मैं फेमिनिस्ट हूं और मुझे अच्छा लगता है कि पुरुष मेरी रक्षा करे

अच्छे लड़के लड़कियों को प्रोटेक्ट करते हैं. सिर्फ अच्छे लड़के ही लड़कियों को प्रोटेक्ट करते हैं. लड़कियों को अच्छा लगता है, जब अच्छे लड़के उन्हें प्रोटेक्ट करते हैं. अच्छे लड़कों को अच्छा लगता है, जब वो लड़कियों को प्रोटेक्ट करते हैं.

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: August 15, 2019, 12:34 PM IST
मैं फेमिनिस्ट हूं और मुझे अच्छा लगता है कि पुरुष मेरी रक्षा करे
अच्छे लड़के लड़कियों को प्रोटेक्ट करते हैं. सिर्फ अच्छे लड़के ही लड़कियों को प्रोटेक्ट करते हैं. लड़कियों को अच्छा लगता है, जब अच्छे लड़के उन्हें प्रोटेक्ट करते हैं. अच्छे लड़कों को अच्छा लगता है, जब वो लड़कियों को प्रोटेक्ट करते हैं.
Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: August 15, 2019, 12:34 PM IST
तो आप ये नहीं मानते कि आज जो रक्षा बंधन है, वो बहन की रक्षा करने का त्योहार है. भाई की लंबी उमर की कामना और बदले में बहन को प्रोटेक्ट करने का वादा. जैसाकि हम होश संभालने के बाद से तब तक सुनते और मानते आए, जब तक हमारी जिंदगियों में फेमिनिज्म नहीं आ गया. फेमिनिस्ट थियरी कहती थी कि जिसे रक्षा की जिम्मेदारी सौंपी, उसे श्रेष्ठ मान लिया गया. लड़का श्रेष्ठ है, लड़का रक्षा करेगा, लड़का प्रोटेक्शन देगा, लड़का केयर करेगा. बदले में लड़का राज करेगा. बहन को ये मंजूर नहीं. वो भाई के बराबर है और उसे अपनी रक्षा करवाने में कोई इंटरेस्ट नहीं. ठीक? अब तो लगभग हर आधुनिक ख्याल लड़के और लड़की का मानना है कि लड़की अपनी रक्षा खुद कर सकती है.

मैं ठीक कह रही हूं न? यही है आधुनिक सोच. बराबरी की सोच, फेमिनिस्ट सोच, अच्छी सोच.
बढ़िया.

लेकिन अब इसे भूल जाइए क्योंकि ये सच नहीं है.

सच ये है कि मैं फेमिनिस्ट हूं और मुझे अच्छा लगता है कि मेरा भाई मेरी रक्षा करे. सिर्फ भाई ही नहीं, मेरे आसपास जो भी पुरुष हैं, जिस भी रिश्ते में और बिना रिश्ते के, मैं चाहती हूं कि वो सब मेरी रक्षा करें, मुझे प्रोटेक्ट करें. मुझे बहुत बुरा लगता है, जब कोई मर्द मुझे फेमिनिस्ट होने का ताना देते हुए कहता है कि “तुम फेमिनिस्ट तो मर्दों के बराबर हो न. अपनी रक्षा खुद कर सकती हो.” ऐसा कहकर वो फेमिनिस्ट होने के मेरे चुनाव के लिए मुझे शर्मिंदा करना चाहता है. वो कह रहा है कि या तो प्रोटेक्शन मिलेगा या बराबरी. या तो पितृसत्ता की सुविधाएं ले लो या फिर आजादी. कोई एक चीज चुन लो. मुमकिन है, फेमिनिज्म भी इससे सहमति जताए.

