लाइव टीवी

कृष्णा सोबती पुण्यतिथि विशेषः गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान : तक़सीम हुई देह न बांट सकी रूह का दर्द

News18Hindi
Updated: January 25, 2020, 4:25 PM IST
कृष्णा सोबती पुण्यतिथि विशेषः गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान : तक़सीम हुई देह न बांट सकी रूह का दर्द
साहित्यिक पुरस्कारों से नवाजी जा चुकी कृष्णा सोबती को हिंदी कथा साहित्य की मजबूत स्वर रही हैं.

रजवाड़ों की पुरानी बस्तियां भी दादी को दिलचस्प लगेंगी. उन्हें तो सुनने वालों की मजलिस चाहिए. ऐमनाबाद के नन्दा दीवानों की बेटी बातचीत में माहिर. दादा साहिब की तीसरी पत्नी शोख और वार्तालाप की चसकोरी मशहूर थी और अब!

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 25, 2020, 4:25 PM IST
  • Share this:
सोजत रोड से रेल में बैठते ही एक नया सफर शुरू हुआ. सिरोही से अहमदाबाद और अहमदाबाद से बम्बई. महसूस हुआ, जिन्दगी के ट्रैक बदल रहे हैं. सामने की सीट पर अनजान चेहरों के बीच जुत्शी साहिब हाथ में अखबार लिये खबरें पढ़ने में मसरूफ थे.

उसने खिड़की में कोहनी टेक बाहर नजर गड़ा ली. मन ही मन साथ लिए रुपयों की गिनती करने लगी. जाने कितने पेड़ों को भागते देखा होगा कि कहीं से उठकर एक छोटा-सा इत्मीनान आंखों की कोर तक सरक आया. जरा-सी नमी. सभी कुछ प्रतिकूल नहीं, कुछ तो अनुकूल भी है. झटक दो उस अंधियारी कड़ी को. इस प्राचीन अनजान नगर के निवासियों ने अपनी रिहायश के लिए पसंद का घर एलॉट कर दिया. एक सुहावने सपने की तरह रूपविलास के किनारे लगी छोटी-सी कॉटेज गंगावा. हरी जाफरी, ऊपर लाल पक्की टाइलों की छत. पीछे पूरी छत को ढांपे हुए एक पुराना पेड़. बरामदे के सामने कुंआ. रहने के लिए और क्या चाहिए!

खुला बड़ा बाथरूम, साफ-सुथरा सफ़ेद टाइलों का फर्श! बरामदा लकड़ी की चौकोर जाफरी से सुरक्षित. कुछ गुजारे माफिक फर्नीचर चाहिए होगा. बरामदे में खाने की मेज और कुर्सियां. स्टडी टेबल. बैडरूम के लिए पलंग. तीसरे कमरे में फर्श बिछाया जा सकता है. पीडब्लूडी को फिर से लिखना होगा. वैसे तीन कमरों का घर अकेले के लिए बड़ा है. इन दिनों घरों में एक-एक कमरे में छह-छह, आठ-आठ जन पड़े हैं. बाहर बरामदे भरे हैं. सिर्फ हमारे पढ़ने वाले छोटे कमरे में दादी मां और बीमार चचा बलराज टिके हैं. दो पलंग और पढ़ने वाली दो मेज.

बलराज चचा कितने समझदार, मगर इलाज के मामले में एक ही रट कि हॉस्पिटल नहीं जाऊंगा. यह घर ठीक-ठाक हो जाए तो कुछ दिनों को दादी मां को यहां बुला सकूंगी. खुले एकान्त में बनी गंगावा कॉटेज दादी मां को अपने फार्म की याद दिलाएगी. खयालों ही खयालों में देखा, बरामदे में मेज लगी है और दादी मां कुर्सी पर बैठी चाय की प्याली हाथ में लिए बातों पर बातें कात रही हैं. अंग्रेजों के जमाने की कहानियां. तीन पीस सूट साढ़े तीन रुपए में, दिल्ली दरबार में हाजिर होने वाले कुर्सीनशीन, राय साहिब, राय बहादुरों द्वारा खरीदने के लिए इंग्लैंड से आए थे.

रजवाड़ों की पुरानी बस्तियां भी दादी को दिलचस्प लगेंगी. उन्हें तो सुनने वालों की मजलिस चाहिए. ऐमनाबाद के नन्दा दीवानों की बेटी बातचीत में माहिर. दादा साहिब की तीसरी पत्नी शोख और वार्तालाप की चसकोरी मशहूर थी और अब! जमीन-जायदाद और जेब की औकात सब पीछे रह जाने पर चेहरे पर सदमे फैले हैं. आंखें अन्दर धंसी हुईं. बालों की कोई देखभाल नहीं. अकेले में हफ्तों रोती रही हैं. बेटों-बहुओं वाले परिवार में अब वह पुराने फर्नीचर की तरह महसूस कर रही हैं. दादा साहिब के जाने के बाद उनका ऐमनाबाद फार्म पर ही रहने का निर्णय किसी को भी अटपटा नहीं लगा था. वह किसी बेटे के साथ रही ही नहीं. अपने घर में अपनी खुदमुख्तारी. और अपना हुक्म हासिल! बेटों के शादी-ब्याह होते ही उनकी गृहस्थी अलग उन्हीं के हाथ में सौंपकर वह खुश और बहू-बेटे भी बेफिक्र!

