"इस आदिवासी सांसद के बारे में पूरा रिकॉर्ड भी संसद में उपलब्ध नहीं"

वर्ष 1956 में लाल श्याम शाह ने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था. अब वह पूरी तरह से स्वतंत्र थे. इस बीच, उन्होंने छत्तीसगढ़ और विदर्भ के क्षेत्र में काफी यात्राएं कीं और अपने आंदोलन को विस्तार दिया.

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Updated: January 12, 2018, 4:37 PM IST
सुदीप ठाकुर की किताब
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सुदीप ठाकुर

संसद में एक दिन...

वर्ष 1956 में लाल श्याम शाह ने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था. अब वह पूरी तरह से स्वतंत्र थे. इस बीच, उन्होंने छत्तीसगढ़ और विदर्भ के क्षेत्र में काफी यात्राएं कीं और अपने आंदोलन को विस्तार दिया. जंगलों में अवैध कटाई के विरोध साथ ही उन्होंने अपने आंदोलन को आदिवासी अस्मिता से जोड़कर और व्यापक कर लिया. वह आदिवासियों के एक बड़े आंदोलन की तैयारी कर रहे थे. भाषायी आधार पर राज्यों का पुनर्गठन हो चुका था, जिसका असर मध्य प्रदेश पर भी पड़ा था. पुनर्गठन के बाद विदर्भ वाला हिस्सा, बॉम्बे स्टेट में चला गया. वहीं बस्तर सहित पूरा छत्तीसगढ़ नए मध्य प्रदेश में आ गया. लाल श्याम शाह राज्यों के इस पुनर्गठन से खुश नहीं थे. वह आदिवासियों के लिए अलग गोंडवाना राज्य चाहते थे.

राज्यों के पुनर्गठन के दो महीने बाद ही फरवरी 1957 में दूसरे आम चुनाव और राज्यों के विधानसभा चुनाव तय थे. विधानसभा से इस्तीफा देने के बावजूद लाल श्याम शाह बखूबी जानते थे कि आदिवासियों के हक की लड़ाई राजनीतिक तौर पर ही लड़ी जा सकती है और इसके लिए जरूरी है कि आदिवासियों के बीच से अधिक से अधिक लोग देश की संसद और विधानसभाओं में जाएं. दूसरे आम चुनाव की सरगर्मियों के बीच 26 जनवरी, 1957 को आदिवासी सेवा मंडल के सभापति के रूप में उन्होंने, 'आदिवासी भाई चेत जाइये',शीर्षक से एक पर्चा निकाला. इसमें उन्होंने आदिवासी सभ्यता और संस्कृति को मिल रही चुनौतियों को रेखांकित किया और आदिवासियों को आगाह किया कि जब तक वे अपने मन से डर व संकोच न हटा दें, अपनी पुरानी जाति को नष्ट होने से नहीं बचा सकेंगे. 

उन्होंने लिखा, ..."उन लोगों से जिनका धन संग्रह करना ही लक्ष्य है, हमारी आकांक्षाएं बिल्कुल भिन्न हैं. इस भला चाहने वाली सरकार ने हमेशा हमारी उपेक्षा की है. सरकारी उच्च व निम्न स्तर पर क्या हो रहा है? हमेशा हमारी उन्नति जैसा कि हमारे देश के नेता कहते आ रहे हैं, रुपयों के आंकड़ों में तौली जाती है; परंतु भाग्य या दुर्भाग्य से हम यह सोचने व विश्वास करने लगे हैं कि हमारे विकास की ये योजनाएं हमें अपने उद्देश्य तक नहीं पहुंचाती हैं. हमारी वास्तविक इच्छाएं व आकांक्षाएं हमारी संस्कृति एकता की सुरक्षा में है. अब प्रश्न है कि यह कैसे संभव है? यदि इस प्रश्न पर बिना किसी राजनैतिक दृष्टिकोण के विचार किया जाए, तो इसका हल कठिन नहीं है. वर्तमान राजनैतिक दृष्टिकोण हमारी उन्नति व प्रगति के मार्ग में बहुत बड़ी रुकावट है. क्या राष्ट्रीय सरकार ने आदिवासी समस्या के साथ राजनीति को नहीं घुसेड़ दिया है? इसी तरह क्या राष्ट्रीय सरकार ने समाज विरोधी तत्वों को स्वार्थ सिद्धी का अवसर नहीं प्रदान किया है? हमारी नजर में सरकार और समाज विरोधी तत्व दोनों हमारे पतन के लिए जवाबदार हैं और इसलिए आदिवासियों की असली आवाज पर ध्यान दिया जाना चाहिए. बिल्कुल स्पष्ट तौर पर क्या जबकि नए प्रदेश सांस्कृतिक, भौगोलिक और ऐतिहासिक आधार पर कायम किए जा रहे हैं, हमारी गोंडवाना प्रांत की मांग की उपेक्षा घोर अन्याय है?"

