स्मृति शेषः हिंदी में भोजपुरी के कवि थे केदारनाथ

निश्चित तौर पर नागार्जुन के जाने बाद आधुनिक हिंदी के सबसे लोकप्रिय कवि केदारनाथ का जाना कभी न भरने वाली क्षति है. इस क्षति से उपजे दर्द को अगर कोई कम कर सकता है तो वो उनकी कविताएं ही हैं.

Lalit Fulara | News18Hindi
Updated: March 21, 2018, 5:57 PM IST
स्मृति शेषः हिंदी में भोजपुरी के कवि थे केदारनाथ
हिंदी में भोजपुरी के कवि थे केदारनाथ
Lalit Fulara | News18Hindi
Updated: March 21, 2018, 5:57 PM IST
कवि दुनिया को अलविदा कहकर चला जाता है पर कविता उसे अमर कर देती है. यह कविता ही है जो कवि के जाने के बाद के सन्नाटे और दिलों में खिंचे शून्य को भरती है. यानी कविता हर दौर में कवि को जिंदा रखती है. निश्चित तौर पर नागार्जुन के जाने बाद आधुनिक हिंदी के सबसे लोकप्रिय कवि केदारनाथ सिंह का जाना कभी न भरने वाली क्षति है. इस क्षति से उपजे दर्द को अगर कोई कम कर सकता है तो वो उनकी कविताएं ही हैं. 1982 में लिखी केदारनाथ की कविता शहर में रात में जिस संघर्ष और कभी न खत्म होने वाली इच्छाओं का खाका खिंचा है, वो आज भी वैसा ही है. चाहे शहर का कायापलट क्यों न हो गया हो लेकिन आजीविका के स्तर और जिंदगी की जद्दोजहद में क्या कोई बदलाव आया है? आज भी बिजली के चमकने और पानी के बरसने का डर क्या जीने के सारे धागों को उलझा कर नहीं रख देता है?

बिजली चमकी, पानी गिरने का डर है
वे क्यों भागे जाते हैं जिनके घर है
वे क्यों चुप हैं जिनको आती है भाषा

वह क्या है जो दिखता है धुँआ-धुआँ-सा
वह क्या है हरा-हरा-सा जिसके आगे


हैं उलझ गए जीने के सारे धागे
Loading...

यह शहर कि जिसमें रहती है इच्छाएँ
कुत्ते भुनगे आदमी गिलहरी गाएँ
यह शहर कि जिसकी ज़िद है सीधी-सादी
ज्यादा-से-ज्यादा सुख सुविधा आज़ादी
तुम कभी देखना इसे सुलगते क्षण में
यह अलग-अलग दिखता है हर दर्पण में
साथियों, रात आई, अब मैं जाता हूँ
इस आने-जाने का वेतन पाता हूँ
जब आँख लगे तो सुनना धीरे-धीरे
किस तरह रात-भर बजती हैं ज़ंजीरें

क्या ये जो शहर है या कोई भी शहर है, कभी किसी दर्पण में एक-सा दिखता है. यहां जितने लोग उतने दर्पण नहीं हैं. और क्या हर दर्पण ने अलग परिभाषा नहीं गढ़ी है. हां यह सवाल जरूर हो सकता है, जब यहां जीवित सांसों पर खुद के लिए ही वक्त नहीं है तो शहर की तबीयत का हाल क्या जाने? भाषा के जानकार क्या इस वक्त में चुप्पी साधे नहीं बैठे हैं? छात्रों के सुलगते सवालों पर कई कलमे मौन नहीं हैं. कवि मंगलेश डबराल केदारनाथ को याद करते हुए लिखते हैं कि केदार जी की सबसे बड़ी खासियत यही थी कि वे अनुभव को बेहद आत्मीय ढंग से पेश करते रहे. उनमें कोई ओढ़ी विद्धता नहीं थी. वे हमेशा देहाती, गांव के आदमी बने रहे. उनका मूल स्वभाव भी यही था.

यह सवाल जरूर हो सकता है, जब यहां जीवित सांसों पर खुद के लिए ही वक्त नहीं है तो शहर की तबीयत का हाल क्या जाने?


