वो 5 किताबें जो 18 की उम्र से पहले तक लड़कियों को जरूर पढ़ लेनी चाहिए

ये किताबें तुम्हें हिम्मत देंगी, बतलाएंगी की समाज की जिस परिकल्पना को लेकर तुम चल रही हो वह कितनी विपरित है, कितनी क्रूर है. इन किताबों के सहारे तुम अपने अधिकारों और अस्तित्व की पहचान कर सकोगी, इसलिए इन किताबों को जल्द से जल्द अपने अगले जन्मदिन के पहले तक निपटा डालो

News18Hindi
Updated: July 15, 2019, 11:12 AM IST
वो 5 किताबें जो 18 की उम्र से पहले तक लड़कियों को जरूर पढ़ लेनी चाहिए
ये किताबें तुम्हें हिम्मत देंगी, बतलाएंगी की समाज की जिस परिकल्पना को लेकर तुम चल रही हो वह कितनी विपरित है, कितनी क्रूर है. इन किताबों के सहारे तुम अपने अधिकारों और अस्तित्व की पहचान कर सकोगी, इसलिए इन किताबों को जल्द से जल्द अपने अगले जन्मदिन के पहले तक निपटा डालो
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Updated: July 15, 2019, 11:12 AM IST
बधाई! कि तुम 18 साल की हो गई, या आने वाले कुछ सालों में हो जाओगी. तुममे से ज्यादातर लड़कियां अभी इंटर पास कर के गांव से शहर या शहर से महानगर आने के सपने संजो रही होंगी. वहीं कुछ की शादी तय हो गई होगी, तो कुछ प्रेमी के साथ भागने के लिए ही 18 साल के होने का इंतजार कर रही होंगी. उम्र की इस दहलीज पर तुम में कई शारीरिक से लेकर मानसिक बदलाव होंगे. तुम प्यार में पड़ोगी, धोखे खाओगी, प्रेमी के साथ पिता के हाथों पकड़ी जाओगी, किसी दूसरी जाति के लड़के से शादी करने की जिद्द पर घर से निकाल दी जाओगी या हो सके तो सबकुछ अच्छा-अच्छा ही हो. इन दोनों ही परिस्थितियों में ये किताबें तुम्हारी बखूबी मदद करेंगी. ये किताबें तुम्हें हिम्मत देंगी, बतलाएंगी की समाज की जिस परिकल्पना को लेकर तुम चल रही हो वह कितनी विपरित है, कितनी क्रूर है. इन किताबों के सहारे तुम अपने अधिकारों और अस्तित्व की पहचान कर सकोगी, इसलिए इन किताबों को जल्द से जल्द अपने अगले जन्मदिन के पहले तक निपटा डालो-

औरत के हक में



लेखिका- तस्लीमा नसरीन
प्रकाशक- वाणी प्रकाशन

मूल्य- 250,अमेजन पर उपलब्ध है

तस्लीमा नसरीन को कौन नहीं जानता? स्त्री के स्वाभिमान और हक की लड़ाई लड़ते हुए तस्लीमा का घर तो दूर उनका देश भी छूट गया. बांग्लादेश में जारी फतवे के बाद से वह कोलकाता में निर्वासित की जिंदगी जी रही हैं.

औरत के हक में- तस्लीमा नसरीन
औरत के हक में- तस्लीमा नसरीन

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उनके द्वारा लिखी गई किताब पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियों के अधिकारों के हनन और उनकी दुर्दशा का हू-ब-हू चित्रण करती है. लेखिका लिखती हैं कि इस देश में 'लड़की जात' होना सभी समस्याओं की मूल जड़ है. इस देश में 'लड़की जात' अपने अंदर तमाम खूबियां रखने के बावजूद 'मानव जाति' में शामिल नहीं हो सकती.

किताब का एक अंश

'मान लीजिए, मेरा मन चाह रहा हो कि मैं समुद्र स्नान का आनन्द लेना चाहूँ, सीताकुण्ड पहाड़ पर जाऊँ, बिहार के सालवन में जाऊँ, काप्तुई झील में स्पीड बोट लेकर सारा दिन घूमती रहूँ, पद्मा नदी में तैरती रहूँ, तो मुझे क्या करना होगा ? एक मर्द का जुगाड़ करना होगा !

बग़ैर पुरुष के लड़कियाँ दूर कहीं जा नहीं सकतीं, चाहे वे किसी उम्र की क्यों न हों ? बस में चढ़ने पर कण्डक्टर पूछता है, आपके साथ कोई आदमी नहीं है ? वे इस बात से निश्चित रहते हैं कि साथ में एक आदमी यानी मर्द ज़रूर ही होगा.'

नष्ट लड़की नष्ट गद्य

लेखिका- तस्लीमा नसरीन
प्रकाशक- वाणी प्रकाशन
मूल्य- 200,अमेजन पर उपलब्ध है

'औरत के हक में' की ही पूरक पुस्तक है 'नष्ट लड़की नष्ट गद्य'. नष्ट इसलिए क्योंकि यह शब्द पुरुषों के लिए नहीं, स्त्रियों के लिए प्रयोग होता है.

