शहीद ऊधम सिंह, जिन्होंने कुछ इस तरह लिया था जालियांवाला कांड का बदला!

13 अप्रैल के बाद से ही ऊधम बदले की आग में झुलस रहे थे. उन्होंने अपने बाकी क्रांतिकारी साथियों के साथ मिलकर जनरल डायर को मारने का पूरा प्लान बनाया और करीब 21 साल की तपस्या के बाद इसमें कामयाब हुएं

Prerana Kumari | News18Hindi
Updated: August 3, 2019, 4:09 PM IST
शहीद ऊधम सिंह, जिन्होंने कुछ इस तरह लिया था जालियांवाला कांड का बदला!
13 अप्रैल के बाद से ही ऊधम बदले की आग में झुलस रहे थे. उन्होंने अपने बाकी क्रांतिकारी साथियों के साथ मिलकर जनरल डायर को मारने का पूरा प्लान बनाया और करीब 21 साल की तपस्या के बाद इसमें कामयाब हुएं
Prerana Kumari | News18Hindi
Updated: August 3, 2019, 4:09 PM IST
13 अप्रैल सन् 1919, इतिहास की किताब में यह तारीख एक अलग चैप्टर 'दी जलियांवालाबाग मैसेकर' के नाम से दर्ज है. साल 1919 का बैसाखी, जब जलियांवाला बाग में रौलेट एक्ट के विरोध में एक शांतिपूर्ण सभा के लिए जमा हुए हजारों भारतीयों पर अंग्रेज हुक्मरान ने अंधाधुंध गोलियां बरसाई थीं. 10 मिनट में कुल 1650 राउंड गोलियां चलाई गईं. अनाधिकारिक आँकड़ों के अनुसार 1000 से अधिक लोग मारे गए और 2000 से अधिक घायल हुए. यह सबकुछ जनरल डायर नामक एक अंग्रेज ऑफिसर के कहने पर हुआ. उस वक्त पंजाब के गवर्नर माइकल ओ'डायर थे.

इस पूरे हत्याकांड के दौरान एक लाचार शख्स वहीं मौजूद था. उसे भी गोली लगी थी. लेकिन वह कुछ कर नहीं सकता था. इस घटना ने उसे हिलाकर रख दिया. उसने वहीं कसम खाई कि वह इसका बदला लेकर रहेगा. ये कसम खाने वाले क्रांतिकारी, शहीद, स्वतंत्रता सेनानी कोई और नहीं 'ऊधम सिंह' थे.

जब अनाथ ऊधम ने देश को ही मान लिया अपना सबकुछ 

ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 में पंजाब के संगरूर ज़िले के सुनाम गाँव में हुआ था. बचपन में ही सिर से माता पिता का साया उठ गया. जब युवावस्था में आएं तो इकलौते भाई ने भी दुनिया को अलविदा कह दिया.

ऊधम बिल्कुल अकेले रह गए. न कोई आगे था न पीछे. इन सारे दुखों के बीच जो एक अच्छी बात थी, वह यह कि अब उनकी हिम्मत और संघर्ष करने की ताकत दोगुनी हो गई थी. शिक्षा ज़ारी रखने के साथ ही आज़ादी की लड़ाई में कूदने का भी मन बना लिया. उन्होंने चंद्रशेखर आज़ाद, राजगुरु, सुखदेव और भगतसिंह जैसे क्रांतिकारियों के साथ मिलकर ब्रिटिश शासन को सबक सिखाने की ठान ली थी.

जब डायर की हत्या करने में कामयाब हुए ऊधम सिंह

13 अप्रैल के बाद से ही ऊधम बदले की आग में झुलस रहे थे. उन्होंने अपने बाकी क्रांतिकारी साथियों के साथ मिलकर जनरल डायर को मारने का पूरा प्लान बनाया. वह अलग-अलग नाम और भेश में अफ्रीका, नैरोबी, ब्राजील और अमेरिका जैसे देश घूम घूमकर सही मौके का इंतजार करते रहे. घूमते हुए वह लंदन पहुंच गए और वहां 9 एल्डर स्ट्रीट कमर्शियल रोड़ पर रहने लगे. वहां उन्होंने यात्रा के उद्देश्य से एक कार और अपना मिशन पूरा करने के लिए छह गोलियों वाली एक रिवाल्वर भी ख़रीद ली. लेकिन जनरल डायर की बीमारी से पहले ही मौत हो चुकी थी. ऐसे में सिंह ने सोचा कि वह गवर्नर ओ'डायर को मारेंगे.
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13 मार्च 1940 को 'रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी' की लंदन के 'कॉक्सटन हॉल' में बैठक थी जहाँ माइकल ओ'डायर भी वक्ताओं में से एक था. ऊधम सिंह भी वहीं मौजूद थे. उन्होंने अपने हाथ में एक किताब ली हुई थी. किताब के पन्नों में रिवाल्वर छुपा था. बैठक के बाद दीवार के पीछे से मोर्चा संभालते हुए ऊधमसिंह ने माइकल ओ'डायर पर गोलियाँ चला दीं. डायर को दो गोलियाँ लगीं, जिससे उसकी तुरन्त मौत हो गई.



लेकिन ऊधम सिंह वहां से भागे नहीं. उन्होंने अपनी गिरफ्तारी करवाई और उन पर मुकदमा चला. कोर्ट में जब सिंह से जज ने ये सवाल किया कि वह डायर के साथियों को भी मार सकते थे, किन्तु उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया. इस पर ऊधमसिंह ने उत्तर दिया, 'वहाँ पर कई महिलाएँ भी थीं और भारतीय संस्कृति में महिलाओं पर हमला करना पाप है. अपने बयान में ऊधमसिंह ने कहा, 'मैंने डायर को मारा, क्योंकि वह इसी के लायक़ था. मैंने ब्रिटिश राज्य में अपने देशवासियों की दुर्दशा देखी है. मेरा कर्तव्य था कि मैं देश के लिए कुछ करूं.मुझे मरने का डर नहीं है. देश के लिए कुछ करके जवानी में मरना चाहिए.'

बाद में 4 जून 1940 को डायर की हत्या का दोषी ठहराते हुए अदालत ने ऊधम सिंह को फांसी की सजा सुनाई और 31 जुलाई, 1940 को 'पेंटनविले जेल' में उन्हें फांसी दे दी गई.
First published: July 31, 2019, 11:53 AM IST
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