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दिल्ली को नेताओं ने हैमलिन बना दिया और हुआ कुछ ऐसा...

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Updated: November 16, 2019, 4:44 PM IST
दिल्ली को नेताओं ने हैमलिन बना दिया और हुआ कुछ ऐसा...
सम-विषम योजना के लागू करने से प्रदूषण स्तर में 5 से 15 फीसद की कमी आई है. यदि छूट हटा दी जाए तो प्रदूषण स्तर और कम हो सकता है.

जवान चूहे बूढ़ों का मुंह ताक रहे थे. उनको लगता था कि उन्होंने इतनी उम्र गुजार दी है जरूर उन्हें इस बात का पता होगा कि किस तरह से बिल्ली से निजात मिल सकती है.

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  • Last Updated: November 16, 2019, 4:44 PM IST
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(पंकज रामेन्दु)

एक बार चूहों के अड्डे पर बिल्ली का आतंक फैल गया. बिल्ली रोज आती और दो चार चूहों को मुंह मे दबा कर चली जाती. धीरे-धीरे चूहों की संख्या में कमी आ रही थी. जवान चूहे बूढ़ों का मुंह ताक रहे थे. उनको लगता था कि उन्होंने इतनी उम्र गुजार दी है जरूर उन्हें इस बात का पता होगा कि किस तरह से बिल्ली से निजात मिल सकती है. अब बूढ़ों से पूछा गया तो उनको जवाब देना भी जरूरी हो गया  तो उन्होंने काफी सोच विचार के बाद कहा कि अगर बिल्ली के गले में घंटी बांध दी जाए तो हमारा बचाव हो सकता है. क्योंकि जब बिल्ली आएगी तो घंटी भी बजेगी और हम सब सचेत हो जाएंगे.

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बिल्ली के गले में घंटी बांधी कैसे जाए ?

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बूढ़ों ने ये भी बताया कि ये वो तरीका है जिसे उनके पुरखे उन्हें बता कर गए थे. जवानों से सोचा कि जब इतना पुराना तरीका है तो कारगर भी होगा. सब लोग बिल्ली के गले में घंटी बाधंने वाले मशविरे पर एकमत हो गए. अब अगला सवाल ये आया कि बिल्ली के गले में घंटी बांधी कैसे जाए ? इस सवाल के जवाब में बूढ़ो का कहना है वो तो हमे पता नहीं बस हमारे पुरखों से जब हमने पूछा तो उन्होंने यही कहा था कि बिल्ली के गले में घंटी बांधने से समस्या से निजात मिल जाएगी. हमने भी वो बात आगे बढ़ा दी.

सम-विषम योजना आधा-अधूरा हल है
आज भी चूहों की संख्या कम हो रही है और बिल्ली का पेट भर रहा है. आज भी चूहे मानते हैं कि बिल्ली के गले मे घंटी बांध दी जाए तो बात जम सकती है. अब दिल्ली पर आ जाइए. माननीय अदालत से लेकर तमाम तरह की पार्टियां यहां उन बूढ़ों की भूमिका में ही है जो बस चिल्लाती फिर रही है कि ऐसा करने से कुछ नहीं होगा लेकिन कैसा करने से कुछ होगा इसको लेकर किसी के पास कोई माकूल जवाब नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने ‘सम-विषम योजना आधा-अधूरा हल है.’ केंद्र की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल एएनएस नादकर्णी का कहना है कि सीपीसीबी के अध्ययन के मुताबिक सम-विषम योजना प्रदूषण के स्तर कम करने में प्रभावी नहीं है.प्रदूषण स्तर में 5 से 15 फीसद की कमी आई है
दिल्ली सरकार के वकील का तर्क है कि सम-विषम योजना के लागू करने से प्रदूषण स्तर में 5 से 15 फीसद की कमी आई है. यदि छूट हटा दी जाए तो प्रदूषण स्तर और कम हो सकता है. अदालत भी दिल्ली सरकार से कह रही है कि बिना किसी छूट के पूर्ण सम-विषम योजना पर आगे बढ़ सकते हैं. तो समझ नहीं आ रहा है रोक कौन रहा है. दरअसल जब तक एक प्रभावी सार्वजनिक परिवहन प्रणाली नहीं होगी हम सिर्फ समस्या पर चर्चा ही करते रहेंगे और लोग मरते रहेंगे.

प्रदूषण के लिए खुद दिल्ली ज़िम्मेदार है
जिस तरह से जब कोई बीमार पड़ता है तो उसके परिवार के लोग, वो हर संभव उपाय करते है जिससे वो ठीक हो जाए, वो एक तरफ ऐलोपैथिक, होम्योपैथिक, आयुर्वेदिक, यूनानी, तरीकों को अपनाता है तो दूसरी तरफ वो भगवान के सामने प्रार्थना भी करता है, उसे लगता है कि कोई भी तरीका काम कर जाए बस मेरा परिवार का सदस्य ठीक हो जाए. उसी तरह का काम हमें यहां भी करने की जरूरत है, हमे हर तरीका अपनाने की जरूरत है.  ‘दि एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट ’ यानि टेरी के हिसाब दिल्ली में होने वाले प्रदूषण के लिए 36 फीसद खुद दिल्ली ज़िम्मेदार है वही इसमें 34 फीसद भागीदार एनसीआर के दूसरे शहर है.

