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किस्सागोई: वो शख्सियत जिसने पढ़ाई खत्म करने से पहले ही साइन कर ली फिल्म

News18Hindi
Updated: November 30, 2019, 12:03 PM IST
किस्सागोई: वो शख्सियत जिसने पढ़ाई खत्म करने से पहले ही साइन कर ली फिल्म
शबाना आज़मी को बचपन में ही वो माहौल मिल गया था, जो किसी कलाकार को शीर्ष पर ले जाने के लिए जरूरी होता है.

बचपन में शबाना आजमी (Shabana Azmi) को लगता था कि उनके पिता कुछ काम नहीं करते. घर पर बैठकर सिर्फ किताबें पढ़ते हैं और लिखते रहे हैं. लेकिन जब उन्हें सच का पता चला तो हैरान रह गईं और गर्व करने लगीं.

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  • Last Updated: November 30, 2019, 12:03 PM IST
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शबाना आजमी हिंदुस्तान के समानांतर सिनेमा का बहुत बड़ा नाम हैं. बॉक्स ऑफिस की ‘मेनस्ट्रीम’ फिल्म से लेकर ‘इंडिपेंडेंट’ फिल्मों तक में उन्हें शानदार रोल मिल रहे हैं. वो विदेशी फिल्मों में भी लगातार काम कर रही हैं. हाल के दिनों में उन्होंने ब्लैकप्रिंस नाम की एक अमेरिकन फिल्म की, जिसमें उन्होंने महारानी का रोल किया. सिग्नेचर मूल एक अमेरिकन फिल्म है, या ईदगाह जो प्रेमचंद की कहानी है, या अपर्णा सेन की फिल्म ‘सुनाटा’ इन सभी फिल्मों में शबाना आजमी बिल्कुल अलग किरदार में दिखी हैं. तो इस हफ्ते की हमारी किस्सागोई की मेहमान भी शबाना आजमी ही हैं. हमेशा की तरह शुरूआत बचपन के किस्से से...

शबाना बताती हैं- “जब मैं तीन साल उम्र की थी तो मुझे लगता था कि बाकी बच्चों के पापा तो पैंट-शर्ट पहनते हैं जबकि अब्बा हमेशा सफेद कुर्ता पायजामा पहनते थे. मुझे उनकी ये बात अच्छी नहीं लगती थी. इसके अलावा दूसरी बात मुझे ये भी नहीं समझ आती थी कि अब्बा हमेशा घर पर बैठकर लिखते क्यों रहते हैं, वो कभी ऑफिस क्यों नहीं जाते? बाकि बच्चों के पापा तैयार होकर सुबह ऑफिस जाते थे और शाम को लौटते थे, जबकि अब्बा को मैंने जब भी देखा वो घर पर या तो लिखते रहते थे या कुछ पढ़ते रहते थे. मुझे लगता था कि मेरे अब्बा तो कोई काम ही नहीं करते. कुछ समय बाद जब थोड़ा बड़ी हुई कुछ शायरों को पढ़ना समझना शुरू किया तो समझ आया कि शायर होता क्या है. इसके अलावा एक बार दोस्तों ने अब्बा की तस्वीर पेपर में दिखाई तो समझ में आना शुरू हुआ कि अब्बा की शख्सियत क्या है. इसके बाद तो मैं बड़े फक्र से कहती थी कि मैं कैफी आजमी की बेटी हूं”.


शायरों के जीवन में तो फाकामस्ती भी खूब होती है. शबाना की मां भी थिएटर से जुड़ी हुई थीं. शबाना के बचपन के एक बड़े फैसले में मां का बहुत बड़ा रोल था. उसकी कहानी दिलचस्प है. शबाना बताती हैं-“जब मैं छोटी थी तो अब्बा ने मुझे एक उर्दू स्कूल में डाल दिया था. मैं उस स्कूल में जाने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थी. मैं बार बार मना करती थी और गुस्सा दिखाने के लिए पैर घिसना शुरू कर देती थी. एक रोज मम्मी ने ने कहा कि मेरी बेटी बेवकूफ नहीं है वो विरोध कर रही है वो उस स्कूल में नहीं जाना चाहती है. उस वक्त क्वींस मेरी इंग्लिश स्कूल था. उसकी फीस 30 रुपये थे, अब्बा के पास कुल 40 रुपये होते थे. फिर भी उन्होंने मुझे उस स्कूल में पढ़ने के लिए भेजा. उन्होंने कभी मुझे डांटा नहीं”.



शबाना आजमी बचपन से ही गंगा जमुनी तहजीब में पली हैं. घर पर होली दीवाली ईद क्रिसमस सब मनाया जाता था. बड़े बड़े शायरों का उनके यहां आना जाना था. फिराक गोरखपुरी, जोश मलीहाबादी, फैज अहमद फैज, साहिर लुधियानवी, मजरूह साहब. इसके अलावा मदन मोहन, बेगम अख्तर, एसडी बर्मन भी उनके यहां ही ठहरते थे. जीवन के तमाम सिद्धांत बचपन में ही बने.