अपने घर जब कभी भी उनका आगमन होता, चाव-चाव उनकी पसन्द के पकवान बनते और वे हंसी-खुशी संतोष से विदा होतीं. हम बच्चे उनकी कहानियों के लिए उन पर फिदा रहते. कहानियां राजा-रानियों की नहीं- अंग्रेज हाकिमों की, बंगाल के इन्कलाबियों और देसी लोगों के स्वाभिमान की. दिल्ली के चांदनी चौक में लॉर्ड हार्डिंग के जुलूस का किस्सा सबसे ज्यादा दिलचस्प! घर के पुराने कामकाजी महानन्द और मास्टर साहिब के साथ उनके बेटे देवराज, पृथ्वीराज, बोधराज, धनराज, देसराज और लेखराज. बेटों को राय साहिब के दोस्त गौरीशंकर के चबारे भेज दिया. साथ गया खाने-पीने के सामान से भरा टिफिन कैरियर. छज्जे के जंगले से सटे बच्चों की नजर से लाट साहिब का हाथी ओझल हो गया तो एकाएक बम फटने की आवाज से चांदनी चौक में भगदड़ मच गई. जो जहां था, वहीं रोक दिया गया. बच्चे अगले दिन घर पहुंचे. रात-भर गौरीशंकर के चबारे पर ही टिकना पड़ा. मास्टर जी, महानन्द और कलकत्ती टिफिन कैरियर ने मेरे बेटों की अच्छी देखरेख की. नहीं तो बच्चे बिना खाए-पिए क्या करते!

वही जिन्दादिल दादी हमारी अब खामोश पड़ी रहती है. गाड़ी रुकी. उसने बाहर झांका. सिगनल न होने से गाड़ी स्टेशन से पहले रुक गई है. उसने पर्स को सावधानी से समेटा और जुत्शी साहिब से पूछाकोई बड़ा स्टेशन आएगा क्या? डाइनिंग-कार से चाय पीकर आ सकती हूं.

अरे क्या सोच रही हैं आप. यह फ्रंटियर मेल नहीं. चाय तो सिर्फ वैंडर से ही मिलेगी. ओह!
वह वापिस बैठ गई.

 

फ्रंटियर मेल

दिल्ली स्टेशन पर फ्रंटियर मेल के सामने खड़ा है लाहौर जाती लड़कियों का गुच्छा. भगवती, किरण, सतवाद और कृष्णा, चुलबुली लड़कियों की हंसी. दिसम्बर की छुट्टियों के बाद लाहौर जा रही हैं. उस दृश्य को क्या अब दोहराया जा सकता है! नहीं. अब तो वह कभी लौटाया ही नहीं जा सकता. हम लड़कियों की रात-भर की चेहमेगोइयां.

वह अहमदाबाद में प्रकाश मौसी और मुकुल मौसा की बात सोचने लगी. उनके यहां भी नाते-रिश्तों की शरणार्थी भीड़ जमा हुई पड़ी होगी. छोटी मौसी शान्ति भल्ला, मौसा, उनके बच्चे सत प्रकाश और सविता. मुकुल मौसा के अपने चचा-चाची, बुआ-फूफा, उनका परिवार और उनके समधी. अपने यहां दिल्ली में रुकते-रुकते कोई लखनऊ, जयपुर, अम्बाला और कोई अहमदाबाद, बम्बई रवाना होते रहे हैं. यह रुचिकर कि और कुछ नहीं तो मिल की मजदूरी तो मुकुल साहिब की मदद से मिल सकेगी. मंझली मौसी रामप्यारी और कोएटा से आए मौसा विश्वम्भर नाथ नन्दा साहिब अम्बाला से कभी नीलोखेड़ी का नया शहर बसाने में व्यस्त, कभी नई राजधानी चंडीगढ़ की योजनाओं में मसरूफ. भूचाल में गर्क हो चुके कोयटा शहर का दुबारा निर्माण करवाने वाले वही थे! अब उनका अनुभव विस्थापितों के लिए. एक दिन हाल ही में उनके साथ ऊपर घर पर आए थे एस.के.डे और बलोच गांधी. बलोच गांधी अब भी गांधी के भगत हैं. घेरदार सलवार, लम्बी कमीज और पठानी चप्पल. कितना अचरज हुआ था उन्हें देखकर. मुल्क के दो टुकड़े हो चुके हैं. पाकिस्तान बन चुका है और वे यहाँ मौजूद होकर कहाँ देख रहे हैं. जो घटित हो चुका है, क्या उसे बदला जा सकता है!

