प्रकृति की किडनैपिंग और दुनिया का बदसूरत चेहरा

अमेजन के जंगल पिछले तीन हफ्तों से लगातार जल रहे हैं . इन जंगलों में 10 साल बाद इतनी भयानक आग लगी है. ब्राजील के उत्तरी हिस्से में मौजूद राज्य रोरैमा, एक्रे, पारा, रोडोनिया, माटो ग्रासो और अमेज़ोनासे इससे बुरी तरह प्रभावित हैं.

News18Hindi
Updated: August 28, 2019, 10:37 AM IST
प्रकृति की किडनैपिंग और दुनिया का बदसूरत चेहरा
प्रकृति की किडनैपिंग और दुनिया का अगली रूप
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Updated: August 28, 2019, 10:37 AM IST
(पंकज रामेंदु)

एक आठ या दस साल की बच्ची तब एक कार से उठा ली जाती है जब उसका पिता थोड़ी देर के लिए उसे कार में छोड़कर अपने दोस्त से मिलने एक बिल्डिंग में जाता है. बेटी को ढूंढने के साथ ही तमाम तरह के अहम और लालच के टकरावों का सिलसिला शुरू होता है.

बच्ची का असली पिता जिसके संघर्ष से भरे जीवन की वजह से उसकी पत्नी उसे छोड़ कर एक पुलिस वाले से शादी कर लेती है. पुलिस वाले को बच्ची के असली पिता से इस बात की खुन्नस है कि कॉलेज के दिनों में उसने उसे बेइज्ज़त किया था. बच्ची की मां पूरी तरह नशे में धुत रहती है. और भी कई लोग है जिनके अपने संघर्ष और हित उस अपहरण से जुड़े हुए हैं. बच्ची का सौतेला पिता (पुलिसवाला) लड़की को ढूंढने की कोशिश में जुटा है लेकिन उसका अहम बच्ची की जिंदगी से बड़ा है. बच्ची की मां के लिए बच्ची की जिंदगी से बढ़कर वो फिरौती की रकम है जिसके सहारे वो अपने नशे को टूटने से बचा सकती है. बच्ची के असली बाप के अपने हित हैं, उसके मामा का अपना स्वार्थ है. इन्ही उलझनों के साथ बच्ची को ढूंढने की कवायद जब पूरी होती है तब समाज का सबसे कुरूप चेहरा सामने आता है. ये वही चेहरा है जो वाकई में Ugly है. ये दरअसल वो असली चेहरा है जिसे तमाम तरह की मासूमियत, संजीदगी, चिंता और इंसानियत के मेकअप के पीछे हमने छिपा रखा है.

अनुराग कश्यप की Ugly फिल्म की बात सिर्फ इसलिए क्योंकि अमेज़न के रेनफॉरेस्ट पिछले तीन हफ्तों से जल रहे हैं और लगातार जल रहे हैं. ये आग फैल रही है. हमारे फेफड़े सुलग रहे हैं. लेकिन दुनियाभर के सक्षम लोगों के ज़रिये महज चिंता जाहिर की जा रही है. खुद ब्राजील के राष्ट्रपति जेयर बोल्सोनारो पर इल्ज़ाम है कि उनके सत्ता संभालने के बाद से आग लगने का सिलसिला लगातार बढ़ा है. वहीं ब्राजील के राष्ट्रपति एक एनजीओ के बहाने पश्चिमी देशों पर निशाना साध रहे हैं. उनका कहना है कि आग को जबरन मुद्दा बनाया जा रहा है ताकि ब्राजील के आर्थिक विकास की गति को बाधित किया जा सके.

अगर एक पल को ब्राजील के राष्ट्रपति की बात को सही भी मान लिया जाए तो पहला सवाल ये खड़ा होता है कि 'दुनिया का फेफड़ा' कहे जाने वाले अमेजन के जंगलों में लगी आग से विकास कैसे बाधित हो सकता है. साथ में ये बात भी सही है कि आग लग रही है और लगातार लग रही है और इस बात को झुठलाया नहीं जा सकता है.

दरअसल चीन और अमेरिका विश्व का सबसे बड़ा बीफ का निर्यातक देश है. ब्राजील इनको कड़ी टक्कर दे रहा है और वो अव्वल बनना चाहता है. शिखर पर पहुंचने के लिए उसे ज्यादा से ज्यादा मांस का उत्पादन करना होगा और ज्यादा मांस के लिए ज्यादा मवेशी चाहिए और जितने ज्यादा मवेशी उतना ज्यादा चारे की ज़रूरत होगी . ये चारा पैदा करने के लिए बड़े चारागाह चाहिए जिन्हें बनाने के लिए लगातार अमेज़न के जंगलों को काटकर वहां चारा उगाने की कवायद चल रही है.

