मलिक मुहम्‍मद ने क्‍या कहा था पद्मावती के बारे में

News18Hindi
Updated: November 14, 2017, 6:08 PM IST
मलिक मुहम्‍मद ने क्‍या कहा था पद्मावती के बारे में
पद्मावती इन दिनों चर्चाओं के केंद्र में है
News18Hindi
Updated: November 14, 2017, 6:08 PM IST
संजय लीला भंसाली की नई फिल्‍म पद्मावती इन दिनों विवादों और चर्चाओं मेें है. किसी को तकलीफ इस बात से है कि इस फिल्‍म से उनके समुदाय की भावनाएं आहत हो रही हैं तो किसी को यह फिक्र कि यह फिल्‍म इतिहास के साथ छेड़छाड़ है. इसमें ऐतिहासिक तथ्‍यों और घटनाओं को सही संदर्भों में पेश नहीं किया गया है.

सवाल हजार हैं और जवाब एक कि इन सवालों को जाने दीजिए. चलिए, इन विवादों से परे आज उस महान काव्‍यकृति के बारे में बात करते हैं, जिसने पद्मावती को अमर कर दिया. कहते हैं कि सन् 1500 के आसपास उत्‍तर प्रदेश के किसी जायस नामक स्‍थान पर मलिक मुहम्‍मद जायसी का जन्‍म हुआ था, जो आगे चलकर महान सूफी संत और हिन्दी साहित्य के भक्ति काल की निर्गुण धारा के कवि हुए. जन्‍म की तारीख को लेकर कई मत हैं. उन्‍हीं की लिखी ऐतिहासिक काव्‍यकृति है पद्मावत. अवधी भाषा में लिखी गई यह रचना दोहों और चौपाइयों के रूप में है.

मूलत: पद्मावत की कथा नायक रतनसेन और उसकी पत्‍नी पद्मावती की कहानी है. रतनसेन चित्‍तौड़गढ़ का राजा है. उसकी पत्‍नी पद्मावती के सौंदर्य की ख्‍याति दूर-दूर तक फैली है. पद्मावती के सौंदर्य की प्रशंसा सुनकर तत्कालीन सम्राट अलाउद्दीन खिलजी उसे पाने के लिए चित्तौड़ पर आक्रमण करता है. भयानक युद्ध के बाद हालांकि खिलजी की विजय होती है, लेकिन वह पद्मावती को हासिल नहीं कर पाता क्‍योंकि वह महल की अन्‍य स्त्रियों के साथ जौहर कर लेती है.




A post shared by Ranveer Singh (@ranveersingh) on






यह तो हुई संक्षेप में पद्मावती की कहानी. लेकिन इस कृति के विभिन्‍न खंडों में पद्मावती के सौंदर्य का अनूठा वर्णन है. जब हीरामन तोता राजा रतनसेन को पद्मावती के सौंदर्य के बारे में बताता है. राजा रतनसेन के दरबार से निकाला गया राघव नाम का तांत्रिक अलाउद्दीन की सेवा में चला जाता है और उससे पद्मावती के सौंदर्य की प्रशंसा करता है.

बादशाह अलाउद्दीन खिलजी की इस पर पागलपन जैसी प्रतिक्रिया होती है. राघव के मुख से रानी के सौंदर्य के बारे में सुनकर खिलजी मूर्छित हो जाता है. जायसी लिखते हैं-

जौ राघव धनि बरनि सुनाई । सुना साह, गइ मुरछा आई ॥

जनु मूरति वह परगट भई । दरस देखाइ माहिं छपि गई ॥

जो जो मंदिर पदमिनि लेखी । सुना जौ कँवल कुमुद अस देखी ॥

होइ मालति धनि चित्त पईठी । और पुहुप कोउ आव न दीठी ॥

मन होइ भँवर भएउ बैरागा । कँवल छाँडि चित और न लागा ॥

चाँद के रंग सुरुज जस राता । और नखत सो पूछ न बाता ॥

तब कह अलाउदीं जग-सूरू । लेउँ नारि चितउर कै चूरू ॥

जौ वह पदमिनि मानसर, अलि न मलिन होइ जात ।

चितउर महँ जो पदमिनी फेरि उहै कहु बात ॥20॥

इसके बाद जायसी लिखते हैं कि कैसे खिलजी किसी भी तरह पद्मावती की एक झलक भर पाने को बेचैन है-

बादसाह दिल्ली कर कित चितउर महँ आव ।

देखि लेहु पदमावति ! जेहि न रहै पछिताव ॥

तांत्रिक राघव कुछ इस अंदाज में बादशाह खिलजी से पद्मावती के सौंदर्य का वर्णन करता है-

राघव सुनत सीस भुइ धरा । जुग जुग राज भानु कै करा ॥

उहै कला, वह रूप बिसरखी । निसचै तुम्ह पदमावति देखी ॥

केहरि लंक, कुँभस्थल हिया । गीउ मयूर, अलक बेधिया ॥

कँवल बदन औ बास सरीरू । खंजन नयन, नासिका कीरू ॥

भौंह धनुक, ससि-दुइज लिलाट्ठ । सब रानिन्ह ऊपर ओहि पाटू ॥

सोई मिरिग देखाइ जो गएऊ । वेनी नाग, दिया चित भएऊ ॥

दरपन महँ देखी परछाहीं । सो मूरति, भीतर जिउ नाहीं ॥

सबै सिंगार-बनी धनि, अब सोई मति कीज ।

अलक जो लटकै अधर पर सो गहि कै रस लीज ॥

प्रेम, विरह, त्‍याग और बलिदान की इस अद्भुत काव्‍यकृति मे कितना इतिहास है और कितनी कल्‍पना, पता नहीं, लेकिन इससे पढ़ने का सुख असीम है. बेहतर होता कि इसे लेकर विवादों का पहाड़ खड़ा कर रहे लोग कुछ पल मलिक मुहम्‍मद जायसी की पद्मावती के साथ बिताते.


First published: November 14, 2017
पूरी ख़बर पढ़ें
अगली ख़बर