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किस्सागोई: बड़े दिलचस्प हैं शेखर कपूर के बचपन में इंडिया गेट पर जामुन तोड़कर खाने के किस्से

News18Hindi
Updated: February 9, 2020, 11:08 AM IST
किस्सागोई: बड़े दिलचस्प हैं शेखर कपूर के बचपन में इंडिया गेट पर जामुन तोड़कर खाने के किस्से
मशहूर अभिनेता, निर्देशक और लेखक शेखर कूपर.

"मुझे याद है कि मैं बचपन में गणित में कमजोर था. इसलिए गणित की क्लास मुझे और बड़ी दिखती थी. दिलचस्प बात ये है कि कुछ साल पहले भी जब मैं मॉर्डन स्कूल गया तो वो प्रिसिंपल सर के ऑफिस का ‘कॉरीडोर’ मुझे अब भी डरा रहा था."

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शेखर कपूर हिंदी फिल्मों से जुड़ा वो नाम है जिसकी पहचान विश्व सिनेमा में भी है. भारत में अगर उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया है तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वो बाफ्टा अवॉर्ड जीत चुके हैं. 80 के दशक में उन्हें फिल्म मासूम और मिस्टर इंडिया के लिए जाना जाता है. 90 के दशक में उन्होंने बैंडिट क्वीन बनाई. अभिनेता, निर्देशक और प्रोड्यूसर के तौर पर बड़ी पहचान बना चुके शेखर कपूर का जन्म लाहौर में हुआ था. उम्र अभी दो साल से भी कम थी, जब बंटवारे की वजह से उनका परिवार भारत आ गया. बचपन एक मध्यमवर्गीय परिवार के बच्चों के जीवन की तरह ही बीता. जिसमें संघर्ष था, शेखर बताते हैं- “ मुझे याद है कि मां दिल्ली की बसों में धक्के खाकर काम करने जाती थीं. यहां तक कि तब भी जब वो गर्भवती थीं. उस जमाने में भी दिल्ली की बसों का सफर बहुत आसान नहीं होता था. बाद में मेरे पिता जी की प्रैक्टिस अच्छी चलने लगी और हमारे आर्थिक हालात सुधरते चले गए. दिल्ली आने के बाद मेरा एडमिशन मॉर्डन स्कूल में हुआ. मॉर्डन स्कूल के प्रिसिंपल पिता जी  के बड़े भाई थे. बाद में जब ये बात मेरे दोस्तों को पता चली तो वो मेरा मजाक भी उड़ाते थे”.

तो क्या कभी इस बात का कोई फायदा भी हुआ कि पिता जी के भाई स्कूल प्रिंसिपल हैं? शेखर कहते हैं कि “ऐसा कोई फायदा मुझे मिला नहीं. मुझे कभी इस बात का ‘फेवर’ नहीं मिला कि वो मेरे पिता के भाई हैं”.

शेखर कपूर के व्यक्तित्व में एक मस्तमौला, कुछ कुछ अक्खड़ और बेफिक्र किस्म का स्वभाव दिखता है. लेकिन बचपन में भी क्या ये बेफिक्री उनमें थी? स्कूल के दिनों को याद करके शेखर कहते हैं-  

यूं तो मेरा बचपन एक आम बच्चे की तरह ही था. मैं पढ़ने में ज्यादा ध्यान नहीं लगाता था. क्लास में टीचर कुछ पढ़ा रहे हैं और मैं अपने आप में ही खोया हुआ हूं. कोई कहानी बुन रहा हूं. टीचर अक्सर कहते थे कि तुम्हारा ध्यान कहां रहता है. मुझे खुद भी नहीं पता कि मेरा ध्यान कहां रहता था. इन सारी छोटी बड़ी शैतानियों के बीच बस इस बात का ध्यान रखता था कि मुझे फेल नहीं होना है”. बाद में बतौर निर्देशक शायद वही कहानियां उनकी फिल्मों में बीच बीच में दिखाई दीं.