लेखिका ने पुस्तक में  कहा है, अंडा नष्ट होता है, दूध नष्ट होता है, नारियल नष्ट होता है और लड़की भी नष्ट होती है. किसी भी चीज़ की तरह हमारा समाज किसी लड़की को ‘नष्ट’ कहकर चिह्नित कर सकता है.

नष्ट लड़की नष्ट गद्य- तस्लीमा नसरीन
नष्ट लड़की नष्ट गद्य- तस्लीमा नसरीन


इस समाज में स्वयं को मैं ‘नष्ट’ कहना पसंद करती हूँ; क्योंकि यह सच है कि यदि कोई स्त्री अपने दुख, दैन्य, दुर्दशा को दूर करना चाहती है; धर्म, समाज और राष्ट्र के अभद्र नियमों के खिलाफ डटकर खड़ी होना चाहती है; हेय ठहराने वाली सभी प्रथाओं-व्यवस्थाओं का विरोध करके अपने अधिकारों के प्रति सजग होने लगती है तो समाज के ‘भद्र पुरुष’ उसे ‘नष्ट लड़की’ करार देते हैं. ठीक भी है, स्त्री के ‘मुक्त’ होने की पहली शर्त ही है-नष्ट होना है.‘नष्ट’ हुए बिना इस समाज के नागपाश से किसी भी स्त्री को मुक्ति नहीं मिल सकती. वही स्त्री सचमुच सुखी और प्रबुद्ध इंसान है, जिसे लोग ‘नष्ट अथवा बदनाम’ कहते है.

इज़ाडोरा डंकन की आत्मकथा- माय लाइफ

लेखिका- इज़ाडोरा डंकन
मूल्य- 981,अमेजन पर उपलब्ध है

इसाडोरा डंकन, माय लाइफ साभार- अमेजन
इसाडोरा डंकन, माय लाइफ
साभार- अमेजन


इज़ाडोरा अमेरिकी नर्तक थीं. उन्हें कई लोग आधुनिक नृत्य की जननी मानते हैं. उनकी लिखी यह आत्मकथा वैसी स्त्रियों की छाया दर्शाती है जिन्होंने अपनी जिंदगी कला को समर्पित कर दी. किताब कई सवाल खड़े करती है, जैसे- क्या कलाकार स्त्री एक सहज जिंदगी नहीं जी सकती ? इज़ाडोरा ने अपनी किताब के माध्यम से कला से जुड़ी स्त्रियों की जिंदगी में आने वाली समस्याओं की कई पर्ते खोल दीं, जिसकी तत्कालीन समय के आलोचकों और कट्टरपंतियों ने जमकर आलोचना की.

अगर आपकी रुचि डांस, आर्ट जैसी चीजों में है तो यह किताब जरूर पढ़ें.

ए रूम ऑफ वन्स ओन

लेखिका- वर्जिनिया वुल्फ
मूल्य-149, अमेजन पर उपलब्ध है

अ रूम ऑफ वन्स ओन- वर्जिनिया वुल्फ साभार- अमेजन
अ रूम ऑफ वन्स ओन- वर्जिनिया वुल्फ
साभार- अमेजन


यह कहना गलत नहीं होगा की आज के दौर में स्त्री विमर्श की बात वर्जिनिया वुल्फ के बिना पूरी नहीं हो सकती. इस
किताब की पूरी पृष्ठभूमि इसके ईर्द-गिर्द सिमटी है कि यदि एक महिला को उपन्यास लिखना है तो उसके पास पैसा और खुद का एक कमरा होना चाहिए. एक महिला के लिए उसका खुद का कमरा होना कितना ज़रूरी है. उसके विचारों को गति और लिखने की क्षमता को समृद्ध करने के लिए एक खुद का कमरा कितना महत्वपूर्ण हो सकता है.

लिहाफ

लेखिका- इस्मत चुगताई

प्रकाशन- राजकमल प्रकाशन

मूल्य- 421

अमेजन पर उपलब्ध है

लिहाफ- इस्मत चुगताई साभार- यूट्यूब
लिहाफ- इस्मत चुगताई
साभार- यूट्यूब


भारत से उर्दू की लेखिका को अपनी इस कहानी के लिए मुकदमा झेलना पड़ा था. बाद में माफी भी मांगने को कहा गया. कहानी में ऐसा क्या लिखा है यह तो आपको उसे पढ़ने के बाद ही पता चलेगा, लेकिन हम इतना कह सकते हैं कि उन्होंने इस किताब में महिलाओं के साथ होने वाली जेंडर भेद की कहानी सुनाई है. साथ ही किताब में इस्‍मत ने होमोसैक्‍शुएलिटी (दो लेस्बियन की प्रेम कहानी) पर भी बात की है. इस्मत चुगताई ने सालों पहले महिलाओं और होमोसेक्शुअल्स के सशक्तिकरण को लेकर इतनी बड़ी लकीर खींच दी,जो आज भी अपनी जगह कायम है. उनकी किताब 'लिहाफ' उनके द्वारा लिखी उनकी कई कहानियों का संग्रह है.
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