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पंकज उधासः एक बच्चा जिसके स्कूल की प्रार्थना उसकी 'संगीत साधना' बन गई

News18Hindi
Updated: October 26, 2019, 6:07 PM IST
पंकज उधासः एक बच्चा जिसके स्कूल की प्रार्थना उसकी 'संगीत साधना' बन गई
पंकज उधास भारत के लोकप्रिय गजल गायक हैं. आज की किस्सागोई उन्हीं के बचपन की है.

कई बार बचपन में है तय हो जाता है कि आप क्या बनेंगे? जबकि कई बार किसी खास मौके पर आपको एहसास होता है कि आपका भविष्य क्या है? पंकज उधास (Pankaj Udhas) की कहानी भी उसी का खट्टा-मीठा एहसास है.

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  • Last Updated: October 26, 2019, 6:07 PM IST
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अगर आप ग़ज़लों के शौकीन हैं जो 80 के दशक की एक आवाज आपको हमेशा याद आएगी. वो आवाज जिसने एक के बाद एक तमाम हिट ग़जलें शराब पर गाईं. ‘एक तरफ उसका घर एक तरफ मयकदा’, ‘हुई महंगी बहुत ही शराब’, ‘शराब चीज ही ऐसी है’ और ऐसी करीब दर्जन भर ग़ज़लें. लेकिन इसी दशक के खत्म होने से पहले-पहले महेश भट्ट की एक फिल्म में उस कलाकार ने एक गाना गाया, जिस गाने ने उस कलाकार को कामयाबी के उस मुकाम पर पहुंचा दिया जहां से उसकी दुनिया ही बदल गई. वो कलाकार हैं पंकज उधास (Pankaj Udhas). जिन्हें पद्मश्री (Padma Shri) से सम्मानित किया जा चुका है. लेकिन हम आज उनके बचपन की बात करेंगे. पंकज अपनी बचपन की बातें भी पूरी संजीदगी से याद करके बताते हैं- मेरा जन्म एक जमींदार परिवार में हुआ.

गुजरात के राजकोट के पास एक छोटा सा गांव है चरखड़ी. हमारा जो उधास परिवार है वो वहां के जमींदार हुआ करते थे. हालांकि मेरा काफी बचपन राजकोट में बीता है. मेरे दादा उस जमाने में पूरे गांव में इकलौते और पहले ‘ग्रेजुएट’ थे. जमींदार परिवार से होने के बाद भी उन्हें पढ़ाई का बड़ा शौक था. उन्होंने उस जमाने में पूना फर्ग्यूसन कॉलेज से बीए किया था. ये कोई 1902 की बात है. यानी आज से करीब 118 साल पहले. उन्हें भावनगर के महाराज ने मिलने के बुलाया और कहा कि आप भावनगर के ‘एडमिनिस्ट्रेटर’ बन जाइए. ‘एडमिनिस्ट्रेटर’ यानी आज के समय का ‘कलेक्टर’. महाराज ने दादा जी से कहाकि आप पढ़े लिखे हैं, जवान हैं...आप इस जिम्मेदारी को संभालिए. दादा जी ने ये जिम्मेदारी संभाल ली. बाद में जब भावनगर के महाराज ने दादा जी की ईमानदारी देखी तो वो उनसे बहुत प्रभावित और खुश हुए.

पंकज उधास का एक गाना बेहद मशहूर है..' सोने जैसा रंग है तेरा, सोने जैसे बाल'.


जमींदार के परिवार में संगीत के आने की कहानी दिलचस्प होगी. ये कैसे हुआ?

इस पर पंकज कहते हैं- दरअसल, उस दौर में राजा महाराज अपने ‘स्टेट’ में संगीतकारों, कलाकारों को बुलाया करते थे. उनका कार्यक्रम देखते थे. उनकी कला का सम्मान करते थे. यहीं से मेरे परिवार में संगीत आया. मेरे पिता अक्सर दादा जी के साथ भावनगर महाराज के दरबार में जाया करते थे. पिता जी ने अब्दुल करीम खान साहब को सुना और फरमाइश कर दी कि मुझे भी ये सीखना है. दादा ने अब्दुल करीम खान साहब साहब से बड़ी गुजारिश की कि ये बच्चा सीखने की जिद कर रहा है तो इसे सिखाइए. तब खान साहब ने मेरे पिता जी को इसराज सीखाना शुरू किया. जिसे दिलरुबा भी कहते हैं. मेरे पिता जी ने उनसे दिलरुबा सीखा.

इसी दौरान 1947 का वक्त आया. देश आजाद हुआ. राजा महाराजा चले गए. धीरे-धीरे जमींदारी प्रथा भी खत्म हो गई. पंकज के पिता जी को जल्दी ही सरकारी नौकरी मिल गई. पिता जी जब शाम को ऑफिस से लौटकर आते तो अपने साज को लेकर जरूर बैठते थे. उन्हीं को सुन कर पंकज के बड़े भाई मनहर जी और उनसे छोटे भाई निर्मल उधास की दिलचस्पी संगीत में जागी. पंकज तीनों भाईयों में सबसे छोटे थे. पंकज की मां भी शौकिया तौर पर वो गाती थीं. वो कोई ‘प्रोफेशनल सिंगर’ नहीं थी लेकिन उन्हें गाने का शौक बहुत था.