लाल श्याम शाह स्पष्ट तौर पर आदिवासियों के लिए अलग राज्य की मांग कर रहे थे. राजनांदगांव से जारी किए गए इस पर्चे में उन्होंने लिखा, "हमारे सामने केवल एक ही रास्ता रह जाता है कि हम पूरे राष्ट्र में जितनी अधिक विधानसभा व लोकसभा की जगहों पर प्रजातांत्रिक तरीकों से चुनाव लड़कर अपनी वाजिब मांगों को रखें. हमारा उद्देश्य जीवन की आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति-ऐसा जीवन जो सही मायने में सब शोषक ताकतों से जो हमारी प्रगति व उन्नति में बाधक हैं, रहित रहे. हमने तीर कमान और तराजू चिह्न देश के अलग-अलग हिस्सों में लेने का फैसला किया है. तीर कमान चुनाव चिह्न हमारी संस्कृति का सूचक और तराजू चिह्न सचाई और समानता का द्योतक है...."

यानी वह अपने आंदोलन को अधिक विस्तार के साथ देख रहे थे और इसके लिए चुनाव को एक जरिया मान रहे थे. खुद लाल श्याम शाह ने 1957 में चौकी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने के बजाए चांदा संसदीय क्षेत्र से लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया. राज्यों के पुनर्गठन का असर विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रों के सीमांकन पर भी पड़ा था, जिसकी वजह से चांदा लोकसभा क्षेत्र अब मध्य प्रदेश के बजाए बॉम्बे स्टेट में आ गया था. हालांकि इससे लाल श्याम शाह को फर्क नहीं पड़ा. वैसे भी पानाबरस जमींदारी कभी चांदा जिले का ही हिस्सा थी. चांदा जिले में उनकी ननिहाल थी. चांदा की एक समृद्ध जमींदारी अहेरी (अब गढ़चिरोली जिले में) से उनकी काफी नजदीकी थी. लाल श्याम शाह और अहेरी के जमींदार राजे विश्वेश्वर राव आपस में रिश्तेदार होने के साथ ही गहरे मित्र भी थे. काफी बाद में लाल श्याम शाह के छोटे भाई निजाम शाह की एक बेटी स्नेहा का विवाह भी विश्वेश्वर राव के भाई बलवंत राव के बेटे धर्माराव से हुआ. हालांकि दोनों में एक बड़ा फर्क यह था कि जहां लाल श्याम शाह महाराज निजी संपत्ति और दैनिक जीवन में संत या कहें कि गांधीवादी किस्म के व्यक्ति थे, तो राजे विश्वेश्वर राव में राजा होने की एक ठसक थी. राजे विश्वेश्वर राव के पूर्वजों का चांदा के गोंड राजा से नजदीकी रिश्ता था और रियासतों के विलीनिकरण से पहले अहेरी जमींदारी का खासा दबदबा था. ब्रिटिश काल में अहेरी जमींदारी का आकार कई स्टेट्स से भी बड़ा था. राजे विश्वेश्वर राव के पूर्वजों की चांदा में भी खासी संपत्ति थी.

लाल श्याम शाह को 1,28,233 वोट मिले थे.


लाल श्याम शाह की तरह राजे विश्वेश्वर राव भी आदिवासियों की लड़ाई लड़ रहे थे और वह भी आदिवासियों के लिए अलग गोंडवाना राज्य के समर्थक थे. लाल श्याम शाह के चांदा से लोकसभा का चुनाव लड़ने के पीछे यह एक बड़ी वजह थी. राजे विश्वेश्वर राव ने उसी दौरान चांदा जिले के अंतर्गत आने वाले सिरोंचा विधानसभा क्षेत्र से विधानसभा का चुनाव लड़ने का फैसला किया.