ऐसा ही एक किस्सा वो बताती हैं- एक रोज अब्बा ने मुझे एक काली गुड़िया लाकर दी. मैं छोटी थी मुझे भी बाकी लड़कियों की तरह वो भूरे बाल और नीली आंखों वाली गुड़िया चाहिए थी. उस रोज अब्बा ने समझाया था कि ‘ब्लैक इस ब्यूटीफुल टू’. ये उनकी और मम्मी की परवरिश का ही नतीजा था कि हम उस बात को समझ पाए. जिस तरह का ‘लिट्रेचर’ हमने उस जमाने में पढ़ा उसका प्रभाव हमेशा रहा है. आज मैं जो कुछ हूं वो उसी विचारधारा का नतीजा है. अब्बा के पास जो भी पैसे होते थे वो कॉम्युनिस्ट पार्टी को दे देते थे. अपने लिए वो सिर्फ चालीस रूपये रखते थे. जाहिर है पैसों की किल्लत होने लगी. ऐसे में मम्मी ने ऑल इंडिया रेडियो में काम किया. फिर पृथ्वी थिएटर ज्वाइन किया”.


कैफी आजमी से जुड़ा कोई और किस्सा जो आपको हमेशा याद आता हो-“अब्बा के लिखने का अंदाज भी अलग था. मान लीजिए उनके ऊपर किसी गाने को लिखने की ‘डेडलाइन’ है तो उस दिन उन्हें घर के तमाम दूसरे काम याद आने लगते थे. वो अपनी लिखने की मेज साफ करने लगते थे. लंबे समय से जिन्हें खत नहीं लिख पाए थे उन्हें खत लिखने बैठ जाया करते थे. लगातार इस कोशिश में रहते थे कि गाने को लिखना कैसे टाला जाए. लेकिन सच ये है कि उस पूरी प्रक्रिया में उनकी ‘क्रिएटिवटी’ अंदर अंदर चलती रहती थी. एक बार चेतन आनंद ने अब्बा से अपनी फिल्म के लिए गाना लिखने को कहा. उन दिनो चेतन आनंद की कुछ फिल्में अच्छी नहीं चली थीं. अब्बा बोले- क्यों मेरे से लिखवा रहे हैं? हम दोनों के सितारे आजकल गर्दिश में है. चेतन आनंद ने कहा क्या पता इसके बाद ही सितारे चमक जाएं. फिर हकीकत फिल्म बनी. अब्बा ने यूं तो उन्होंने तमाम कमाल की चीजें लिखी हैं, लेकिन आप अर्थ का वो गाना सुनिए. कोई ये कैसे बताए कि वो तन्हा क्यों है, वो जो अपना था वो और किसी का क्यों है... इतनी सीधी तरह से कम शब्दों में इतना खूबसूरत गाना हिंदी फिल्मों में मैंने नहीं सुना है”.
शबाना आजमी एक बार आजमगढ़ के उस गांव में गई जहां उनके अब्बा का जन्म हुआ था. ये 1980 के आस पास की बात है. गांव का नाम था- मिजवां. आजमगढ़ के उस गांव में पहुंचकर वो हैरान रह गईं . उस गांव में बिजली पानी जैसी बुनियादी सहूलियतें तक नहीं थी.


शबाना उस दिन को याद करके कहती हैं-“ वहां जाकर मैंने सोचा कि अब्बा ने वहां से निकलकर पूरी दुनिया में अपनी पहचान बनाई थी. अब्बा कमाल ही थे”. इस बात में कोई दो राय है भी नहीं कि कैफी साहब कमाल की शख्सियत थे. खैर, अब सीधे वहां आते हैं जहां से शबाना आजमी को व्यक्तिगत पहचान मिली. जब उन्होंने फिल्मों में अभिनय किया. शबाना बताती हैं- “मैं बहुत भाग्यशाली थी मुझे फिल्मों में आने के लिए कोई संघर्ष नहीं करना पड़ा. मैं फिल्म इंस्टीट्यूट में पढ़ती थी तब मैं गोल्ड मेडलिस्ट थी. शुरू से ही मुझे आत्माराम की स्कॉलरशिप मिली थी और ख्वाजा अहमद अब्बास ने मुझे तब ही साइन कर लिया था जब मैं ‘स्टूडेंट’ थी. मैंने कांतिलाल राठौर की ‘परिणय’ भी तब ही साइन कर ली थी जब मैं इंस्टीट्यूट में थी. यानी जिस दिन मेरा ‘इंस्टीट्यूट’ का ‘कोर्स’ खत्म हुआ है उसके अगले दिन से मैं फिल्म परिणय में शूट कर रही थी.

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First published: November 30, 2019, 12:03 PM IST
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