लेकिन क्या हो, अगर मैं कहूं कि लड़कों का लड़कियों को प्रोटेक्ट करना सिर्फ पितृसत्ता का प्रिवेलेज नहीं है. बराबरी के रिश्तों में, बेहतर समाजों में, लड़का-लड़की में दो आंख न करने वाली दुनिया में भी ये होगा और ये होता है कि लड़के लड़कियों को प्रोटेक्ट करते हैं. अच्छे लड़के लड़कियों को प्रोटेक्ट करते हैं. सिर्फ अच्छे लड़के ही लड़कियों को प्रोटेक्ट करते हैं. लड़कियों को अच्छा लगता है, जब अच्छे लड़के उन्हें प्रोटेक्ट करते हैं. अच्छे लड़कों को अच्छा लगता है, जब वो लड़कियों को प्रोटेक्ट करते हैं. उन्हें इसलिए अच्छा नहीं लगता कि इस एक्ट से उनके अहम का गुब्बारा फूलकर कुप्पा हो गया है. क्योंकि सच तो ये है कि ऐसा करके सबसे ज्यादा अच्छा उन्हीं लड़कों को लगता है, जिनमें लड़का होने का अहंकार बिलकुल नहीं है. जो मर्द होने के ख्याल भर से ऐंठे नहीं रहते. न इस बात से अभिभूत रहते हैं कि लड़की के मुकाबले वो ज्यादा लहीम-शहीम हैं, उनकी हड्डियों में ज्यादा बल है, मांसपेशियों में ज्यादा ताकत है, कलाई ज्यादा मजबूत है और बकौल फ्रायड जो अपनी खास शारीरिक संरचना के कारण दूसरे जेंडर के मुकाबले अपनी सेक्सुएलिटी को लेकर ज्यादा आत्मविश्वास से भरे हैं.


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वो लड़कियों की रक्षा इसलिए नहीं करते कि वो उन्हें खुद से कमतर मानते हैं. या लड़कियों को प्रोटेक्टेड महसूस करना इसलिए नहीं अच्छा लगता कि वो खुद को लड़कों से कमतर मानती हैं. दोनों जो करते हैं, उन्हें वो करना इसलिए अच्छा लगता है क्योंकि प्रकृति ने उन्हें ऐसा बनाया है. रचते हुए प्रकृति को कहां पता होगा कि मर्दों की मांसपेशियों का बल अहंकार और सत्ता में बदल जाएगा और औरतों की आत्मा का बल उनकी गुलामी में. हम सदियों तक इतनी गुलाम रहीं कि अब उस गुलामी को तोड़ने का और कोई तरीका समझ नहीं आता, सिवा इसके कि हम सैकड़ों तरीकों से सैकड़ों बार ये दोहराएं कि हम बराबर हैं, हम लड़कों से कम नहीं, कि हम अपनी रक्षा खुद कर सकती हैं.

बेशक, करती ही हैं. कर ही रही होती हैं हर उस वक्त में, जब आसपास कोई मर्द नहीं होता. लेकिन सच तो ये है कि लड़कियां भीतर से बेहतर महसूस करती हैं, जब आसपास कोई मर्द होता है. हमें कम डर लगता है, ज्यादा सुकून लगता है. हमारे दिमाग की नसें कम तनी होती हैं, ह़दय अपनी गति सामान्य कर लेता है और दिमाग को ज्यादा खून पहुंचाना बंद कर देता है. क्योंकि दिमाग ने अब खुद को बचाने की स्ट्रेटजी बनाना बंद कर दिया है और सुस्ताने के मूड में है.

बाहर की दुनिया में, अंधेरे में, एकांत में पुरुष का हाथ पकड़कर हम लड़कियां ज्यादा सुरक्षित महसूस करती हैं. हां, बेशक इसीलिए कि बाहर की दुनिया में खतरा है और हमें लगता है कि एक लड़का उन खतरों का मुकाबला कर सकने में हमसे ज्यादा सक्षम है. ये भी कि खतरा दूसरे पुरुषों से है. और एक पुरुष दूसरे पुरुष से इतनी जल्दी नहीं उलझता, जितना किसी अकेली लड़की से उलझ सकता है.



फिर तो इसका मतलब ये हुआ कि सुरक्षा के इस सारे आइडिया की वजह मर्दों की ताकत से ज्यादा मर्दों की बेलगाम सत्ता में है. लड़कियों को सुरक्षित महसूस करने के लिए लड़कों की जरूरत ही न पड़ती, अगर पुरुष ऐसे खूंखार न होते जैसेकि वो हैं. ये बात बिलकुल सही है, लेकिन थोड़ी यूटोपियन है. दुनिया में कभी कोई ऐसा वक्त न था, न होगा कि जब बुरे मर्द या यूं कहें कि बुरे इंसान धरती से खत्म हो जाएंगे. स्थिति बेहतर हो सकती है, परफेक्ट नहीं. ऐसी दुनिया बनाने का सपना फिलहाल तो फेमिनिस्ट यूटोपिया ही है, जैसेकि कम्युनिज्म.