आवासीय इलाकों की प्रदूषण में भागीदारी करीब 10 फीसदी
एक सर्वे के मुताबिक दिल्ली में 2018 तक वाहनों की कुल संख्या 1 करोड़ के ऊपर थी. इसमें दो पहिया वाहनों की संख्या 70 फीसद है और 35 फीसदी चार पहिया वाहन है. टेरी के मुताबिक दिल्ली में 28 फीसद पीएम 2.5 प्रदूषण के लिए यही वाहन ज़िम्मेदार हैं. दिल्ली के आवासीय इलाकों की प्रदूषण में भागीदारी करीब 10 फीसद की है यानी दिल्ली-एनसीआर की हालत खराब करने में उन एयरकंडीशनर, एयर प्यूरीफायर का भी योगदान है जो घरों को ठंडा और शुद्ध बना रहे हैं.  सम-विषम जैसे उपाय कितने फायदेमंद साबित हुए हैं ये अभी साबित होना बाकी है लेकिन हम इस बात से इंकार नहीं कर सकते हैं कि सड़कों पर अगर वाहन कम होंगे तो प्रदूषण कम होगा.

डीजल के बजाए सीएनजी 
हां, पर बगैर किसी विकल्प के वाहनों को रोक देना व्यवस्था को ठप्प कर देना जैसा है. लेकिन 15 दिनों के लिए भी ये उपाय करके अगर हालात को काबू में लाया जा सकता है तो इस उपाय को अपनाया जाना चाहिए. जो लोग पुराने दिल्ली वाले हैं वो जानते होंगे कि एक वक्त दिल्ली में प्रदूषण का स्तर इसी तरह बहुत बढ़ गया था. उस दौरान दिल्ली में सार्वजनिक वाहनों को डीजल के बजाए सीएनजी से चलाने का विकल्प सामने आया था. जिसका पुरजोर विरोध हुआ. इतना की सार्वजनिक वाहनों को चलाने वालों ने एकजुटता दिखाते हुए सड़कों को पूरी तरह ठप्प कर दिया था.

29 सांसदों में से महज 4 सांसद हुए उपस्थित
तात्कालीन मुख्यमंत्री शीली दीक्षित में भी तमाम राजनातिज्ञों की तरह इच्छाशक्ति की कमी दिखाई दी थी, तब अदालत ने सख्ती दिखाते हुए सीएनजी लागू करने का फैसला सुना दिया था. उसी का नतीजा है कि दिल्ली में प्रदूषण पर नियंत्रण हो सका था. नहीं तो आज हालात बद से बदतर हो चुके होते. लेकिन राजनीतिक स्तर पर इतने सालों में कुछ नहीं बदला. खासकर नेताओं की पर्यावरण को लेकर गंभीरता जस की तस ही है. 15 नवंबर को दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण पर क्या कदम उठाये जाने चाहिए इसे लेकर एक मीटिंग रखी गई थी जिसमें 29 सांसदों में से महज 4 सांसद उपस्थित हुए. इस बात से साफ हो जाता है कि हमारे राजनेता क्या सोच रखते हैं.

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दोषारोपण का प्रदूषण
पूर्वी दिल्ली से क्रिकेटर से सांसद बने गौतम गंभीर की इंदौर में जलेबी खाती हुई फोटो तो उनकी आनंद की कहानी बयान कर रही है. कम होने का नाम नहीं ले रहे प्रदूषण में अब नेता दोषारोपण का प्रदूषण और फैला रहे हैं. आप पार्टी ट्वीट करके गौतम गंभीर को शर्म करने को कह रही है. गौतम गंभीर जवाबी हमला करते हुए कह रहे हैं कि अगर मेरा मज़ाक उड़ाने से दिल्ली का प्रदूषण कम हो जाता है तो खूब मज़ाक उड़ाइए. कई सांसद कह रहे हैं कि हमें इस मीटिंग के बारे में पहले इत्तिला नहीं किया गया था. कुछ कह रहे हैं कि मीटिंग शीतकालीन सत्र के दो दिन पहले रखी गई इसलिए हम कैसे आ सकते थे.

हैमलिन शहर में चूहों का आतंक हो गया था
केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर कह रहे हैं कि उन्हें संसदो के मीटिंग में उपस्थित नहीं होने वाली बात का इल्म नहीं था, वो इसकी जांच करवाएंगे. दिल्ली सरकार का कहना है कि 8 नवंबर को मीटिंग के बारे मे सूचना दे दी गई थी कि 15 नवंबर को मीटिंग है. कुल मिलाकर दिल्ली बचपन में सुनी कहानी का हैमलिन शहर बना हुआ है.  जर्मनी के हैमलिन शहर में चूहों का आतंक हो गया था, लोग आजिज़ आ गए थे, तभी एक दिन एक अजनबी आता है और आकर कहता है कि वो चूहों से निजात दिला सकता है, लेकिन उसे इनाम क्या मिलेगा. हेंमलिन का मेयर उसे 10 हज़ार सोने के सिक्के देने की बात कहता है. वो अपनी बांसुरी बजा कर सारे चूहों को शहर से बाहर ले जाता है और नदी मे डुबो देता है.

मेयर को गलती का अहसास होता है
बाद में मेयर उस अजनबी से कहता है कि तुमने काम तो बढ़िया किया लेकिन इसके लिए तुम्हे 500 सोने के सिक्के से ज्यादा नहीं दिए जा सकते हैं. अजनबी कुछ नहीं कहता है बस शहर में जाकर फिर से बांसुरी बजाता है और इस बार शहर के सारे बच्चे शहर से गायब हो जाते हैं. जब शहर में हडकंप मचता है तो मेयर को गलती का अहसास होता है और वो अजनबी से कहा वादा पूरा करता है. यहां तो बांसुरी बजाने वाला कोई अजनबी नहीं है बल्कि हमारी प्रकृति है जिससे हमारे नेताओं ने अच्छा करने का वादा किया था लेकिन वो वादा भूल गए है और हम हमारे बच्चे धीरे-धीरे उस सजा को भुगत रहे हैं.

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First published: November 16, 2019, 4:42 PM IST
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