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डिप्रेशन की ओर धकेल सकते हैं फुर्सत के पल- रिसर्च

फुर्सत के पलों को बेकार समझने से अवसाद बढ़ता है.  (image- Shutterstock)

फुर्सत के पलों को बेकार समझने से अवसाद बढ़ता है. (image- Shutterstock)

Depression: अगर लोगों ने यह सोचना शुरू कर दिया कि फुर्सत बेकार है, तो वह तनाव में आ जाते हैं. पढ़िए, ये रिपोर्ट

  • News18Hindi
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    Depression In Free Time: भागदौड़ की जिंदगी में लोग फुर्सत के पल पाने के लिए हमेशा आतुर रहते हैं. वह हर समय यही सोचते रहते हैं कि समय मिले तो थोड़ा चैन से बैठेंगे, आराम करेंगे, कुछ हटकर करेंगे. लेकिन यही फुर्सत परेशानी का सबब भी बन सकती है. हिंदी अखबार हिंदुस्तान में छपी रिपोर्ट के मुताबिक फुर्सत के पलों में भी अवसाद मतलब डिप्रेशन (Depression) बढ़ता है. अमेरिका की ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी (Ohio State University) के शोधकर्ताओं के अनुसार जब आप ये सोच लेते हैं कि आप फुसर्त में बैठे हैं और आपसे कोई काम नहीं हो पा रहा है, तो आपकी फुर्सत गायब हो जाती और टेंशन बढ़ जाती है.

    यह शोध जर्नल ऑफ एक्सपरिमेंटल सोशल साइकोलॉजी (Journal of Experimental Social Psychology) में प्रकाशित हुआ है. रिसर्चर्स ने मॉर्डन सोसाइटी की इस आम धारणा पर स्टडी की है कि अंतिम लक्ष्य तो उत्पादकता ही है और मौज-मस्ती वेस्टेज ऑफ टाइम है.

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    फुर्सत में डिप्रेशन बढ़ना
    इस स्टडी के सह-लेखक सेलिन माल्कोक के मुताबिक ज्यादातर लोगों ने बताया कि फुर्सत के पलों में वो मानसिक तौर पर कमजोर भी हुए हैं. उन्होंने कहा कि ऐसे कई शोध हुए हैं जिनमें कहा गया है कि फुर्सत के पलों का लोगों को फायदा पहुंचा है, इससे उत्पादकता (Productivity) बढ़ी है. लेकिन हमने पाया है कि अगर लोगों ने यह सोचना शुरू कर दिया कि फुर्सत बेकार है, तो वह तनाव में आ जाते हैं.  एक अन्य शोधकर्ता ने बताया कि यदि किसी उत्पादक कार्य के लिए फुर्सत के पलों का इस्तेमाल किया जाए तो ज्यादा फायदा होता है.

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    फुर्सत के समय में आप क्या करते हैं या क्या सोचते हैं, उससे खुशी, तनाव या अवसाद की स्थिति तय होती है. यदि आप खाली समय में व्यायाम करते हैं तो खुशी मिल सकती है और टीवी देखने में समय गंवाते हैं तो अवसाद के शिकार हो सकते हैं.

    कई देशों के लोगों के बीच तुलनात्मक अध्ययन
    रिसर्च के अनुसार कोई देश नहीं है जहां के लोगों में फुर्सत के पलों में लोगों में नकारात्मकता का भाव आता हो. भारत, अमेरिका और फ्रांस के लोगों के बीच तुलनात्मक अध्ययन में पाया है कि फ्रांस के लोगों में अमेरिका के लोगों की तुलना में कम नेगिटिविटी रही. भारत में सांस्कृतिक रूढ़ियों के कारण लोग फुर्सत के पलों को बेकार ही मानते हैं.

    रिसर्च का नतीजा 
    एक अन्य शोधकर्ता रेबाका रेकजेक ने बताया,  हम एक ऐसे वैश्विक समाज में रहते हैं जहां ज्यादातर यह माना जाता है कि व्यस्त और उत्पादक कार्यों से जुड़ा रहना बहुत ही अहम है. ऐसे में यदि आपने एक बार मान लिया है कि फुर्सत और मनोरंजन के पल बेकार है तोआप ज्यादा डिप्रेशन में होंगे और खुश नहीं रह पाएंगे.

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