लाइव टीवी
Elec-widget

किस्सागोई: 'रंगमंच के शाह' नसीरुद्दीन की जिंदगी की दिलचस्प कहानी

News18Hindi
Updated: November 16, 2019, 1:20 PM IST
किस्सागोई: 'रंगमंच के शाह' नसीरुद्दीन की जिंदगी की दिलचस्प कहानी
नसीरुद्दीन शाह

नसीरुद्दीन शाह (Naseeruddin Shah) पढ़े लिखे परिवार से आते हैं. उनका जन्म लखनऊ के करीब बाराबंकी में हुआ था. नसीर के बचपन के दिन की यादें कुछ यूं हैं...

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 16, 2019, 1:20 PM IST
  • Share this:
नसीरुद्दीन शाह (Naseeruddin Shah) भारतीय फिल्म इंडस्ट्री का बहुत बड़ा नाम हैं. आप रंगमंच से लेकर, कला सिनेमा या कॉमर्शियल सिनेमा चाहे जिस कसौटी पर उनका आंकलन करें, आप पाएंगे कि वो दूसरों से बिल्कुल अलग हैं. हम नसीरुद्दीन शाह को उनके बचपन में लेकर गए. उनके जन्म को लेकर एक कहानी बहुत दिलचस्प है. आप उनके जन्म की सही तारीख नहीं पता कर सकते. ऐसा इसलिए कि खुद नसीर को ये जानकारी नहीं है. ये दिलचस्प कहानी क्या है, नसीर याद करते बताते हैं- 'वो या तो 1949 के जुलाई का महीना था या फिर 1950 के अगस्त का. अम्मी को भी मेरा जन्मदिन ठीक से याद नहीं. वो बस इतना याद करके कहती थीं कि तुम रमजान में पैदा हुए थे. अब उनकी इस बात से मेरे जन्म के साल का अंदाजा लगाना संभव नहीं है. बाद में अब्बा ने जब स्कूल में एडमिशन कराया तो मेरा जन्मदिन 16 अगस्त 1950 लिखाया गया. इसी गफलत का नतीजा ये हुआ कि नसीरुद्दीन शाह के सही जन्मदिन की जानकारी आपको कहीं नहीं मिलेगी.

नसीर पढ़े लिखे परिवार से आते हैं. उनका जन्म लखनऊ के करीब बाराबंकी में हुआ था. नसीर के बचपन के दिन की यादें कुछ यूं हैं, 'मेरी अम्मी को कुल 5 बच्चे हुए थे, जिसमें से हम तीन बचे. अब्बा ये बात कई बार कहते थे कि उन्हें एक लड़की की चाहत थी, लेकिन वो पूरी नहीं हुई. अब्बा मुझे बहुत प्यार करते थे. ऐसा मुझे बाद में अम्मी ने बताया था. अब्बा मुझे अपनी पीठ पर घुमाया करते थे. अम्मी कहती थी कि बचपन में मेरे जैसे घने और घुंघराले बाल उन्होंने किसी बच्चे के नहीं देखे. मैं अब्बा को बाबा बुलाता था. 1947 में जब आजादी के बाद मुल्क का बंटवारा हुआ तब मेरे बड़े भाई जहीर करीब दो साल के थे. जमीर बस पैदा ही हुआ था और मेरा तो खैर अस्तित्व ही नहीं था. बंटवारे के कुछ साल बाद मेरा जन्म हुआ इसलिए मुझे बंटवारे से जुड़ी ऐसी कोई बात नहीं याद आती है जो मेरे जेहन में हो. वो जो सारे खून खराबे थे वो तब तक खत्म हो चुके थे. जाहिर है मेरी उम्र इतनी कम थी कि उस वक्त की कोई याद ताजा नहीं. यूं भी मैं बाराबंकी में था इसलिए वो मेरे लिए काफी महफूज जगह थी'.

नसीर पढ़े लिखे परिवार से आते हैं. उनका जन्म लखनऊ के करीब बाराबंकी में हुआ था.


