Home Schooling: जानें क्या है होम स्कूलिंग, बच्चों के लिए कैसे है फायदा और नुकसान

होम स्कूलिंग परंपरागत स्कूलों की तुलना में काफी लचीला माहौल देता है.

होम स्कूलिंग परंपरागत स्कूलों की तुलना में काफी लचीला माहौल देता है.

होम स्कूलिंग (Home Schooling) देश और दुनियाभर में एक प्रगतिशील प्रवृति है, जिसमें माता-पिता अपने बच्चों को एक पारंपरिक सार्वजनिक या निजी स्कूल में भेजने के बजाय घर पर शिक्षित (Educated) करते हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 24, 2020, 10:49 AM IST
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होम स्कूलिंग (Home Schooling) घर पर या स्कूल के अलावा दूसरे जगहों पर बच्चों की शिक्षा है. बच्चे बिना स्कूल गए जब घर बैठकर पढ़ाई करते हैं और स्कूल जैसी ही बातें घर पर सीखते हैं तो उसे होम स्कूलिंग कहा जाता है. यह आमतौर पर एक अभिभावक, ट्यूटर या एक ऑनलाइन शिक्षक द्वारा संचालित किया जाता है. होम स्कूलिंग देश और दुनियाभर में एक प्रगतिशील प्रवृति है, जिसमें माता-पिता अपने बच्चों को एक पारंपरिक सार्वजनिक या निजी स्कूल में भेजने के बजाय घर पर शिक्षित (Educated) करते हैं. उपलब्ध शैक्षणिक विकल्पों के कारण और परिवार का यह विश्वास होता है कि बच्चे पारंपरिक स्कूल संरचना के भीतर प्रगति नहीं कर रहे हैं, तब ऐसा किया जाता है.

वैसे होम स्कूलिंग की शुरुआत 1970 के दशक में शुरू हुई थी जब कुछ लोकप्रिय लेखकों और शोधकर्ताओं ने शैक्षिक सुधार के बारे में लिखना शुरू किया था. उन्होंने वैकल्पिक शैक्षिक विकल्प के रूप में होम स्कूलिंग का सुझाव दिया था. वर्तमान में कोरोना महामारी के कारण लोगों ने इसे एक विकल्प के रूप में चुना है और ऐसा डिजिटल (Digital) साधनों की उपलब्धता और इंटरनेट की पहुंच के कारण हो रहा है.

होम स्कूलिंग से बच्चों को फायदे

होम स्कूलिंग परंपरागत स्कूलों की तुलना में काफी लचीला माहौल देता है. यहां बच्चों की दिलचस्पी और जरूरत के मुताबिक टाइम-टेबल बनाया जा सकता है. होम स्कूलिंग करने वाले एग्जाम के डर से आजाद रहते हैं. ऐसे बच्चे दूसरों की जगह खुद से ही कॉम्पिटिशन करते हैं. स्कूल जाने की जरूरत नहीं होने के कारण बच्चे पैरेंट्स से दूर नहीं होते है. परिवहन के दौरान होने वाली परेशानियों से बचा जाता है. साथ ही ऐसे में माता-पिता को उनकी सुरक्षा की चिंता नहीं होती है.
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होम स्कूलिंग से बच्चों को नुकसान

ट्रेडिशनल स्कूल (Traditional School) में बच्चे शेयरिंग करना सीखते हैं. यहां वे अपनी चीजों के साथ-साथ विचारों का भी आदान-प्रदान शेयर करना सीखते हैं जिससे ये सामाजिक और व्यवहारिक बनते हैं लेकिन होम स्कूलिंग में ऐसा नहीं हो पाता है. घर के संरक्षित वातावरण में रहने की वजह से छात्र का सर्वांगीण विकास नहीं हो पाता है. बच्चों को अनुशासन में रखने की जरूरत होती है जो होम स्कूलिंग में नहीं हो पता है क्योंकि पैरेंट्स ट्रेंड टीचर्स नहीं होते हैं. होम स्कूलिंग में बच्चों के फिजिकली कम एक्टिव होने की आशंका बनी रहती हैं. घर पर हमेशा एक पैरेंट का होना जरूरी होता हैं.
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