और हो भी जाए तो भी लड़कियों को अच्छा लगेगा उन्हें प्रोटेक्ट किया जाना और लड़कों को अच्छा लगेगा प्रोटेक्ट करना. ये आर्गेनिक है.

आज मैं एक सच कहती हूं. सच ये है कि हर बार जब मैं ये कहती हूं कि मैं अपनी रक्षा खुद कर सकती हूं, मैं झूठ बोल रही होती हूं. मैं ताकत के, बराबरी के किसी झूठे आवरण में खुद को छिपा रही होती हूं. क्योंकि सच तो ये है कि रात बारह बजे अगर मेरा भाई ये कहता है कि “मैं तुम्हें लेने आ रहा हूं,” तो मुझे सिर्फ अच्छा नहीं, बहुत सुकून सा लगता है. जबकि मैं सालों से आधी रात को भी स्टेशन और एयरपोर्ट अकेले ही जाती रही हूं. जब सड़क पार करते हुए कोई दोस्त अचानक हाथ पकड़ ले, आपके बिना कहे, बिना चाहे, बिना ऐसी किसी अपेक्षा के तो अच्छा लगता है. उसका आपके प्रति ये थोड़ा सा जिम्मेदार महसूस करना. किसी का फिक्र में बार-बार ये पूछना कि “तुम पहुंच गई.” रात 12 बजे दरवाजे पर दस्तक हो और मैं अपनी आदत के मुताबिक दरवाजा खोलने को होऊं और भाई बढ़कर कहे, “दीदी, तुम रुको, मैं देखता हूं.” वो भाई जो आपसे उम्र में 12 साल छोटा है, जिसकी आपने बचपन में सूसू-पॉटी साफ की है, लेकिन अब वो देह और बल में आपसे दुगुना है. आप उसके कंधे तक भी नहीं पहुंचतीं. वो कभी आप पर अधिकार नहीं जमाता, न खुद को श्रेष्ठ मानता है. कभी नहीं पूछता, “कहां गई, कहां आई, क्या किया, कौन है, कौन नहीं है.” लेकिन कहीं से लौटने में रात के एक बज जाएं तो फोन करके बस इतना ही कहता है, “दीदी मैं आ जाऊं लेने.” ऐसे हर मौके पर आप ज्यादा सुरक्षित, ज्यादा सुकून महसूस करती हैं. आपको थोड़ा कम डर लगता है. थोड़ा ज्यादा अच्छा लगता है.

बहुत बार लड़कियां ये ठीक से न समझ पाती हैं, न समझा कि उन्हें इतना असुरक्षित क्यों महसूस होता है. या ठीक-ठीक किस बात का डर लगता है. क्या वजह है, जो दिमाग की हर नस हर वक्त तनाव में खिंची-खिंची सी रहती है. और ऐसा सिर्फ डरपोक लड़कियों को नहीं लगता, एकदम आजाद, बहादुर, आत्मनिर्भर और अपनी रक्षा खुद करती दिख रही लड़कियों को भी ऐसा लगता है कि ज्यादातर वक्त उन्हें एक अजीब सा डर लगता है. और ये डर सड़क पर मिले किसी अजनबी मर्द की भी सदाशयता, सहयोग, आदर और जिम्मेदारी भरी एक नजर से भी थोड़ा कम हो सकता है.



लेकिन वो क्या चीज है, जो बरसों से कोढ़ में खाज बनी हुई है. जिसने औरत और मर्द के बीच रक्षा और दायित्व के इस खूबसूरत रिश्ते का गोबर करके रख दिया है. इस सवाल का जवाब इस कहानी में है.