केदारनाथ सिंह का यही मूल स्वभाव उनकी इस कविता में उभरा होगा.
जब ट्रेन चढ़ता हूँ 
तो विज्ञान को धन्यवाद देता हूँ
वैज्ञानिक को भी 

जब उतरता हूँ वायुयान से 
तो ढेरों धन्यवाद देता हूँ विज्ञान को 
और थोड़ा सा ईश्वर को भी 

पर जब बिस्तर पर जाता हूँ 
और रोशनी में नहीं आती नींद 
तो बत्ती बुझाता हूँ 
और सो जाता हूँ 
विज्ञान के अंधेरे में 
अच्छी नींद आती है.

इन लाइनों को पढ़ते हुए मुझे अपनी एक नास्तिक मित्र और कवियत्री की याद बरबस आ उठती है, जो कहती हैं कि उन्हें ईश्वर का ख्याल तभी आता है, जब वो  बस में बैठी हों और तेज पहाड़ी घुमावदार मोड़ सामने हो. क्या हम सभी इसी तरह के द्वंद में नहीं जी रहे. जिसने हमें न ही पूर्ण आस्तिक और न ही पूर्ण नास्तिक बनने दिया. क्या हमारा स्वभाव ही अंधकार में अच्छी नींद और उजाले में उस रौशनी को खारिज करने वाला नहीं हो गया है.

क्या हमारा स्वभाव ही अंधकार में अच्छी नींद और उजाले में उस रौशनी को खारिज करने वाला नहीं हो गया है.


मैं तो कविताओं को आस्तिकता का सबसे बड़ा जरिया मानता हूं. वो इस घोर अवसरवादी और खौफनाक युग में लिखित शब्दों के प्रति हमारी आस्था को व्यक्त करती हैं. नहीं तो मैंने यहां नास्तिकता पर घनघोर लेक्चर देने वालों को अंधेरे में अकेले सूसू करने से भी कतराते हुए देखा है. कम से कम व्यक्ति की तरह यहां लिखित शब्द तो अभी नहीं बदल रहे. जिस दिन ये होने लग जाएगा, उस दिन कविताओं पर से मेरा भरोसा उठ जाएगा. तब तक कविता मेरे लिए विज्ञान और ईश्वर दोनों का सिम्‍मश्रण है क्योंकि हमारे सारे पूजनीय आदिग्रंथ कविता की ही देन हैं और सुंदरकांड सबमें सबसे लालित्यपूर्ण काव्य. इसलिए कवि हमारे लिए पूजनीय और कविता जीवन का सार है.

आज घर में घुसा
तो वहाँ अजब दृश्य था
सुनिए मेरे बिस्तर ने कहा
यह रहा मेरा इस्तीफ़ा
मैं अपने कपास के भीतर
वापस जाना चाहता हूँ

उधर कुर्सी और मेज़ का
एक संयुक्त मोर्चा था
दोनों तड़पकर बोले
जी, अब बहुत हो चुका
आपको सहते-सहते
हमें बेतरह याद आ रहे हैं
हमारे पेड़
और उनके भीतर का वह
ज़िन्दा द्रव
जिसकी हत्या कर दी है
आपने

उधर आलमारी में बन्द
क़िताबें चिल्ला रही थीं
खोल दो, हमें खोल दो
हम जाना चाहती हैं अपने
बाँस के जंगल
और मिलना चाहती हैं
अपने बिच्छुओं के डंक
और साँपों के चुम्बन से

पर सबसे अधिक नाराज़ थी
वह शॉल
जिसे अभी कुछ दिन पहले कुल्लू से ख़रीद लाया था
बोली साहब!
आप तो बड़े साहब निकले
मेरा दुम्बा भेड़ा मुझे कब से
पुकार रहा है
और आप हैं कि अपनी देह
की क़ैद में
लपेटे हुए हैं मुझे

उधर टी० वी० और फ़ोन का
बुरा हाल था
ज़ोर-ज़ोर से कुछ कह रहे थे
वे
पर उनकी भाषा
मेरी समझ से परे थी
कि तभी
नल से टपकता पानी तड़पा
अब तो हद हो गई साहब!
अगर सुन सकें तो सुन
लीजिए
इन बूँदों की आवाज़
कि अब हम
यानी आपके सारे के सारे
क़ैदी
आदमी की जेल से
मुक्त होना चाहते हैं

