Birth Anniversary: आग, पानी, मिट्टी, हवा है मुझ में, मानना पड़ता है ख़ुदा है मुझ में, पढ़ें कृष्ण बिहारी नूर की शायरी


कृष्ण बिहारी नूर के जन्मदिन पर पढ़ें उनकी शायरी (pic credit: facebook/Krishna Bihari Noor)
कृष्ण बिहारी नूर के जन्मदिन पर पढ़ें उनकी शायरी (pic credit: facebook/Krishna Bihari Noor)

कृष्ण बिहारी नूर की शायरी (Krishna Bihari Noor Birth Anniversary):. ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं, और क्या जुर्म है पता ही नहीं...

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  • Last Updated: November 8, 2020, 9:55 AM IST
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कृष्ण बिहारी नूर की शायरी (Krishna Bihari Noor Birth Anniversary Shayari): कृष्ण बिहारी नूर ने शायरी को बड़ी ही नफ़ासत के साथ खूबसूरत लफ्जों में ढाला. उर्दू के अशरार को उन्होंने बेहद ही सुन्दर ढंग से कलमबंद किया. कृष्ण बिहारी नूर का ताल्लुक नवाबों के शहर लखनऊ से था. इसकी झलक उनकी शायरी के अंदाज में भी देखने को मिलती थी. कृष्ण बिहारी नूर 8 नवंबर, 1925 को लखनऊ में हुआ था. आज कृष्ण बिहारी नूर के जन्मदिन (Birth Anniversary) पर हम आपके लिए लेकर आए हैं कृष्ण बिहारी नूर की कुछ संजीदा शायरियां ....साभार: रेख्ता

1. आग है पानी है मिट्टी है हवा है मुझ में

और फिर मानना पड़ता है ख़ुदा है मुझ में



अब तो ले दे के वही शख़्स बचा है मुझ में
मुझ को मुझ से जो जुदा कर के छुपा है मुझ में

जितने मौसम हैं सभी जैसे कहीं मिल जाएँ

इन दिनों कैसे बताऊँ जो फ़ज़ा है मुझ में

आइना ये तो बताता है मैं क्या हूँ लेकिन

आइना इस पे है ख़ामोश कि क्या है मुझ में

अब तो बस जान ही देने की है बारी ऐ 'नूर'

मैं कहाँ तक करूँ साबित कि वफ़ा है मुझ में.

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2. ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं

और क्या जुर्म है पता ही नहीं

इतने हिस्सों में बट गया हूँ मैं

मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं

ज़िंदगी मौत तेरी मंज़िल है

दूसरा कोई रस्ता ही नहीं

सच घटे या बढ़े तो सच न रहे

झूट की कोई इंतिहा ही नहीं

ज़िंदगी अब बता कहाँ जाएँ

ज़हर बाज़ार में मिला ही नहीं

जिस के कारन फ़साद होते हैं

उस का कोई अता-पता ही नहीं

कैसे अवतार कैसे पैग़मबर

ऐसा लगता है अब ख़ुदा ही नहीं

चाहे सोने के फ़्रेम में जड़ दो

आईना झूट बोलता ही नहीं .

3. नज़र मिला न सके उस से इस निगाह के बअ'द

वही है हाल हमारा जो हो गुनाह के बअ'द

मैं कैसे और किस सम्त मोड़ता ख़ुद को

किसी की चाह न थी दिल में तेरी चाह के बअ'द

हवस ने तोड़ दी बरसों की साधना मेरी

गुनाह क्या है ये जाना मगर गुनाह के बअ'द

ज़मीर काँप तो जाता है आप कुछ भी कहें

वो हो गुनाह से पहले कि हो गुनाह के बअ'द

कटी हुई थीं तनाबें तमाम रिश्तों की

छुपाता सर मैं कहाँ तुझ से रस्म-ओ-राह के बअ'द

गवाह चाह रहे थे वो बे-गुनाही का

ज़बाँ से कह न सका कुछ ख़ुदा गवाह के बअ'द .
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