नसीर के पिता प्रोवेंसियल सिविल सर्विसेस में थे. वो बाराबंकी के तहसीलदार थे. आजादी के कुछ ही समय बाद की पैदाइश पर नसीर पर कुछ असर पड़ा हो ऐसा उन्हें याद नहीं. हां, एकाध बार उन्होंने मोटरकेड में अंग्रेज सिपाहियों को देखा. ये 1951 या 1952 के आसपास की बात होगी. नसीर को ये सारी बातें किसी और वजह से याद हैं जो बंटवारे से जुड़ी हुई है. नसीर के वालिद के भाई बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले गए थे.

नसीर याद करते हैं, 'दरअसल, मेरी अम्मी के भाई भी पाकिस्तान चले गए थे. उस वक्त उन दोनों पर क्या गुजरी होगी इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है. भाई-भाई में नाइत्तफाकी हो गई होगी और शायद तलवारें खींचने की नौबत आ गई होगी. खैर, मेरे वालिद ने तय किया कि वो यहीं हिंदुस्तान में रहेंगे और बाद में एक लम्हें के लिए भी कभी उन्हें इस बात का पछतावा नहीं हुआ, ना ही मुझे और मेरे बाकि घरवालों को. जब मैं धीरे-धीरे बड़ा हो रहा था तब मैंने महसूस किया कि समाज में बंटवारा बहुत ही जहरीले किस्म का था. हर मुसलमान के घर में हिंदुओं की बुराईयां की जाती थीं और यकीनन हर सिख या हिंदू परिवार में मुसलमानों की बुराइयां की जाती थीं. इस तरह की बातें मैंने भी सुनी थीं और दूसरे मजहब के लोगों ने भी सुनी होंगी लेकिन इस तरह की बातों का मुझ पर या मेरी जिंदगी पर कोई असर पड़ा हो ऐसा कुछ हुआ नहीं'.


नसीर साहब, चलिए हम वापस आपके बचपन में लौटते हैं. नसीर मुस्करा कर कहते हैं- 'धीरे धीरे मेरा स्कूल जाना शुरू हुआ. मुझे याद है कि किंडरगार्डन में मेरी एक टीचर थीं- मिस ब्रेंडिश. वो मुझे बहुत पसंद थीं. मुझे आज भी वो याद हैं. एक आदर्श टीचर कैसा होना चाहिए ये सोचने पर मुझे आज भी वही याद आती हैं. अगर मुझे सही याद है तो बचपन की उन क्लासेस का रिपोर्ट कार्ड भी मेरी पत्नी रत्ना ने अपने ‘पर्सनल कलेक्शन’ में कहीं संभाल कर रखा है. एक बार स्कूल का एक बड़ा दिलचस्प वाकया याद आ रहा है. मेरे स्कूल में स्पोर्ट्स डे का ‘प्राइज डिस्ट्रीब्यूशन’ था. मुझे कोई इनाम नहीं मिलना था. अचानक कुछ ऐसा हुआ कि मेरे पीछे से किसी ने मुझे धक्का देकर कहा कि जल्दी से स्टेज पर जाओ तुम्हारा नाम बुलाया गया है. मैं कुछ सोचने समझने से पहले स्टेज की तरफ बढ़ गया. मैंने वहां चीफ गेस्ट से हाथ मिलाया, उन्होंने मेरे हाथ में एक ‘कप’ दिया. वो ‘कप’ आज भी मेरे पास सुरक्षित रखा है. बस ये नहीं पता कि वो ईनाम मुझे किस चीज के लिए मिला था क्योंकि मैंने तो कुछ भी ऐसा नहीं किया था जिसके लिए मुझे ईनाम मिले. अब मुझे ऐसा लगता है कि हो सकता है कि उस रोज स्टेज से किसी और का नाम बुलाया गया हो और वो अपना नाम नहीं सुन पाया, जिसके बदले में मुझे भेज दिया गया और मैं ईनाम लेकर वापस भी आ गया.

ये अभिनय के बीज कहां से आए?
Loading...