अमेजन के जंगल क्यों ज़रूरी हैं?
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विश्व के कुल वर्षावन/रेनफॉरेस्ट का आधे से अधिक हिस्सा (लगभग 60 फीसद) अकेले अमेजन के जंगल ही हैं. 55 लाख वर्ग किलोमीटर में फैले इस जंगल में 39 हज़ार करोड़ पेड़ और 16000 से अधिक प्रजातियां मौजूद हैं. ये जंगल पूरी धरती के चार प्रतिशत हिस्से में फैला हुआ है.

कितनी भयानक है आग?
अमेजन के जंगल पिछले तीन हफ्तों से लगातार जल रहे हैं . इन जंगलों में 10 साल बाद इतनी भयानक आग लगी है. ब्राजील के उत्तरी हिस्से में मौजूद राज्य रोरैमा, एक्रे, पारा, रोडोनिया, माटो ग्रासो और अमेज़ोनासे इससे बुरी तरह प्रभावित हैं. इसकी भयावहता का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि रोराइमा में 141 फीसद, एक्रै में 138 फीसद, रोडोनिया में 115 फीसद और अमेज़ोनासे में 81 फीसद आग की घटनाओ में बढ़ोतरी देखने को मिली है. अंतरिक्ष से दिखाई पड़ रही इस आग की अमेरिकी एंजेसी नासा के उपग्रह से कई तस्वीर भी ली गई है . इस आग की वजह से 19 अगस्त को आग लगने वाली जगह से 2735 किलोमीटर दूर साओ पाओलो शहर में दिन में अंधेरा छा गया था. यह धुआं अब तक फैलकर करीब 2800 वर्गकिलोमीटर इलाके को घेर चुका है. ब्राजील के नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस रिसर्च के मुताबिक 2018 में आग लगने की घटनाओं में 84 फीसद की बढ़ोतरी देखी गई है. इनका मानना है कि आग लगने की घटनाएं स्वाभाविक नहीं है और आग लगने की घटनाओं में वृद्धि अस्वाभाविक परिस्थितियों के कारण हो रही है. संस्थान के इस तरह के वक्तव्य जारी करते ही इसके प्रमुख को ही पद से हटा दिया गया. ब्राजील के राष्ट्रपति का कहना है कि नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस रिसर्चआग को लेकर भ्रामक जानकारी फैला रही है.

लेकिन ये जानकारी भ्रामक से ज्यादा सच लगती है. पर्यावरण और ग्लोबल वार्मिंग जैसे विषय पर बनी डॉक्यूमेंट्री श्रंखला - Years of living dangerously - के अमेजन के जंगलो पर आधारित एपिसोड में मालूम चलता है कि किस तरह बीते कुछ सालो में जंगलों का काटने का काम बहुत तेजी से बढ़ा है. जंगलो के काटने की तेजी का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि इसमें जुटे लोगों ने दस दिनों के भीतर ही 351 एकड़ ज़मीन यानि करीब 141 सॉकर के मैदान के बराबर की ज़मीन को मैदान बना डाला था. ये लोग दिन रात काम करते हैं. इनकी आरियां रुकती नहीं है. ये जंगल काटते हैं, आग लगाते हैं और फिर वहां घास उगा देते हैं. तो सोचिए यूरोपीय देशों की बीफ को लेकर भूख इस कदर बढ़ गई है कि उसकी वजह से दुनिया का सबसे बड़ा खजाना जलाया जा रहा है. ये सब कुछ दिन दहाड़े चल रहा है तो ऐसा कैसे हो सकता है कि ब्राजील की सरकार को इस बारे में कोई इल्म नहीं हो. नहीं तो अमेजन के जंगल में मवेशी पाये ही नहीं जा सकते हैं लेकिन यहां आपको जंगलो में चरते हुए जानवर दिख रहे है. हैरान करने वाली बात ये है कि अमेजन के 65 फीसद जंगलो के साफ होने की वजह ये मवेशी ही हैं . दुनिया को 20 फीसद ऑक्सीजन देने वाले इन जंगलों का 20 फीसद से ज्यादा हिस्सा तो हम खो चुके हैं, वो मैदान में तब्दील हो चुका है. और जो हिस्सा बचा हुआ है वो वहां रहने वाले मूलनिवासियों यानि आदिवासियों की वजह से बचा हुआ है. ऐसा नहीं है कि सिर्फ बीफ उत्पादन के लिए ये सब हो रहा है बल्कि इसके साथ एक और उद्योग है - सोए उद्योग - जिसके लिए ये सब किया जा रहा है. ज्यादातर सोए जानवरों का आहार बनाने के लिए बाहर भेज दिया जाता है जिससे यूरोप, अमेरिका जैसे देशों के जानवरों का पेट भर रहा है. जिस विकास की बात ब्राजील के राष्ट्रपति बोल्सोनारो कर रहे हैं वो यही विकास है. इसकी बानगी ये है कि बीस करोड़ की आबादी वाली इस जगह के ज्यादातर लोग गरीबी में दिन गुज़ार रहे हैं. बायोडायवर्सिटी के मामले में दुनिया का सबसे अमीर देश ब्राजील अगर अमेजन को भी खो देता है है तो उसे पता ही नहीं है कि वो क्या खो देगा.