आपके दिमाग में अब भी बचपन की और कौन सी यादें ताजा हैं ?
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पंकज हसंते हुए बताते हैं- बचपन मैं बहुत शरारती था. पिता जी तो कभी डांटते मारते नहीं थे लेकिन मां के हाथ की मार कई बार खाई है. तीनों भाईयों में मैं सबसे छोटा था और मैं ही सबसे ज्यादा शरारती था. हालांकि वो शरारतें जो किसी और को नुकसान पहुंचाने वाली नहीं बल्कि मौजमस्ती वाली थीं. मैं पेड़ पर चढ़ जाता था. खूब ऊंचे-ऊंचे पेड़ों पर चढ़ जाता था. मेरी मां परेशान हो जाती थीं कि किसी दिन मैं गिरा तो हाथ-पैर टूटेगा.


मुझे याद है कि एक आम का पेड़ था. मैं आम के चक्कर में उस पेड़ पर खूब ऊपर तक चढ़ जाता था और मां परेशान होती थी कि मुझे चोट ना लग जाए.


पंकज जिस दौर में बड़े हुए उस दौर में टीवी, वीडियो गेम या मोबाइल जैसे मनोरंजन के साधन तो थे नहीं तो पंकज बचपन में करते क्या थे, पंकज कहते हैं- गुल्ली डंडा खेलता था, क्रिकेट खेलता था. इसके अलावा पतंग उड़ाने का बहुत शौक था. वैसे भी गुजरात के राजकोट में पतंग उड़ाने में हर किसी की दिलचस्पी होती थी.

बचपन की एक दीवाली मुझे कभी नहीं भूलती. दीवाली के दिन सुबह का समय था. मेरा एक दोस्त घर आया. हम लोगों ने तय किया कि पटाखे लेकर आते हैं और हम दोनों पटाखे लेने के लिए घर से निकल पड़े. उस वक्त मेरी उम्र यही कोई 6-7 साल की रही होगी. हम लोग घर पर बिना किसी को बताए चले गए. हम दोनों आपस में बात करते-करते घर से काफी आगे निकल आए. यही कोई 4-5 किलोमीटर. पटाखे खरीदने के बाद जब हम वापस घर निकलने लगे तो शाम होने लगी. इधर घर में सब लोग परेशान थे कि ये लड़का चला कहां गया. घरवालों ने घबराकर पुलिस में ‘कंपलेन’ तक कर दी कि ये बच्चा गायब है.


जब हम लोग घर पहुंचे तो देखा कि अच्छी खासी भीड़ जमा है. ऐसा लग रहा था जैसे पास- पड़ोस का हर व्यक्ति मेरे घर पहुंच गया हो. जब अंदर पहुंचे तो देखा कि मम्मी तो बिचारी परेशान हो-होकर रो रही थी. जैसे ही उन्होंने मुझे देखा और हाथ में पटाखा देखा तो सबसे पहले गाल पर एक तमाचा मिला. उसके बाद मां ने बहुत डांटा. इसके अलावा दीवाली में पटाखा चलाने में मुझे चोट भी लगी है. मेरे माथे पर एक निशान है वो निशान उसी पटाखे की वजह से है. मैंने जल्दी-जल्दी में पटाखा तो चला दिया लेकिन वो उड़कर मुझे ही लग गया था. मेरे माथे पर उस चोट की निशानी अब भी है. बावजूद इसके मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता था. बचपन की शैतानियां यूं ही चलती रहती थीं.

ये बदमाशियां सिर्फ घर में होती थीं या स्कूल में भी चलती थीं ?
पंकज कहते हैं- जब मैं स्कूल पहुंचा तो मेरे अंदर संगीत का शौक पैदा हो चुका था. घर में हर वक्त अपने दोनों भाईयों को गाते देखता था. पिता जी दिलरुबा बजाते ही थे. जब घर में हर तरफ संगीत का माहौल था तो उसका असर मेरे ऊपर भी पड़ना ही था. 6-7 साल की उम्र में ही मैंने भी गाना शुरू कर दिया था. मेरा स्कूल मेरे घर के बिल्कुल सामने ही था. मैं पैदल स्कूल जाया करता था. जब स्कूल में ‘एसेंबली’ होती थी तो हेडमास्टर साहब जोर से बुलाते थे- पंकज यहां आओ. फिर मैं वहां उनके पास जाता था तो वो कहते थे चलो प्रार्थना कराओ. मुझे लगता है कि संगीत का मेरा सफर वहीं से शुरू हो गया था. फिर प्रार्थना में ही कभी-कभी मुझसे भजन या गीत भी सुने जाते थे. कभी मैं कोई भजन गाता था तो कभी कोई गीत. स्टेज पर गाने का सिलसिला देखा जाए तो वहीं से शुरू हो गया था. जो अब तक चल रहा है.

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First published: October 26, 2019, 4:54 AM IST
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