Birthday Special: धनपत राय कैसे बने हिंदी साहित्य के 'मुंशी प्रेमचंद'

मुंशी प्रेमचंद, जिनके उपन्यास में गांव की मिट्टी, भाषा, रहन-सहन, सामाजिक ढ़ांचे की छुअन महसूस होती है, का आज जन्मदिन है.

Prerana Kumari | News18Hindi
Updated: July 31, 2019, 1:11 PM IST
Birthday Special: धनपत राय कैसे बने हिंदी साहित्य के 'मुंशी प्रेमचंद'
प्रेमचंद
Prerana Kumari | News18Hindi
Updated: July 31, 2019, 1:11 PM IST
'केवल घटना वर्णन के लिए या मनोरंजन घटना को लेकर मैं कहानियां नहीं लिखता. मैं कहानी में किसी दार्शनिक या भावनात्मक लक्ष्य को दिखाना चाहता हूं. जब तक इस प्रकार का कोई आधार नहीं मिलता, मेरी कलम नहीं उठती.'

ये बात आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह 'मुंशी प्रेमचंद' ने अपने एक वक्तव्य में कही थी. वो दौर 'प्रेमचंद' का था. वो दौर जो हिंदी साहित्य के सबसे स्वर्णिमकालों में गिना गया. स्वर्णिम केवल एक नाम के सहारे. नाम जो आज भी 4 साल के बच्चे से लेकर 84 साल के बुजुर्ग के ज़ुबान पर चढ़ा है. उनकी लिखी कहानियां जो आज भी स्कूल और कॉलेज की कक्षाओं में शिक्षक-प्रोफेसर बड़े चाव से पढ़ाते हैं. वो 'मुंशी प्रेमचंद' थे.

एक सफल लेखक, देशभक्त, कुशल वक्ता, ज़िम्मेदार संपादक और संवेदनशील रचनाकार, प्रेमचंद के लिए अनगिनत विशेषणों का प्रयोग किया जा सकता है. पर जो बात सबसे महत्वपूर्ण है, वह यह कि आज यानी 31 जुलाई को उनकी 139वीं जयंती है.

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जन्म और शिक्षा

आज ही के दिन वाराणसी से लगभग चार मील दूर, लमही नाम के गांव में 31 जुलाई, 1880 को उनका जन्म हुआ था. प्रेमचंद का बचपन गांव में ही बीता, इस बात की झलक उनके उपन्यास से साफ पता चलती है. चाहे वो किसानों की आत्महत्या से जुड़े उनके उपन्यास 'गोदान', 'प्रेमाश्रम' या 'सवा सेर गेहूं' हों या फिर दलितों पर अत्याचार से जुड़े उपन्यास 'कफन' और 'ठाकुर का कुआं'. उनके हर उपन्यास में गांव की मिट्टी, भाषा, रहन-सहन, सामाजिक ढांचे की छुअन महसूस होती है.

प्रेमचंद को बचपन से ही पढ़ने का शौक था, पर वह लेखक नहीं बनना चाहते थे. उन्होंने तो वकील बनने का सपना देखा था. पर गरीबी ने रास्ता रोक लिया.
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गरीबी से लड़ते हुए प्रेमचंद ने अपनी पढ़ाई मैट्रिक तक पहुंचाई. इसी बीच में उनके पिता का देहांत हो गया. इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य, पर्सियन और इतिहास जैसे विषयों से स्नातक की उपाधि द्वितीय श्रेणी में प्राप्त की.

प्रेमचंद और साहित्य

साहित्य की बात करते हुए प्रेमचंद लिखते हैं- 'जो धन और संपत्ति चाहते हैं, साहित्य में उनके लिए स्थान नहीं है. केवल वे, जो यह विश्वास करते हैं कि सेवामय जीवन ही श्रेष्ठ जीवन है, जो साहित्य के भक्त हैं और जिन्होंने अपने हृदय को समाज की पीड़ा और प्रेम की शक्ति से भर लिया है, उन्हीं के लिए साहित्य में स्थान है. वे ही समाज के ध्वज को लेकर आगे बढ़ने वाले सैनिक हैं.' 'साहित्यकार' की ये परिभाषा प्रेमचंद ने गढ़ी थी.



ये बात आमूमन सभी लोगों को पता है कि प्रेमचंद का वास्तविक नाम 'धनपत राय' था. जबकी प्रेमचंद उनका साहित्यिक नाम.

लेखनी के शुरुआती दिनों में जब उन्होंने सरकारी सेवा करते हुए कहानी लिखना शुरू किया, तब वह अपना नाम 'नवाब राय' लिखा करते थे. लेकिन जब सरकार (ब्रिटिश) ने उनका पहला कहानी-संग्रह, ‘सोजे वतन’ जब्त किया, तब उन्हें नवाब राय नाम छोड़ना पड़ा. बाद में जाकर वह प्रेमचंद के नाम से प्रकाशित होने लगे. प्रेमचंद ने उपन्यास, कहानी, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय, संस्मरण आदि अनेक विधाओं में साहित्य की सृष्टि की, किन्तु प्रमुख रूप से वह कथाकार हैं. उन्होंने कुल 15 उपन्यास, 300 से कुछ अधिक कहानियां, 3 नाटक, 10 अनुवाद, 7 बाल-पुस्तकें तथा हज़ारों पृष्ठों के लेख, सम्पादकीय, भाषण, भूमिका, पत्र आदि की रचना की. लेकिन उनकी लिखी सभी रचनाएं और उनकी उक्तियां आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी दशकों पहले हुआ करती थीं.

उन्हीं में से कुछ उक्तियां हम यहां आपके लिए लेकर आए हैं....

'विपत्ति से बढ़कर अनुभव सिखाने वाला कोई विद्यालय आज तक नहीं खुला'

'अमीरी की कब्र पर पनपी गरीबी बड़ी जहरीली होती है'

'सफलता में दोषों को मिटाने की विलक्षण शक्ति है'

'आत्मसम्मान की रक्षा हमारा सबसे पहला धर्म है'

'जीवन का वास्तविक सुख दूसरों को सुछ देने में है, न कि उन्हें लूटने में'
First published: July 31, 2019, 5:26 AM IST
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