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किस्सागोई: बड़ा रोचक रहा है गायकी के उस्ताद मोहन लाल उर्फ छन्नू लाल मिश्र का बचपन

News18Hindi
Updated: November 9, 2019, 10:02 AM IST
किस्सागोई: बड़ा रोचक रहा है गायकी के उस्ताद मोहन लाल उर्फ छन्नू लाल मिश्र का बचपन
छन्नूलाल मिश्र के प्रख्यात शास्त्रीय गायक हैं.

पंडित छन्नूलाल मिश्र (Pt. Channulal Mishra) के बचपन की ऐसी तमाम यादें हैं, जो हजारों किस्सों को समेटे हैं. लेकिन संगीत की उनकी लगन उनकी बचपन की ही नींव है.

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  • Last Updated: November 9, 2019, 10:02 AM IST
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आज कहानी एक ऐसे कलाकार की जिसके बचपन का नाम शायद ही कोई जानता हो. लेकिन जिनका प्रचलित नाम संगीत की दुनिया में इज्जत से लिया जाता है. जिनके कार्यक्रमों में श्रोताओं की जमकर भीड़ जमा होती है. जिनकी सहज गायकी और गायकी का अंदाज देश और दुनिया में लोगों को पसंद आता है. ये कहानी है पंडित मोहन लाल मिश्र की. चलिए अब आप बताइए क्या आप मोहन लाल मिश्रा को जानते हैं? मोहन लाल मिश्रा ही दरअसल पंडित छन्नू लाल मिश्र हैं- “दरअसल उस जमाने में बच्चों की लंबी उम्र के लिए उनके इसी तरह के नाम रखे जाते थे. घोरू, पतवारू...बड़े मजाकिया नाम होते थे, उसका मकसद होता था कि बच्चे को बुरी नजर से बचाया जा सके. हमारे नाम का तो खैर मतलब ये था कि जो शरीर में 6 तरह के विकार से मुक्त हो, उसका नाम है छन्नू. इसीलिए हम मोहन लाल मिश्रा की बजाए इसी नाम के साथ पले बढ़े”. पंडित छन्नू लाल मिश्र का जन्म आजमगढ़, उत्तर प्रदेश के हरिहरपुर गांव में हुआ था. उनकी पैदाइश 1936 की है. हरिहरपुर उस इलाके का जाना माना गांव है.

अपने बचपन के दिनों को याद करके पंडित छन्नू लाल मिश्र कहते हैं-

हमारे पिता जी का नाम बद्री प्रसाद मिश्रा था. हमको संगीत की शुरूआती शिक्षा दीक्षा भी हमारे पिता जी से ही मिली. पिता जी भी तबला बजाते थे इसलिए घर में संगीत का माहौल था. मुझे याद है कि हमारे परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. पिता जी जो थोड़ा बहुत कमाते थे, उसी से जो रूखा सूखा मिलता था हम लोग खा लेते थे. बचपन में हमारे घर में मोटा अनाज बनता था, हम लोग वही खाते थे. हालांकि संयोग देखिए कि आज के मुकाबले में अगर तुलना की जाए तो स्वाद उसी खाने का अच्छा लगता था. आज के दौर में खाने पीने से लेकर हर चीज में चमक दमक बहुत है, लेकिन उनका असली रंग फीका ही है. खैर, तो इन सारी आर्थिक चुनौतियों के बाद भी हमारे पिता जी हमको बहुत प्यार करते थे. बचपन से ही वो कहा करते थे कि तुमको बड़े होकर हमारा नाम करना है. खूब सारा नाम, इतना नाम कि हर कोई जान जाए कि हम लोग कौन हैं.


इसी वजह से हम पर उनकी खूब निगरानी भी रहती थी. मेरे संगीत को लेकर भी अक्सर वो पूछताछ किया करते थे. पिता जी सुबह सुबह उठाते थे, घर में एक छोटा सा हारमोनियम था, उसी पर वो हमको रियाज कराते थे. मेरी मां रामायण और सुंदर कांड का पाठ कराती थीं. संगीत को लेकर किसी भी तरह की लापरवाही उनको बर्दाश्त नहीं थी, जाने क्यों उनके दिमाग में हमेशा यही बात रहती थी कि बड़े होकर मुझे परिवार का खूब नाम करना है”.

ये बचपन की परवरिश थी कि पंडित छन्नू लाल मिश्र की गायकी में भक्ति पक्ष खूब सुनने को मिलता है. पंडित जी के संगीत में जो साहित्य है वो बचपन में उनके माता-पिता जी की मेहनत का नतीजा है. इस सीरीज में बचपन की शैतानी के बारे में हम जरूर पूछते हैं. क्या छन्नू लाल मिश्र के बचपन का भी कोई किस्सा है?