साल 1998, मुंबई हाईकोर्ट. मेरी मौसी का लड़का मुंबई हाईकोर्ट में वकील था और मेरे दिल में अरमान ये देखने का कि सचमुच की अदालतें, जज की कुर्सी और लकड़ी का हथौड़ा क्या वैसा ही होता है, जैसा फिल्मों में दिखता है. भाई मुझे मुंबई हाईकोर्ट घुमाने के लिए तैयार हो गया. अगले दिन मैं उससे पहले ही जाने के लिए तैयार बैठी थी. मेरा कोई सगा भाई नहीं है तो सच पूछो तो अब तक मुझे इस बात का कोई आइडिया ही नहीं था कि भाई नाम के जीव के साथ, और खासतौर पर अगर वो उम्र में बड़ा हो तो बाहर जाना कैसा होता है. घर से निकलते ही उसका हाल ऐसा हो गया, जैसे वो कोई 18 साल की लड़की नहीं, बल्कि घर से कोहिनूर लेकर निकला हो कि मौका पाते ही कोई छीनकर ले जाएगा. स्टेशन पर, ट्रेन में, बस में, चर्चगेट की भीड़ में, हर जगह उसका हाथ मुझे ऐसे घेरे था कि गलती से भी किसी पराए मर्द की देह मेरी देह से न छू जाए. यहां तक कि मुंबई हाईकोर्ट के उस गलियारे में भी, जहां वकील, मुवक्किल, लाजिम, मुलाजिम सब ऐसी जल्दबाजी में भागे जाते थे कि किसी के पास किसी को एक नजर उठाकर देखने तक की फुरसत नहीं थी. उस गलियारे में चलते हुए किसी का किसी से हल्के से छू जाना बहुत सामान्य बात थी. मैं लड़की थी और लड़कियां हर स्पर्श की नीयत को बखूबी पहचानती हैं. मैं पूरे दावे के साथ कह सकती हूं कि हाईकोर्ट के उस गलियारे में कोई आदमी इस फिराक में नहीं था कि किसी लड़की को टकराने के बहाने छू ले. लेकिन मेरे भाई की बांहें कृष्ण के सुदर्शन चक्र की तरह मुझे घेरे हुए थीं.

उस दिन वो जो कर रहा था, वो मेरी रक्षा नहीं थी. वो इज्जत बचा रहा था, मेरी नहीं, अपनी. उसकी बहन उसकी और उसके घर की इज्जत थी. ये वही भाई था, जो भाभी को धीरे से इशारे से कहता कि उसकी ब्रा की स्ट्रिप दिख रही है और भाभी घबराकर अपना कपड़ा ठीक करने लगतीं. ये वही भाई था, जिसकी खुद कॉलेज में 20 दोस्त थीं, लेकिन बहन के लिए घर पर लड़के का फोन आ गया तो उस लड़के के घर तक धमकाने पहुंच गया. ये वही भाई था, जिसके दोस्तों के आने पर बहन अंदर वाले कमरे में चुहिया की तरह दुबक जाती थी. ये वो भाई था, जो अपनी बहन को संदूक में बंद करके रखता और दूसरे की बहनों को माल समझता.

तो उस दिन मेरा भाई जो कर रहा था, वो न दायित्वबोध था, न करुणा, न प्रेम, न लगाव, न ये ख्याल कि बहन को कोई तकलीफ न हो. वो पांडेय खानदान की इज्जत की रक्षा कर रहा था, इज्जत जो मेरी देह में थी. जिसकी रक्षा का घमंड उसकी मांसपेशियों के बल और मर्दानगी के एहसास में था. शुक्र है, मैं उसकी सगी बहन नहीं, सिर्फ मौसी की बेटी थी. एक ही दिन में मेरा भाइयों से रक्षा करवाने का सारा भूत उतर गया.

और एक वो बिना कोई अधिकार जमाये सिर्फ ख्याल और प्रोटेक्ट करने वाला 12 साल छोटा भाई है. अंग्रेजी में पूछता है, “दीदी, सबसे रोमांटिक डेट का तुम्हारा आइडिया क्या है?”  मैं कहती हूं, “समंदर के किनारे, आधी रात, तारों के नीचे हम दोनों अकेले हों और वो मेरे लिए कोई प्रेम कविता पढ़ रहा हो.” अचानक वो ऐसी तरस खाती नजरों से मुझे देखेगा, जैसे उसका फेवरेट पिज्जा तवे पर जलकर कालिख हो गया हो और बोलेगा, “दीदी, गिव मी ए ब्रेक. यू आर सो बोरिंग.”

लेकिन मुझे अच्छा लगता है ये ख्याल कि वो मेरा ख्याल करता है, मर्द की तरह. रात 12 बजे कोई दरवाजा खटखटाए तो कहता है, “दीदी, मैं देखता हूं.”

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First published: August 15, 2019, 12:12 PM IST
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