Book Review: दिल से जुड़े रिश्तों का शानदार एहसास है ‘खट्टे-मीठे से रिश्ते’

‘खट्टे-मीठे से रिश्ते’ उस प्रेम कहानी के इर्द-गिर्द बुनी गई है, जिसमें रिश्तों का चटपटा स्वाद, रिश्तों के तनाव, कड़वाहट, तीखापन, कसैलापन, एक-दूसरे को नीचा दिखाने की स्पर्धा, अहंकार, मद, मोह और लोभ सब कुछ है.

News18Hindi
Updated: July 22, 2019, 9:39 PM IST
Book Review: दिल से जुड़े रिश्तों का शानदार एहसास है ‘खट्टे-मीठे से रिश्ते’
‘खट्टे-मीठे से रिश्ते’ उस प्रेम कहानी के इर्द-गिर्द बुनी गई है, जिसमें रिश्तों का चटपटा स्वाद, रिश्तों के तनाव, कड़वाहट, तीखापन, कसैलापन, एक-दूसरे को नीचा दिखाने की स्पर्धा, अहंकार, मद, मोह और लोभ सब कुछ है.
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Updated: July 22, 2019, 9:39 PM IST
उपन्यास         ‘खट्टे-मीठे से रिश्ते’
लेखिका      -     गरिमा संजय
प्रकाशक      -     प्रभात प्रकाशन
प्रकाशन      -     जून, 2019


'खट्टे मीठे से रिश्ते' गरिमा संजय का तीसरा उपन्यास है. कुछ लापरवाही, स्वार्थ और अहम के कारण रिश्तों में आने वाली खींचतान और तनाव को उपन्यास में बारीक़ी से उकेरा गया है. रिश्तों की इस कहानी में एक मीठी सी प्रेम-कहानी भी मिलती है. और, उसी प्रेम कहानी के इर्द-गिर्द बुने गए हैं, रिश्तों का चटपटा स्वाद, रिश्तों के तनाव, कड़वाहट, तीखापन, कसैलापन, एक-दूसरे को नीचा दिखाने की स्पर्धा, अहंकार, मद, और मोह एवं लोभ भी.

अक्सर लोग अपने रिश्तों से बहुत अधिक उम्मीदें करते हैं, जबकि वे ख़ुद उन उम्मीदों पर खरे उतरने की ज़रूरत नहीं समझते. इस तरह के स्वार्थी व्यवहार से अच्छे-से-अच्छे रिश्तों में दरार लाने लगती है. सही ही कहा है, 'मैं सर्वश्रेष्ठ! अहंकार, उम्मीदें और स्वार्थ रिश्तों की मधुरता में छन्न से विष घोल देते हैं' और इसके साथ ही मधुर से मधुर रिश्तों के बीच कभी न भरने वाली खाई बन जाती है.

कहानी में वर्ग भेद को भी बहुत ख़ूबसूरती से दिखाया गया है. यहां दो परिवार हैं, एक अफ़सर, शिक्षक, डॉक्टर वाला सुशिक्षित संभ्रांत वर्ग का परिवार, तो दूसरा धनाढ्य व्यापारी वर्ग. दोनों अपनी-अपनी जीवन-शैली पर गर्व करते हैं, जो स्वाभाविक भी है और काफ़ी हद तक स्वस्थ भी. समस्या तब आती है जब दोनों वर्ग अपनी हैसियत और मान्यताओं के अहंकार में कुछ ऐसे चूर होने लगते हैं कि एक-दूसरे को नीचा दिखाने में बिलकुल से नहीं चूकते. ऐसे हालातों में जो व्यक्ति रिश्तों को संभालने की कोशिश भी करता है उसे कमज़ोर समझा जाता है. और, इस तरह से एक ख़ूबसूरत से रिश्ते का अंत हो जाता है.
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लेखिका ने अपने पिछले दो उपन्यासों 'आतंक के साए में' (वर्ष 2015) और 'स्मृतियां' (वर्ष 2013) की तरह यहां भी अनेक सामाजिक पहलुओं को उजागर किया है. इस उपन्यास में भी अनेक सामाजिक समस्याओं पर रौशनी डाली गई है, फिर भी लेखन शैली में यहां पिछले दो उपन्यासों की तुलना में काफ़ी अंतर नज़र आता है.


जहां उनके पिछले दोनों उपन्यासों के कथानक में पीड़ा महसूस होती है, वहीं 'खट्टे मीठे से रिश्ते' में कथानक को काफ़ी हल्के फुल्के ढंग से बुना गया है. गंभीर से गंभीर और कठोर से कठोर हालातों में भी कथानक या उस कथानक को जीते चरित्र टूटते नज़र नहीं आते. कहानी के नायक और नायिका हंसमुख और जीवंत चरित्र हैं, जो मुश्किल से मुश्किल हालातों में भी अपने निर्णय पर अडिग रहते हैं. वे आत्मविश्वास से भरपूर और दृढनिश्चयी हैं, लेकिन कठोर नहीं, बल्कि सहजता से हंसते-मुस्कराते चरित्र हैं. वे एक-दूसरे से जितना प्रेम करते हैं, अपने परिवार, दोस्तों आदि से भी उतना ही लगाव रखते हैं; और किसी भी हालत में इस लगाव में कहीं कोई कमी नहीं आने देते.

ज़िन्दगी में कष्ट तो हैं ही, दुःख और निराशा भी है, किन्तु मज़बूत और सुलझे चरित्र वाले अविनाश और गौरी उन दुखों या कष्टों से टूटते नहीं. लेखिका के शब्दों में, 'प्रैक्टिकल गौरी, और उससे भी अधिक प्रैक्टिकल अविनाश, ऐसे दो जने आपस में प्रेम कर बैठे थे.'

कहानी के चरित्र, कथानक और घटनाक्रम नाटकीय न होकर यथार्थ के अधिक निकट महसूस होते हैं. अक्सर हम अपने आसपास ऐसे लोगों को देखते हैं, जिनके स्वार्थ, अहम् और बिना वजह के हस्तक्षेप रिश्तों को उलझाते रहते हैं, प्रेम के भावों को चटकाकर उसमें विष घोलते रहते हैं.. और नतीजन, अक्सर अच्छे खासे रिश्ते बिगड़ते रहते हैं. रिश्ते बिगड़ते हैं तो परवाह नहीं करते, जो परवाह करके बचाना चाहते हैं उन्हें कमज़ोर समझते हैं, और जब समझ में आता है, तो संभालने की पहल नहीं कर पाते... बीच में कुछ संकोच और कुछ अहम आ जाता है और उसी में उलझे रह जाते हैं... कुछ ऐसे ही चरित्रों का चित्रण है ‘खट्टे-मीठे से रिश्ते’ में.
First published: July 22, 2019, 9:38 PM IST
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