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किस्सागोई: एक ऐसा शख्स जिसे बचपन में फिल्म न देखने पर डांट खानी पड़ती थी

News18Hindi
Updated: November 2, 2019, 4:50 AM IST
किस्सागोई: एक ऐसा शख्स जिसे बचपन में फिल्म न देखने पर डांट खानी पड़ती थी
सुधीर मिश्र बॉलीवुड के उन निर्देशकों में शामिल हैं, जो अपनी अलग तरह की फिल्मों के लिए जाने जाते हैं.

सुधीर मिश्र कहते हैं कि, स्कूल की यादें कोई बहुत खास नहीं हैं. हां, लेकिन मुझे इतना याद है कि मैं कुर्सी टेबल पर ज्यादा देर बैठ नहीं पाता था. बचपन से ही थोड़ा विद्रोही किस्म का स्वभाव था मेरा. वो स्वभाव आज भी मेरे अंदर कायम है. मुझे कोई टोक दे तो मैं ‘फ्रीज’ हो जाता हूं'.

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आज के हमारे किरदार सुधीर मिश्र के बचपन की कहानी काफी अलग है. बचपन में जहां बाकी बच्चे फिल्म देखने के लिए डांट खाते थे वहीं सुधीर मिश्र के पिता उन्हें जबरदस्ती फिल्म दिखाने ले जाया करते थे. एक बार तो ऐसा हुआ जब सुधीर मिश्र की मां की तबियत खराब थी और उनके पिता उन्हें डांटकर फिल्म दिखाने ले गए. वो फिल्म थी- ज़ोरबा द ग्रीक. सुधीर का मन फिल्म में लग ही नहीं रहा था. उन्हें रोना आ गया. सुधीर बचपन के दिनों को याद करके बताते हैं-'मेरा बचपन किस्से कहानियों के बीच गुजरा. मेरा जन्म लखनऊ में हुआ, मेरे पिता जी प्रोफेसर थे. इसके अलावा उन्हें फिल्मों का बहुत शौक था, जानकारी भी थी. इसलिए मेरा बचपन किस्सागोई के बीच ही गुजरा. जब वो ‘ज़ोरबा द ग्रीक’ दिखाने मुझे ले गए तो मैं थोड़ी देर में रोने लगा. पहली बार तो मैं थोड़ी देर बाद चुप हो गया, लेकिन उसके बाद मुझे थोड़ी-थोड़ी देर पर रोना आता रहा. मैं इस तरह रोने लगा कि पिता जी को मुझे हॉल से बाहर लेकर आना पड़ा. पिता जी से डांट भी पड़ी. बाद में जब मैं बड़ा हो गया तब भी मैंने वो फिल्म दोबारा नहीं देखी ताकि मेरी उस फिल्म को लेकर जो यादें हैं वो वैसी ही बनी रहें.

बचपन की और कौन सी स्मृतियां हैं जो सुधीर को याद आती हैं-


'मेरे दादा घर छोड़कर चले गए थे, उन्होंने दूसरी शादी की थी. लिहाजा मेरी दादी घर में अकेली रहती थीं. उनके पास बात करने के लिए कोई नहीं होता था. उनका समय दो ही तरह से बीता करता था- या तो फिल्में देखने में या फिर मेरे साथ बातें करने में. उन्हीं दिनों गुरूदत्त और मीना कुमारी की फिल्म आई थी- ‘साहब बीबी और गुलाम’. दादी ने ना जाने कितनी बार वो फिल्म देखी होगी, शायद वो खुद को मीना कुमारी से ‘रिलेट’ करती थीं. दूसरी तरफ मेरी नानी थीं, उनके पास जाओ तो उनको ‘संत ज्ञानेश्वर’ फिल्म बहुत पसंद थी. मेरे नाना जेल में होते थे, तो नानी को भी कोई चाहिए होता था जिससे वो बातें कर सकें. वो मुझे ‘संत ज्ञानेश्वर’ दिखाया करती थीं. खूब किस्से कहानी सुनाती थीं, वो अलग. मेरे चाचा आर्मी में थे, वो खुद दारा सिंह की फिल्मों के शौकीन थे. वो जब घर आते थे तो दारा सिंह की फिल्मे दिखाया करते थे. मेरे पिता जी ने लखनऊ में पहली फिल्म सोसाइटी की शुरुआत की थी. घर के आंगन में बिठाकर वो भी मुझे अजीब अजीब फिल्में दिखाया करते थे. कभी चार्ली चैप्लिन की फिल्में, कभी सत्यजीत रे की फिल्में, वहां कभी कभार व्यस्क फिल्में भी चला करती थीं. सब सोचते थे कि मैं सो रहा हूं लेकिन बच्चे बदमाश होते हैं, मैं वो फिल्में भी देखा करता था. उस वक्त फिल्में समझ में नहीं आती थीं, लेकिन गुरुदत्त, राज कपूर जैसे अभिनेताओं की तमाम फिल्में मैंने बचपन में ही देख ली थीं'.