अब जब दुनिया की बीफ के लिए भूख बढ़ रही है ऐसे में ब्राजील बड़ा एक्सपोर्टर बन चुका है और उसका इरादा अपना मार्केट शेयर बढ़ाने का है. ये काम वो दुनिया के सबसे बड़े बीफ ग्राहक अमेरिका और चाइना को आधा बीफ बेचकर करना चाहता है जहां पिछले दस सालों में बीफ की डिमांड में 25 फीसद का इजाफा हुआ है.

जिस तेजी के साथ मीट खाने में इज़ाफा हो रहा है इसे देखते हुए लगता है कि इस धरती को बचाने के लिए हमे तुंरत कदम उठाना होगा. वर्तमान में इस दुनिया की आबादी करीब 740 करोड़ है. 2050 तक ये करीब 1000 करोड़ तक पहुंच जाएगी. यानि 2050 तक मीट खाने वालों की तादात लगभग दोगुनी हो जाएगी . इसका मतलब कि बीफ के लिए जिस अमाउंट में ज़मीन की ज़रूरत पड़ेगी उसे पूरा करने के लिए जंगलों को काटा जाएगा . इसे यूं समझना होगा कि बीन्स से जितना न्यूट्रीशन मिलता है, उसका बीस गुना ज्यादा जमीन की जरूरत बीफ के लिए पड़ती है. तो अगर आप बीन्स की जगह बीफ खाते हैं तो आपको बीस गुना अधिक ज़मीन की ज़रूरत पड़ेगी, साथ में आप 20 गुना ज्यादा ग्रीनहाउस गैस भी पैदा करेंगें, कुलमिलाकर आप मौसम में बदलावों को पैदा करेंगे. यहां तक की मवेशी खुद भी मीथेन उत्सर्जन के जरिए ग्रीन हाउस गैस का बहुत बहुत बड़ा कारण बनते हैं, अगर दुनिया के सभी मवेशी मिलकर एक देश बनाएं तो चाइना और यूनाइटेड स्टेटस के बाद ये दुनिया के तीसरे सबसे बड़े ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जक कहलाएंगे. तो कुल मिलाकर बात इतनी सी है कि अगर अपनी जिंदगी को हम बचाना चाहते हैं कि तो हमें तमाम तरह के गणित से दूर हटकर, अपने अहम को किनारे रखकर, अपने स्वार्थ की बात को छोड़कर ये सोचना होगा कि हम ऐसा क्या करें जो हमें सांस देने वाले इन जंगलों को जिंदा रख सके. मीट को बगैर खाए तो जिया जा सकता है लेकिन बगैर सांस के नहीं रहा जा सकता है.

और अगर इस मुद्दे पर हमने एकजुटता नहीं दिखाई तो Ugly फिल्म का क्लाइमेक्स याद कर लीजिएगा जिसमें बच्ची इसलिए मर जाती है क्योंकि सब अपना फायदा सोच रहे थे और पास खड़ी कार की डिग्गी में पड़ी बच्ची धीरे-धीरे घुटती रही और जब मिली तो वो एक लाश थी. कहीं ऐसा ना हो कि आरोप प्रत्यारोप और राजनीतिक हथकंडों में हमें प्रकृति मिल तो जाए लेकिन सांस लेने लायक न बची हो.

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First published: August 28, 2019, 8:53 AM IST
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