अब जा कहाँ रहे हैं
मेरा दरवाज़ा कड़का
जब मैं बाहर निकल रहा था।

केदारनाथ जी की इस कविता में चमचमाते शहरों का तनाव साफ दिखता है. और ऐसा कतई नहीं है कि यह तनाव अब नहीं है और न आगे रहेगा.  गांव-देहातों से रोजी-रोजगार की तलाश में शहर आए और यहां के छोटे से कमरों में सिमटकर रह गई जिंदगियों में मैंने भी इस तनाव को महसूस किया है और अपने आसपास इससे छटपटाते हुए लोगों को देखा है. इसलिए मुझे लगता है कि शहर आपकी संवेदनाओं को मार देता है. जहां प्रकृति आपके व्यवहार में सरलता और सहजता लाती है, वहीं शहर उसको असहज और आपको कठोर बना देता है. तो शहर संवेदनाओं के लिए छटकने वाला पिंजरा है, जो इंसान को अपने में कैद कर लेता है, जकड़ लेता है और जब मोह टूटता है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है. तब न ही बांस का जंगल दिखता है और न ही बुरांश.

शहर संवेदनाओं के लिए छटकने वाला पिंजरा है, जो इंसान को अपने में कैद कर लेता है, जकड़ लेता है और जब मोह टूटता है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है.


इसी तरह एक रोज मैं भी नींद में उस वक्त छटपटा उठा, जब एक कोयल ने मेरी खिड़की पर आकर मुझसे पूछा था, तूने क्या देखा? जब नींद खुली तो देखा, न ही कोई खिड़की थी, न ही पेड़ और न ही कोयल. बाहर बस मजदूरों की चीत्कार, मशीनों की हाहाकार सुनाई दे रही थी और मैंने चिल्लाकर कहा- ये सीखा, ये सीखा।

जाऊंगा कहाँ 
रहूँगा यहीं 

किसी किवाड़ पर 
हाथ के निशान की तरह 
पड़ा रहूँगा

किसी पुराने ताखे
या सन्दूक की गंध में 
छिपा रहूँगा मैं

दबा रहूँगा किसी रजिस्टर में 
अपने स्थायी पते के 
अक्षरों के नीचे 

या बन सका 
तो ऊंची ढलानों पर 
नमक ढोते खच्चरों की 
घंटी बन जाऊंगा 
या फिर माँझी के पुल की
कोई कील 

जाऊंगा कहाँ 

देखना 
रहेगा सब जस का तस
सिर्फ मेरी दिनचर्या बदल जाएगी 
साँझ को जब लौटेंगे पक्षी 
लौट आऊँगा मैं भी 
सुबह जब उड़ेंगे 
उड़ जाऊंगा उनके संग...

क्या कवि के अलावा कोई ऐसी कल्पना कर सकता है? वैसे भी शास्त्रों में तीनों लोकों की ही कल्पना है और इसमें से सबसे सुंदर भूलोक ही है. और फिर केदारनाथ जी शरीर न सही,  स्मृति और बिंब रूप में तो हमारे सामने रहेंगे ही और आने वाली पीढ़ी के सामने भी रहेंगे. किसी आत्मीय बुजुर्ग काया के जाना का दर्द क्या होता है, यह मैंने मैनेजर पांडेय को सुनते हुए महसूस किया. जितना जोर वे केदारनाथ सिंह को याद करते हुए अपने शब्दों पर लगा रहे थे, शायद उतना ही अपने आंसुओं को छिपाने में, लेकिन आंसू थे कि आंखों से बरसकर झुर्राये चेहरे पर आने से बिल्कुल भी नहीं कतरा रहे  थे. मैनेजर पांडेय ने रुंधे गले से केदारनाथ को याद करते कहा कि तारसप्तक का तार टूट गया है. ज़मीन और जड़ से जुड़ा कवि हमें छोड़कर चले गया है. उन्होंने केदारनाथ को हिंदी में भोजपुरी का कवि बताया. उन्होंने कहा कि केदारनाथ की कविताओं में हिंदी कविता में भोजपुरी की आवाज सुनाई देगी. वो जनतांत्रिक कवि थे. सही मायने में यह जनतांत्रिक कवि ही लोक संवेदनाओं का कवि था. ग्रामीण परिवेश का कवि. शहरों में बिलाते गांवों का कवि.

धान उगेंगे या प्राण उगेंगे
उगेंगे हमारे खेत में 
आना जी बादल जरूर
Loading...

और भी देखें

पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...