उसने हड़बड़ाकर अपना पर्स खोला. छोटी-सी जेब में इलायची खोजने लगी. न पाकर पर्स बन्द किया, हैंडल की कलाई पर लपेटा और टेकन लगाकर आंखें मूंद लीं.

इक्की दुक्की तिक्की
मैं तीन भाइयों से निक्की
मेरे मजे ही मजे
तीन मेरी राखियाँ
तीन मेरे टिक्के

गाड़ी हरकत में थी. घूंघटा निकाले पास बैठी मांं बच्चे को दूध पिला रही है. उसके साथ जमा उसका धनी गाड़ी के हिचकोलों में नींद ले रहा है. सिर की पाग, मूंछें उसके नक्श उभार रही हैं. उसने दुपट्टे के छोर से आंखें पोंछीं और सपने को पाकिस्तान की ओर धकेल दिया. सपनो, जाओ वहीं जाओ. यहां भेस बदलकर वहां ताक-झांक करने से क्या फायदा! मेरी ओर से कोई उधार तो बाकी नहीं.

बिम्बो की मां को रोते-पीटते देख उसका दिल दहल गया था. उसकी बेटी और मेरे बचपन की सहेली भारत मां की धरती तक न पहुँच सकी. चिट्टा दूध उसका रंग-सुनहरी बाल और घनीली आंखें! मां छाती पीटकर रो पड़ती, हाय दुश्मनों उसे वहीं रख लिया होता! उसका चोला बदल दिया होता. उसकी बांहें क्यों काट फेंकीं?

कृष्णा सोबती के उपन्यास काफी चर्चा में रहे हैं.
कृष्णा सोबती के उपन्यास काफी चर्चा में रहे हैं.


उसे याद आई- आंखों के आगे लटक गई वह रात, जब उसने आधी रात को लौटकर राइटिंग-पैड पर 'डरो मत, मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा! कहानी लिखी थी और अगली दुपहर 'प्रतीक' को भेजी थी. बिम्बो की मां का आगमन. रोने-करलाने की आवाजें एक-एक को दहला गईं. छाती पीट-पीटकर नेहरू, जिन्ना को गालियां देती ने सबको डांवाडोल कर दिया था. अरे सरकार वालो-कुॢसयोंवालो, तुम्हारी भी वहीं जाए जहां हमारी पली-पलाई सजरी परणाई बेटी गई है. अरे खलकत को बचाने के लिए तुम्हारे पास पुलिस-फौज नहीं थी तो क्यों बंटवारा माना था. बापू गांधी, तुम क्यों चुप हो? जिस नेहरू को तुमने अपना पुत्र बनाया, उससे अपना हुक्म क्यों न मनवाया!

उसने अपने लम्बे बालों की गुंथी चुटिया हाथ लगाकर महसूस की. भयभीत होकर सोचा, क्या लम्बे बालों वाली लड़कियां देर तक जीती हैं? बिम्बो के बाल क्या पतले, उलझे और महीन थे?

यह क्या अवा-तवा सोच रही हूं. उधर ध्यान करो कि श्रेयस को देखने जाने पर हमें क्या-क्या नोट करना होगा. तलाक्षी द्वारा भेजी लिस्ट पर निशान क्यों न लगा लो कि हमें शिशुशाला में क्या-क्या चाहिए.
शिशुशाला की शैल्फ और चौकियां कम ऊंची होनी चाहिए. जहां बच्चों का हाथ आसानी से उन तक पहुंच सके. बच्चों के जूतों के लिए प्रवेश-द्वार पर ही दीवार के साथ-साथ एक खुली शैल्फ होनी चाहिए. नाश्ते के लिए एक चौड़ी, लम्बी चौकी. नाश्ता क्या शिशुशाला की ओर से दिया जाना चाहिए? शिशुशाला के बजट पर निर्भर करेगा.

फोटो साभारः ट्विटर
फोटो साभारः ट्विटर


क्या इतने छोटे बच्चों को यूनीफार्म लगाना सही होगा! कैसे बच्चे होंगे सिरोही के!
यह क्या सोच रही हो—बच्चे कहीं के भी हों, एक जैसे होते हैं. छोटे बच्चे!
उसने अटैची खोल डायरी निकाली—पैन खोला—जुत्शी साहिब बोले—सोबती बाई, अब क्या करने जा रही हैं? कागज कलम अन्दर रख लीजिए. अहमदाबाद पहुंचने ही वाले हैं.
उसने अटैची बन्द की. सामान चैक किया और खिड़की से बाहर देखने लगी. भारतभूमि का विस्तार! अपना देश कितना विशाल! राजस्थान की सीमाएँ गुजरात से मिल रही हैं.
कभी शहरों की बस्तियाँ, प्रजाएं सरहदों के पार भी कर दी जाती होंगी!
एक गुजरात इधर, एक गुजरात उधर!

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए लाइफ़ से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: January 25, 2020, 4:23 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर