'औरत बोली तो झूठ बोली और जो नहीं बोली तो अपने फायदे के लिए नहीं बोली'

अब तक औरतें इसलिए नहीं बोली थीं क्‍योंकि अब तक वो अकेली थीं. उनके साथ छेड़खानी होती तो समाज उनके कपड़ों का ब्‍यौरा पूछता. क्‍या पहना था तुमने, कैसे देखा, कैसे चली, क्‍यों चली, तुम गई ही क्‍यों, तुम वहां थी ही क्‍यों. तुम्‍हारे साथ ही ऐसा क्‍यों हुआ.

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: January 11, 2019, 2:59 PM IST
'औरत बोली तो झूठ बोली और जो नहीं बोली तो अपने फायदे के लिए नहीं बोली'
आलोक नाथ की जमानत के क्‍या हैं मायने
Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: January 11, 2019, 2:59 PM IST
आलोक नाथ पर यौन उत्‍पीड़न का आरोप लगा. आलोक नाथ सिर झुकाकर कोर्ट गए और सिर उठाकर इज्‍जत से लौट आए. कोर्ट ने पांच लाख रु. की सिक्‍योरिटी पर उन्‍हें बाइज्‍जत जमानत दे दी.

विनता नंदा भी कोर्ट गईं. वो भी सिर झुकाकर ही गई थीं, शर्म से नहीं, पीड़ा से. लेकिन जितनी पीड़ा से गईं, उससे कहीं गहरी पीड़ा से सिर झुकाकर वापस लौट आईं.

घटना तकरीबन 20 साल पुरानी है. वो 20 साल तक चुप रहीं. डिप्रेशन में गईं, लेकिन कोर्ट नहीं गईं. काम पर असर पड़ा, कंपनी डूब गई, पैसे खत्‍म हो गए, शराब में आसरा ढूंढा, दोस्‍तों का हाथ थामा, लेकिन न्‍यायालय का दरवाजा नहीं खटखटाया.

और आज 20 साल बाद न्‍यायालय कह रहा है कि 20 साल पहले नहीं खटखटाया तो बात सच्‍ची नहीं लगती. आरोप झूठा हो सकता है.

कोर्ट कह रहा है कि 20 साल चुप रहो तो सच झूठ हो जाता है.

कानून की तकरीरों में गुत्‍थमगुत्‍था न्‍यायालय की प्राचीरें जो भी सोचें, लेकिन हम क्‍या सोच रहे हैं कि इस बारे में कि कोई 20 साल क्‍यों चुप रहा?

और वो सैकड़ों-हजारों औरतें जो उससे भी ज्‍यादा सालों से चुप हैं, वो क्‍या सोच रही हैं इस वक्‍त. एक दिन अगर सचमुच वो बोल उठीं तो कोई उनके सच पर यकीन नहीं करेगा क्‍योंकि सच 20 साल पुराना है.
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विनता नंदा ने 20 साल बाद भी न्‍यायालय का दरवाजा इसलिए नहीं खटखटाया था कि 20 साल बाद उनकी आत्‍मा जाग उठी थी. 20 साल बाद इसलिए खटखटाया था क्‍योंकि अचानक इस देश में हवाओं का रुख बदल गया था. विनता ने देखा कि उनके जैसी और ढेरों लड़कियां-औरतें अचानक खुले मंच पर, सबके सामने आकर बोलने लगी थीं कि कब किस-किस मर्द ने कहां और कैसे उनका यौन उत्‍पीड़न किया. वह कब-कब और किस-किस तरह से यौन हिंसा का शिकार हुई हैं.

जो सदियों से चुप रहीं, दबाई गईं, अब वे अचानक बोल रही थीं. वो लगातार बोल रही थीं, वो खुलकर बोल रही थीं, वो चिल्‍लाकर बोल रही थीं. एक बोली, फिर दूसरी, फिर तीसरी. फिर भीड़ जमा हो गई. एक से दूसरे को ताकत मिली, दूसरे से तीसरे को. फिर सारी आवाजें मिलकर अनहद नाद में बदल गईं.
सब साथ बोल रही थीं, सब साथ रो रही थीं.

अब तक औरतें इसलिए नहीं बोली थीं क्‍योंकि अब तक वो अकेली थीं. उनकी परवरिश ने, परिवार ने, समाज ने, लोगों ने उनके साथ होने वाली हर गलत बात की जिम्‍मेदारी उनके ही सिर डाली थी. मर्द की हर गलती का ठीकरा उनके ही सिर फोड़ा था. उनके साथ छेड़खानी होती तो समाज उनके कपड़ों का ब्‍यौरा पूछता. क्‍या पहना था तुमने, कैसे देखा, कैसे चली, क्‍यों चली, तुम गई ही क्‍यों, तुम वहां थी ही क्‍यों. तुम्‍हारे साथ ही ऐसा क्‍यों हुआ.

ये बातें इतनी बार और इतने तरीकों से दोहराई गईं कि हमारे दिमागों ने भी इसे सच मान लिया था. हम इतने सालों तक इसीलिए नहीं बोलीं क्‍योंकि हमें लगता था कि गलती हमारी ही है.
लेकिन एक औरत उठकर बोले कि गलती मेरी नहीं, तुम्‍हारी है तो बाकी औरतों को उस बोलने से ताकत मिलती है. इस बार यही हुआ था. दबी हुई आवाजों को बोलती आवाजों से हिम्‍मत मिली. वो भी बोलने लगीं.
और कोर्ट कह रहा है कि बोलने में देर हो गई. और कोर्ट सिर्फ इतना ही नहीं कह रहा. ये सेशन जज एसएस ओझा का बयान है-

“जहां तक मामले में देर से एफआईआर करने की बात है तो शिकायत में बताया गया है कि विनता ने अपने दोस्तों से इस मामले में सलाह ली थी और उनके दोस्तों ने सलाह दी कि आलोक नाथ एक बड़े एक्टर हैं और तुम्हारी सारी कंपनी पहले ही बंद हो चुकी हैं, इसलिए कोई इस कहानी पर यकीन नहीं करेगा. इसलिए उन्होंने शिकायत दर्ज नहीं करवाई. इसलिए ऑन रिकॉर्ड कुछ भी नहीं है जिससे ये साबित हो सके कि शिकायत करने वाली महिला को धमकी मिल रही थी. ऐसे में ये साबित होता है कि महिला ने शिकायत अपने फायदे के लिए दर्ज नहीं करवाई थी.”

इस सबका लब्‍बोलुआब क्‍या है?
“औरत बोली तो झूठ बोली.”
“औरत नहीं बोली तो अपने फायदे के लिए नहीं बोली.”

एक साल पहले जब हॉलीवुड में मीटू मूवमेंट शुरू हुआ और सालों पुराने मामले खुलने लगे तो ओपरा विनफ्रे ने कहा था-
“हमारी मांएं नहीं बोलीं क्‍योंकि उन्‍हें बच्‍चे पालने थे, घर चलाना था, बिल भरने थे. वो इसलिए नहीं बोलीं क्‍योंकि उन्‍हें जिंदा रहना था.
वो जिंदा रहीं ताकि आज हम बोल सकें.”

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