शेखर कपूर की जिंदगी के एक और दिलचस्प पहलू का किस्सा जानना जरूरी है. जाने माने स्टार देव आनंद, शेखर कपूर  के करीबी रिश्तेदार थे. ये वो दौर था जब लड़कियां देव आनंद की जबरदस्त दीवानी थीं. अब अगर देव आनंद करीबी रिश्तेदार हों तो लोग कैसी कैसी डिमांड करते हैं, शेखर कहते हैं-

उनकी वजह से वो मुझे भी बहुत तंग करती थीं. मैं भी अपनी स्टाइल में रहता था, मैंने बड़े बड़े बाल रखे थे. हालांकि मुझे ये बात अच्छी तरह समझ आती थी कि उन दिनों लड़कियां मेरे पास सिर्फ इसलिए मंडराती थीं क्योंकि वो देव आनंद साहब से मिलना चाहती थीं.बचपन के साथ जो पहला शब्द जुड़ता है वो है बदमाशी. गंभीर से गंभीर व्यक्तित्व वाले के बचपन के कुछ किस्से, कुछ शैतानियां, कुछ आदतें और कुछ डर साथ चलते हैं. वो शैतानी कौन सी है, शेखर बताते हैं-

मेरा सबसे मजेदार किस्सा देरी से स्कूल पहुंचने का है. दरअसल, मैं निजामुद्दीन के रास्ते होता हुआ बाराखंभा रोड पर मॉर्डन स्कूल जाता था. रास्ते में इंडिया गेट पड़ता था. इंडिया गेट के लॉन में उन दिनों शहतूत और जामुन के खूब सारे पेड़ थे. ताजे ताजे जामुनों को देखकर स्कूल जाने का प्लान कई बार बदला गया है. मैं वहां रूककर पहले जी भर के जामुन खाता था, उसके बाद स्कूल के लिए निकलता था. मुसीबत ये थी कि जामुन खाने के चक्कर में ‘लेट’ हो जाता था. मुझे याद है कि कई बार क्लास में देरी से पहुंचने पर मैंने बड़े बड़े बहाने सुनाए, लेकिन बहाने मुंह खोलते ही बेकार हो जाते थे. दरअसल, मुंह खुलते ही जामुनी रंग की जीभ टीचर को दिख जाती थी और उन्हें समझ आ जाता था कि देरी से क्लास में आने के पीछे माजरा क्या है.

बचपन का कौन सा डर है जो अब तक शेखर कपूर के दिलो दिमाग से नहीं गया. वो बताते हैं -

“मुझे याद है कि मैं बचपन में गणित में कमजोर था. इसलिए गणित की क्लास मुझे और बड़ी दिखती थी. दिलचस्प बात ये है कि कुछ साल पहले भी जब मैं मॉर्डन स्कूल गया तो वो प्रिसिंपल सर के ऑफिस का ‘कॉरीडोर’ मुझे अब भी डरा रहा था. दरअसल, जब आप किसी चीज से डरते हों तो वो आपको और डराती है, मेरे ऊपर ये बात गणित को लेकर लागू होती थी. गणित की क्लास में ब्लैकबोर्ड और चॉक को देखकर मुझे डर लगता था. लगता था कि वो मुझसे दूर भाग रहे हैं. कैमिस्ट्री में मैं खूब ‘एक्सपेरीमेंट’ करता था. कभी पोटैशियम सल्फेट तो कभी सल्फ्यूरिक एसिड. कैमिस्ट्री लैब के ‘एक्सपेपीमेंट’ मुझे बहुत आकर्षित करते थे. कभी किसी ‘लिक्विड’ को तो कभी किसी पाउडर को इधर उधर मिलाना मुझे पसंद था. बीकर से गैस निकलना, रंगों का बदल जाना ये सब कुछ मुझे बहुत अच्छा लगता था. शेखर आगे बताते हैं- “ मैंने उन दिनों अपने स्कूल को तैराकी में भी ‘रिप्रजेंट’ किया.”

ये जानकारी कम ही लोगों को होगी कि शेखर कपूर और मशहूर डॉक्टर नरेश त्रेहन साथ ही पढ़ते थे. दोनों बॉयलॉजी में एक साथ प्रैक्टिकल करते थे. उन दिनों बायलोजी के प्रयोग में मेढ़क काटने को मिलते थे. वो क्लोरोफॉर्म की महक अब भी शेखर कपूर की नाक में रहती है. वो बताते हैं – “ यूं तो मुझे सबसे ज्यादा ‘आर्ट’ क्लास में मजा आता था. वहां कोई बंदिश भी नहीं थी. जितने रंग चाहे उतने रंग मिला लो, जितने कागज चाहे उतने कागज रंग डालो. कोई रोक टोक नहीं. अपनी फिल्मों को लेकर भी इसी बंदिश से मैं बचता रहा हूं.

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First published: February 9, 2020, 11:08 AM IST
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