यानी सुधीर का कुल बचपन किस्से कहानियों के नाम रहा. एक दिलचस्प किस्सा ये भी है कि सुधीर की दादी की एक रिश्ते की बहन थीं, उनके पति का निधन हो गया था. लेकिन वो सुधीर के घर पर ही रहती थीं. उनका बस एक काम था, वो बस सुधीर को कहानियां सुनाया करती थीं. यानी आपके जीवन में कहानियों से ज्यादा अहमियत किसी और बात की नहीं.

सुधीर कहते हैं- “दरअसल उन दिनों मनोरंजन का जरिया भी कहानी ही था. लखनऊ वैसे भी किस्से कहानियों, शेरो-शायरी का शहर है. लखनऊ वालों के पास हर बीमारी का इलाज शेरो-शायरी के ‘फॉर्म’ में होता है. उस पर से हमारा तो जन्म ही ऐसे परिवार में हुआ था, जिसे पूरा शहर जानता था. मेरे दादा लखनऊ के अच्छे डॉक्टरों में गिने जाते थे, उन्हें हर कोई जानता भी था. मैंने इसी किस्सागोई और जान पहचान का फायदा बचपन में जमकर उठाया. यहां तक कि मैं अपने दोस्तों के साथ रेस्टोरेंट में आइसक्रीम खाकर उन्हें कहानी किस्से सुनाकर बिना पैसे दिए चला आता था.


बचपन का एक बड़ा ही दिलचस्प किस्सा मुझे अब भी याद है. हुआ यूं कि मेरे पिता जी मुझे नया बैडमिंटन रैकेट लाकर दिया. मेरी गलती से वो रैकेट कहीं खो गया. मुझे लगा कि अगर मैं घर जाकर कहूंगा कि मैंने अपनी लापरवाही से रैकेट खो दिया है तो डांट पड़ेगी, मैंने फटाफट एक किस्सा गढ़ लिया. मैंने घर में बताया कि मैं रैकेट लेकर आ रहा था, तभी अचानक एक बहुत मोटा सा आदमी साइकिल से आया. उसने मुझे पकड़कर रैकेट छीन लिया और उसके बाद वहां से भाग गया. कहानी में मसाला डालने के लिए मैंने ये भी बताया कि मैं उस साइकिल वाले के पीछे काफी दूर तक दौड़ा, फिर वो एक गली में घुस गया. गली में घुसने के बाद उसने पीछे मुड़कर मेरी तरफ देखा और वो हंसा भी. पूरे घर में हड़कंप मच गया. घर में क्या यूं समझिए पूरे लखनऊ में हो हल्ला हो गया. बात पुलिस तक पहुंच गई. एक रैकेट की खोज में पुलिस भी आ गई. मैंने पुलिस को भी वही झूठा किस्सा पूरी संजीदगी के साथ सुनाया. मुझे नहीं पता कि उस किस्से पर किसने कितना भरोसा किया, लेकिन काफी समय तक मुझे ये डर लगता था कि पुलिस वाले मेरे घर आकर मुझे इस झूठ के लिए पकड़ कर ले जाएंगे'.

बचपन के किस्से चल रहे हों तो उसमें पिटाई की बात के बिना कहां कहानी पूरी होगी. सुधीर से अगला सवाल भी यही था- पिता जी कहानियां तो सुनाते थे लेकिन क्या कभी पिटाई भी करते थे?

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सुधीर कहते हैं- “मेरे पिता जी की खासियत रही कि अव्वल तो वो कभी डांटते मारते नहीं थे. कभी एकाध बार उन्होंने पिटाई की भी तो बाद में आकर माफी मांगी. उन्होंने बताया भी कि दरअसल वो किसी और बात से परेशान थे और उसी नाराजगी में उन्होंने मेरी पिटाई कर दी. इसके बावजूद उस पिटाई से मैं इतना गुस्सा था कि मैंने अपने पिता जी से करीब एक महीने तक बात नहीं की. हम भाई बहनों में झगड़ा होता रहता था, मारपीट भी होती थी... लेकिन मां-पिता जी से पिटाई के मौके ना के बराबर आते थे. मुझे जैसे ही पता चलता था कि पिता जी या मां किसी बात पर गुस्सा हैं तो हम भाग कर जाकर घर के किसी बुजुर्ग के पास छिप जाते थे. उसके बाद मां पिताजी को पिटाई का प्लान कैंसिल करना पड़ता था. हम लोग अपनी दादी की एक सहेली से बहुत डरते थे. वैसे तो उन्हें दादी का ख्याल रखने और काम काज में उनकी मदद के लिए रखा गया था, लेकिन वो दादी की सहेली जैसी थीं. उनका नाम था-कृपाला, वो बीड़ी पीती थीं. उनसे हमको बहुत डर लगता था.

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First published: November 2, 2019, 4:50 AM IST
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