लाल श्याम शाह की तरह राजे विश्वेश्वर राव भी यह मानते थे कि किसी भी राजनीतिक दल से संबद्ध होने पर वे आदिवासियों के हितों की ठीक से रक्षा नहीं कर सकेंगे. 1957 में हुए दूसरे आम चुनाव में लाल श्याम शाह ने चांदा से निर्दलीय के रूप में ही चुनाव लड़ा. सिरोंचा विधानसभा क्षेत्र से राजे विश्वेश्वर राव भी एक निर्दलीय के रूप में उम्मीदवार थे और चुनाव जीतकर पहली बार विधानसभा पहुंचे. 

लाल श्याम शाह चांदा से लोकसभा का चुनाव हार गए. उन्हें कांग्रेस के वीएम स्वामी ने 29,973 मतों से पराजित किया. स्वामी को 1,19949 मत मिले थे और लाल श्याम शाह को 97,973 मत. लाल श्याम शाह नतीजे से संतुष्ट नहीं थे. उन्होंने स्वामी के निर्वाचन को निर्वाचन प्राधिकरण वर्धा में चुनौती दे दी. मगर, तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट जज टी आर गोसवाडे के एक सदस्यीय प्राधिकरण ने लाल श्याम शाह की याचिका खारिज कर दी और स्वामी के निर्वाचन को वैध ठहराया. लाल श्याम शाह इससे भी सहमत नहीं थे. उन्होंने प्राधिकरण के इस फैसले को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन वहां भी फैसला स्वामी के पक्ष में आया.

चुनाव याचिका पर हाई कोर्ट के प्रतिकूल फैसले से लाल श्याम शाह की न तो हैसियत पर कोई फर्क पड़ा और न ही उनके आंदोलन पर.आदिवासी संस्कृति, उनके संसाधनों की रक्षा और गोंडवाना राज्य की मांग को लेकर उनका संघर्ष जारी रहा, बल्कि उनके आंदोलन का दायरा और बढ़ गया.

लोकसभा चुनाव में पराजित होने के बावजूद उनका यह विचार नहीं बदला था कि आदिवासियों की निर्णायक लड़ाई राजनीतिक तौर पर ही लड़ी जा सकती है और इसके लिए लोकसभा और विधानसभा में जाना जरूरी है. पांच वर्ष बाद 1962 में जब तीसरी लोकसभा के चुनाव हुए, तो उन्होंने एक बार फिर चांदा से चुनाव लड़ने का फैसला किया. इस बार भी उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा. इस बार भी वह और कांग्रेस के वी एन स्वामी आमने-सामने थे. इस बार लाल श्याम शाह ने स्वामी को पराजित कर दिया. लाल श्याम शाह को 1,28,233 वोट मिले थे और स्वामी को 85,322 वोट.

राजे विश्वेश्वर राव ने भी 1962 में हुए विधानसभा चुनाव में सिरोंचा से दूसरी बार विधानसभा का चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और विजयी हुए. सिरोंचा विधानसभा क्षेत्र चांदा लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत ही शामिल था, सो लाल श्याम शाह और राजे विश्वेश्वर राव दोनों को ही एक दूसरे से काफी मदद भी मिलती थी और दोनों एक दूसरे के पक्ष में प्रचार भी करते थे. वास्तव में चांदा में स्थित राजे विश्वेश्वर राव का पुस्तैनी आवास 'धर्मराव बंगला' लाल श्याम शाह के चुनाव प्रचार अभियान का मुख्य केंद्र था. 

तीसरी लोकसभा के चुनाव की पूरी प्रक्रिया 19 फरवरी से छह जून 1962 तक काफी लंबी चली थी. उस वक्त की लोकसभा की कुल 494 सीटों में से कांग्रेस को 361 सीटें मिली थीं, और पंडित जवाहर लाल नेहरू का करिश्मा बरकरार था. वह खुद फूलपुर से विजयी हुए थे. दूसरे नंबर पर रहने वाली भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को सिर्फ 29 सीटें मिली थीं.

