाती थी. हम सब लड़कियों ने आपस में मिलकर खूब मौज की हैं. अभी भी मैं उनमें से कई दोस्तों के संपर्क में हूं. फोन से, व्हाट्सएप से, जब कभी बनारस जाती हूं उनसे जरूर मिलती हूं. बचपन के दोस्तों से मेरा रिश्ता कुछ इसी तरह का है".

इसके बाद की पढ़ाई के लिए मनीषा कोइराला दिल्ली आ गईं. दिल्ली में उनका एडमिशन धौला कुआं के आर्मी पब्लिक स्कूल में हुआ. उस वक्त वो डॉक्टर बनना चाहती थी. आर्मी पब्लिक स्कूल का उनका एक बड़ा मजेदार किस्सा है. 1985 के आस पास की बात है. 'गर्ल जस्ट वना हैव फन' नाम की एक अमेरिकन कॉमेडी फिल्म आई थी. यंगस्टर्स को लेकर बनाई गई ये बड़ी मजेदार फिल्म थी. फिल्म चाणक्यपुरी में लगी थी, जो मनीषा के स्कूल से ज्यादा दूर भी नहीं था. आखिरकार प्लान के मुताबिक एक दिन मनीषा और दो-तीन लड़कियों का ग्रुप स्कूल बंक करके ये पिक्चर देखने चले गए. असल मुसीबत तब हुई जब उनकी चोरी पकड़ी गई.

मनीषा खुद ही हंसकर बताती हैं "बात हमारे प्रिंसिपल तक पहुंच गई थी. उनको तो भरोसा ही नहीं हुआ कि मैं भी इस तरह की शैतानी कर सकती हूं. वो चौंक गए और बोले- 'इवेन यू मनीषा'. उन्हें भरोसा ही नहीं हो रहा था कि मैं ऐसी बदमाशी करूंगी. खैर, इसके बाद मम्मी को स्कूल बुलाया गया. फिर मैंने सभी से माफी मांगी. हालांकि ऐसा ज्यादा नहीं हुआ. इन्हीं शैतानियों के बीच मैंने स्कूल पास किया".

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फिर मनीषा बॉम्बे पहुंची. बड़े संघर्ष के बाद सौदागर मिली. सौदागर की कामयाबी के बाद उनका सारा सफर इतिहास में दर्ज है. लेकिन मनीषा की जिंदगी का बड़ा पक्ष उनका कैंसर सर्वाइवर होना भी है. अपने कैंसर के दिनों को याद करके मनीषा एक किस्सा सुनाती हैं- मैं हमेशा से एक 'डेड्रीमर' थी. दिन में ही सपने देखती रहती थी. स्कूल की पढ़ाई में मेरा ध्यान कम ही रहता था. मैं हमेशा किसी सोच में खोई रहती थी. लेकिन अगर कोई मुझे चैलेंज करता था तो मैं अपनी पूरी जान लगाकर उसको गलत साबित कर देती थी. मेरे अंदर बहुत दृढ़ संकल्प था. मुझे याद है कि स्कूल में किसी ने मुझे चिढ़ाया कि तुम्हारी साइंस बहुत कमजोर है, तो तुम डॉक्टर नहीं बन सकती हो. उसके बाद हर वक्त मेरे दिमाग में यही बात घूमती रहती थी. मैंने दिन-रात एक कर दिया और नतीजा ये हुआ कि उस बार साइंस में मेरे सबसे ज्यादा नंबर आया.

ये बात बचपन से ही मेरे स्वभाव में थी कि मैं कोई भी चैलेंज स्वीकार करने के लिए तैयार रहती थी. दरअसल, ‘चैलेंज’ ना हो तो मेरा ‘अप्रोच’ बड़ा ढीला-ढाला था. हां, अगर किसी ने भड़का दिया तो फिर मैं भड़क जाती थी. मेरे इसी स्वभाव ने मुझे कैंसर के खिलाफ जीत दिलाई.

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First published: October 19, 2019, 10:01 AM IST
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