नसीर बताते हैं- 'बचपन की एक और छवि मुझे याद आती है. वैसे मुझे अच्छी तरह याद नहीं लेकिन एक धुंधली सी याद जरूर है कि बचपन में मैं एक बार किसी की गोद में बैठकर एक टेंट में एक कार्यक्रम देख रहा था. बाबा अम्मी नहीं थे वो कोई और ही था जिसकी गोद में बैठकर मैं वो कार्यक्रम देख रहा था. वहां शायद रामलीला का मंचन हो रहा था या फिर कोई नौटंकी थी, ये बात मुझे ठीक से याद नहीं. ये भी मुमकिन है कि वो कोई सर्कस रहा हो. लेकिन मुझे ये जरूर याद है कि वहां एक आदमी था जिसके चेहरे पर रंग पेंट किया हुआ था. उसकी बड़ी बड़ी आंखें थीं. अपने अभिनय के दौरान वो बीच बीच में मेरी तरफ आकर बड़ी ध्यान से देख रहा था. मुझे उसका मंच से ठहरकर मुझे देखना अच्छी तरह याद है. उस रोज मैंने जो कुछ भी देखा उसने मुझे काफी प्रभावित किया. उस आदमी का चेहरा. उसका अभिनय. सबकुछ कहीं मन में गहरे बैठ गया'.

तो अभिनय और पढ़ाई का हिसाब किताब कैसा रहा?
नसीर बताते हैं, 'पढाई में मेरी हालत बहुत खराब थी. पढ़ाई में बिल्कुल दिल ही नहीं लगता था. ना ही मैं लगाने की कोशिश करता था. मैंने आठवीं क्लास से ही सिगरेट पीना सीख लिया था. उस साल का भी रिजल्ट कार्ड मेरे पास रखा होगा, जिसके मुताबिक मैं क्लास में 50वीं पोजीशन पर था. दिलचस्प बात ये है कि मेरी क्लास में कुल पचास बच्चे ही थे. खैर, इसी बीच बाबा का ट्रांसफर अजमेर हो गया. उनका रिटायरमेंट भी करीब था. उन दिनों रिटायरमेंट की उम्र पचास साल हुआ करती थी. बचपन में कुछ कविता-कहानियां के अलावा मुझे क्रिकेट का जबरदस्त चस्का लगा था. उन दिनों सभी टेस्ट मैच के स्कोर मैं अपने रिकॉर्ड में रखा करता था. उन दिनों आज की तरह बहुत ज्यादा मैच नहीं खेले जाते थे. मैंने कुछ मैच भी खेले, क्रिकेटर बनने का ख्याल भी आया लेकिन परेशानी ये थी कि ना तो कभी किसी ने मुझे बताया और ना ही मैं खुद से समझ सका कि मैं कैसा खिलाड़ी हूं. हां, मुझे इतना जरूर याद है कि प्रभात कपिल नाम के एक लड़के ने एक बार मैच में हैट्रिक ली थी और मैं उसका तीसरा शिकार था. बाद में जब मैं बड़ा हुआ तब जाकर कहीं पढाई में थोड़ा ध्यान लगाना शुरू किया.

वह बताते हैं, 'मैंने अलीगढ़ में पढ़ाई की. अलीगढ़ में तीन साल रहकर ही मैंने अपनी जुबां बोलना सीखी क्योंकि उससे पहले मैं अंग्रेजी स्कूलों में ही था. अलीगढ़ में जब मैं तीन साल रहा तो वहां हर किसी से बोलचाल में उर्दू बोलनी पडती थी. इससे उर्दू में मेरी थोड़ी रवानी बढ़ गई. जिसका बाद में बहुत फायदा हुआ. अलीगढ़ में कुछ उस्ताद मुझे मिले, वहां जाहिदा जैदी साहिबा थीं जो इंग्लिश डिपार्टमेंट में थीं और मुनीबुर रहमान साहब थे इस्लामिक स्टडी में थे. ये दोनों ही लोग ड्रामा के बेहद शौकीन थे और इन दोनों में मेरी बहुत हौसला अफजाई की. अब मैं याद करता हूं तो मुझे लगता है कि अलीगढ़ ने मुझे जो कुछ दिया वो एक खजाना है. अलीगढ़ से ग्रेजुएशन के बाद ही मैं नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा गया था. जिसके बाद में मेरी जिंदगी में थिएटर और एक्टिंग बहुत बड़ी भूमिका में आ गए.'

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए लाइफ़ से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: November 16, 2019, 1:18 PM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...