छन्नू लाल कहते हैं- वैसे तो मैं बचपने में ज्यादा शरारती नहीं था. लेकिन एक किस्सा मुझे याद है कि एक बार हम कुछ बच्चे लोग गांव के एक तालाब के पास से कहीं जा रहे थे. गर्मी के दिन थे. मेरे साथ के लड़के तालाब में कूद गए और तैरना शुरू कर दिया. गर्मी थी ही, हमको भी पानी में कूदने का मन कर गया. गांव में तैरना ज्यादातर बच्चों को आता है, हमें भी आता था. हम पानी में तो कूद गए. पानी में मौज मस्ती भी कर ली, लेकिन पीछे से हमारे तालाब में तैरने की खबर पिता जी तक पहुंच गई. पिता जी आए और उन्होंने हमारी पिटाई कर दी. हमको लगा कि तालाब में तो इतने बच्चे तैर रहे थे, लेकिन पिटाई हमारी ही क्यों हुई. लेकिन बाद में जब पिता जी ने कहाकि अभी तालाब में डूब जाते तो बड़े होकर नाम कैसे करते. तब समझ आया कि पिटाई क्यों हुई थी. फिर हम भी संगीत को लेकर जबरदस्त संजीदा हो गए.


पंडित छन्नू लाल मिश्र की उम्र करीब 8-9 साल की रही होगी. उनके पिता जी तबादला मुजफ्फरपुर हो गया. परिवार वहां चला गया. वहीं पर छन्नूलाल जी के पिता जी उनको किराना घराने के कलाकार अब्दुल गनी खान के पास ले गए. उनके पिता जी ने उनसे गुजारिश की कि वो शास्त्रीय संगीत गायकी का विधिवत प्रक्षिक्षण उनके बेटे को दें. खान साहेब मान तो गए लेकिन असल में उनसे संगीत सिखने के लिए पंडित छन्नू लाल मिश्र को काफी मेहनत करनी पड़ी. अपने उस्ताद की यादों को ताजा करके छन्नू लाल जी कहते हैं- “मैं अपने घर से चिलचिलाती झुलसा देने वाली गर्मी में उस्ताद जी के यहां संगीत सिखने जाता था. वहां पहुंचने पर उस्ताद जी कहते थे जाओ जाकर खाना बनाने के लिए लकड़ी ले आओ. वापस उसी जबरदस्त गर्मी में मैं जाता था और लकड़ी लेकर आता था. कंधे पर लकड़ी लादकर पहुंचता ही था तो उस्ताद जी बड़े अनमने भाव से लकड़ी देखकर कहते थे कि ये तो गीली लकड़ियां हैं, इन्हें कैसे जलाया जाएगा. इतना कहने का मतलब ही यही होता था कि दोबारा जाकर लकड़ियां ले आई जाएं. इतनी मेहनत करके पसीने पसीने होकर हम उनके घर पहुंचते थे. एक दिन गुरू मां ने खां साहेब से पूछ ही लिया कि इस लड़के को इतना परेशान क्यों करते हो, उस्ताद जी तुरंत जवाब दिया कि मैं संगीत सिखने की उसकी लगन को परखना चाहता हूं. गुरू मां मुझे बहुत प्यार करती थीं, लेकिन वो भी चुप हो गई. मैंने हार नहीं मानी और एक रोज उस्ताद जी के इम्तिहान में पास हुआ,इसके बाद जाकर उन्होंने मुझे संगीत की विधिवत शिक्षा देना शुरू किया. मेरा नाम छन्नू भी गुरू मां ने ही रखा”.
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पंडित छन्नूलाल मिश्र के बचपन की कहानियां भी बेहद दिलचस्प हैं.


देखते देखते कब 8-9 साल निकल गए पता ही नहीं चला. छन्नू लाल ने वहां 9 साल तक उस्ताद जी से शास्त्रीय संगीत की बारिकियों को सीखा. धीरे धीरे उस्ताद जी को भी शिष्य की लगन और उसकी काबिलियत पर भरोसा हो गया. छन्नू लाल आगे बताते हैं-“आज भी उस्ताद जी को याद करता हूं तो आंखे नम हो जाती हैं. मेरे कमरे में अब भी उनकी तस्वीर है. कई लोग उस्ताद जी को चुपचाप समझाते भी थे कि घर से बाहर के लड़के को सबकुछ नहीं बताया जाता, लेकिन उस्ताद जी ने मुझे अपनी सगी संतान की तरह सिखाया. ऐसी कोई चीज नहीं थी जो उन्होंने मुझे ना बताई हो. उनके संगीत सिखाने में हद दर्जे की ईमानदारी थी. उन्होंने मुझे संगीत की अथाह दुनिया में सही रास्ते पर चलना सिखाया. मुझे याद है कि जब वो आखिरी सांस ले रहे थे, तो उन्होंने मुझे पुकारा-छन्नू. मैं भागता हुआ गया और उनके सर को अपनी गोद में रख लिया. कुछ ही क्षणों बाद उन्होंने मेरी गोद में ही दम तोड़ दिया, उनके जनाजे को मैंने कंधा दिया. पिता जी-मां की अपेक्षाओं के साथ साथ अब मुझपर उस्ताद जी की अपेक्षाओं को भी पूरा करने की चुनौती थी. मैंने अपनी जिंदगी ही संगीत के नाम कर दी. उस्ताद जी के जाने के बाद मुझे ठाकुर जयदेव सिंह से सीखने का सौभाग्य भी मिला. वो भी संगीत के अद्भुत जानकार थे. उन्होंने मेरी कला को और तराशा”.

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First published: November 9, 2019, 9:53 AM IST
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