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लाइफ़ कोच: जितनी कविताएं पढ़ रखी थीं, सब दूसरों के ख़तों में खर्ची जा चुकीं

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: January 14, 2018, 4:11 PM IST
लाइफ़ कोच: जितनी कविताएं पढ़ रखी थीं, सब दूसरों के ख़तों में खर्ची जा चुकीं
किताब पढ़ने के बाद मैंने कभी किसी चिट्ठी की शुरुआत कविता से नहीं की
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: January 14, 2018, 4:11 PM IST
तब कविता को लेकर मेरी समझ बहुत से बहुत ‘दिल करता है धक-धक-धक, प्यार की आग है फक-फक-फक...’ या फिर ‘तूने मुझसे की लड़ाई, मैंने तेरी की पिटाई...’ तक हुआ करती थी. ये भी मेरे साथियों के हिसाब से इतनी काफी थी कि मैं सिर तानकर ऐसी ऐंठ से चला करती जो स्कूल बिल्डिंग की ऊंचाई के मानकों को ध्वस्त कर दे. रुठने-मनाने के सिलसिलों में लोग अपनी गुइयां (दोस्तों) के लिए चिट्टियां लिखने को मुझे अप्रोच करते.

कुल मिलाकर अपने स्कूल-टाइम में पक्की लव-गुरू हुआ करती. हर चिट्ठी की शुरुआत और अंत किसी जबर्दस्त कविता (उन्हें दो कौड़ी की शेरो-शायरी करार देते अब भी कलेजे में हौल उठती है) से करती.

कविताओं के साथ जुड़ाव खतो-खिताबत से आगे बढ़ा, जब स्कूल में एक साथ कई कंपीटिशन जीतने पर नाम खुदी हुई ट्रे की जगह सर्टिफिकेट के साथ थोड़े पैसे मिले. पॉकेटमनी जैसी बातें तब हमारे घर में वर्जित-विषय हुआ करती थीं. पेपर या अपनी एक शौकीन चाची की मैग्जीन में ही ये 'टर्म' देख आंखें ठंडी किया करती. घर पर मेहमान पैसे थमाकर जाते तो वो सीधे गुल्लक के पेट में समा जाता. गुल्लक भी तब कमाल हुआ करते थे. आए दिन जाने कितने मुलाकाती आते-जाते बच्चों को पैसे पकड़ाते और पैसे चट से गुल्लक में चले जाते. वे कभी भरते ही नहीं थे. कई सालों बाद पता चला कि पैसे नीचे से निकाल लिए जाते थे.

बहरहाल, इनाम मिला, तब मैं कुछ बड़ी हो चुकी थी और पहली बार एक साथ खुद की कमाई हाथ आई थी तो इन पैसों पर मेरा मालिकाना हक था. खर्च करने के बहुतेरे रास्ते थे. शैंपू लेने से लेकर कान के बुंदे लेने तक विकल्पों पर सोचा गया लेकिन फिर कविताओं की कोई किताब खरीदना तय हुआ.

जितनी कविताएं यहां-वहां से पढ़कर याद कर रखी थीं, सब दूसरों की चिट्ठियों में खर्ची, दोहराई जा चुकी थीं- अब रुतबा कायम रखने के लिए नए सिरे से ज्ञानार्जन जरूरी लगा.

साइकिल चलाकर उस कबाड़ी की दुकान पहुंची, जहां से मैथ्स के सवालों की प्रैक्टिस के लिए कागज लिया करते. गई थी एक किताब के लिए- वहां तो समंदर ठाठें ले रहा था. कई घंटे धूल फांकती बैठी रही. ये तक होश नहीं रहा कि घर देर से लौटने पर सफाइयों (देर से आने की वजह) की सूची थमानी होगी. बहुत छांटकर कुमार अंबुज की एक किताब ली, एक मक्सिम गोर्की और प्राग पर भी एक हिंदी में अनुवादित पुस्तक.

गणित के लिए रफ कागज लेने वाली लड़की की इतनी मेहनत पर कबाड़ी वाला भी अभिभूत था. पूछा- 'पढ़ाई के साथ ये सब भी कर लेती हो, गुड़िया!'

तब स्कूल की किताबों से इतर सब कुछ ‘ये सब’में शामिल हुआ करता था- कम से कम मेरे शहर में तो. लौटते हुए किताबों के चमकीले अक्षर डांट के डर को धुंधला कर चुके थे. कहना न होगा कि पहली किताब पढ़ने के बाद मैंने फिर कभी किसी चिट्ठी की शुरुआत और अंत किसी 'कविता' से नहीं किए.

कविताओं की रवानगी कितनी ही बार आंखों में ऐसी नमी ला देती है, जो बादलों में तब्दील-होनी-भर बाक़ी है. गद्य पढ़ना पसंद है लेकिन कविताएं उनके बीच ‘म्यूज़िकल इंटरवल’ की-सी लगती हैं. 
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