तीसरी लोकसभा का गठन 2 अप्रैल, 1962 को हुआ था और पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 10 अप्रैल को शपथ ली थी. लोकसभा का रिकॉर्ड बताता है कि तीसरी लोकसभा के गठन के बाद शपथ लेने वाले लाल श्याम शाह सबसे अंतिम सदस्य थे. उन्होंने पांच सितंबर 1962 को शपथ ली थी. लोकसभा के रजिस्टर में जिस पृष्ठ पर लाल श्याम शाह के हस्ताक्षर हैं, ठीक उनके बाद 1963 में हुए लोकसभा के उप चुनाव में विजयी हुए सदस्यों के हस्ताक्षर दर्ज हैं. इनमें समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया और जे बी कृपलानी जैसे नेता शामिल थे. कृपलानी अमरोहा से उपचुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे थे और लोहिया
फर्रुखाबाद से.

लाल श्याम शाह लोकसभा का चुनाव जीत तो गए थे, मगर दिल्ली में वह सहज नहीं थे. उन्होंने लोकसभा का चुनाव जीतने के करीब पांच महीने बाद संसद के दूसरे सत्र के दौरान शपथ ली थी. यही वह दौर था, जब दंडकारण्य क्षेत्र में पूर्वी पाकिस्तान से आए बांग्ला शरणार्थियों को बसाने की योजना पर काम हो रहा था. यह योजना बहुत कारगर नहीं हुई थी, मगर वहां बांग्ला शरणार्थियों के आने का सिलसिला जारी था. दंडकारण्य प्राधिकरण का मुख्यालय बस्तर जिले से सटे ओडिशा के कोरापुट जिले में बनाया गया था. जगदलपुर में भी इसका एक कार्यालय बनाया गया था और इससे जुड़े अधिकारियों-कर्मचारियों के लिए एक आवासीय कालोनी भी बसाई गई थी. जिस परलकोट क्षेत्र के पखांजुर में बांग्ला शरणार्थियों को बसाया जा रहा था, वह चांदा संसदीय क्षेत्र से सटा हुआ था. लाल श्याम शाह इस बात से चिंतित थे कि उनके संसदीय क्षेत्र पर भी इसका असर पड़ सकता है. आखिरकार उन्होंने बांग्ला शरणार्थियों को उनके क्षेत्र में बसाने की योजना के विरोध में लोकसभा से ही इस्तीफा देने का फैसला कर लिया. इस तरह से इस्तीफा देना उनके लिए वैसे भी कोई नई बात नहीं थी. उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष सरदार हुकम सिंह को इस्तीफा भेजा, जिसे 24 अप्रैल, 1964 को मंजूर कर लिया गया. भारत के संसदीय इतिहास का यह अनूठा मामला है. रिकॉर्ड से पता चलता है कि निर्वाचित सदस्य के रूप में लाल श्याम सिर्फ एक दिन संसद गए. यह हैरत की बात है कि तीसरी लोकसभा के लिए निर्वाचित इस आदिवासी नेता के बारे में पूरा रिकॉर्ड भी संसद में उपलब्ध नहीं है. कई सरकारी रिकॉर्ड में तीसरी लोकसभा के लिए निर्वाचित सदस्यों में लाल श्याम शाह का जिक्र तक नहीं है. उनकी जगह चांदा संसदीय क्षेत्र से सांसद के रूप में अनेक जगह ताई जी एम (गोपिका मारोतराव) कन्नमवार का नाम दर्ज है. वास्तव में जीएम कन्नमवार ने लाल श्याम शाह के इस्तीफा देने के बाद चांदा संसदीय क्षेत्र के लिए उप चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में जीत दर्ज की थी. वह महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री मारोतराव कन्नमवार की पत्नी थीं.

लाल श्याम शाह के संक्षिप्त संसदीय जीवन से संबंधित रिकॉर्ड भले उपलब्ध नहीं है, मगर क्या वाकई उन्हें खुद इसकी परवाह होती? आज सियासत जिस तरह से बदल चुकी है, उसके पास शायद ही इस सवाल का जवाब हो!

(यश पब्लिकेशन्स द्वारा प्रकाशित सुदीप ठाकुर की किताब - 'लाल श्याम शाह- एक आदिवासी की कहानी' का एक अंश)
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Updated: June 16, 2018 09:57 AM ISTक्‍या आपको पता है माइग्रेन एक लाइफ-स्‍टाइल डिजीज है?
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