'वर्जिन लड़की सीलबंद कोल्ड ड्रिंक की बोतल जैसी'- प्रोफेसर के बयान पर पढ़ें महिला का जवाब

21वीं सदी के इस सामंती, मर्दवादी भारत को आज एक बार फिर ऐसे घोषणापत्र की जरूरत है, जिसका नाम हो “आय एम नॉट ए वर्जिन.” मैं कोई ऑलिव ऑइल नहीं कि वर्जिनिटी से मेरी गुणवत्‍ता में इजाफा होता हो...

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: January 15, 2019, 3:10 PM IST
'वर्जिन लड़की सीलबंद कोल्ड ड्रिंक की बोतल जैसी'- प्रोफेसर के बयान पर पढ़ें महिला का जवाब
कनक सरकार. तस्वीर- फेसबुक प्रोफाइल से
Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: January 15, 2019, 3:10 PM IST
तकरीबन पिछले 22 घंटों से इंटरनेट पर कोहराम मचा है और इसकी शुरुआत करने वाले हैं जाधवपुर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर कनक सरकार.

प्रोफेसर सरकार युवा लड़कों के भविष्‍य को लेकर काफी चिंतित हैं और अपनी एक फेसबुक पोस्‍ट के जरिये उन्‍हें राह दिखाने की कोशिश की है. उनका मानना है कि लड़कों के सुखी जीवन की ये राह लड़कियों की वर्जिनिटी से होकर जाती है. उन्‍होंने फेसबुक पर लिखा-

“वर्जिन दुल्‍हन – क्‍यों नहीं?
बहुत सारे लड़के नादान हैं. वे नहीं जानते कि एक वर्जिन लड़की के पत्‍नी होने का क्‍या अर्थ होता है. वर्जिन लड़की एक सीलबंद बोतल या पैकेट की तरह होती है. अगर तुम कोल्‍ड ड्रिंक की बोतल या बिस्किट का पैकेट खरीदने जाओ तो ऐसा सामान खरीदना चाहोगे, जिसकी सील पहले से टूटी हुई हो.


पत्‍नी के मामले में भी ऐसा ही है. एक लड़की की जैविक संरचना ही ऐसी होती है कि बचपन से उस पर एक सील लगी हुई होती है. एक वर्जिन लड़की का अर्थ है मूल्‍य, संस्‍कृति, संस्‍कार और सेक्‍सुअल हाइजीन. अधिकांश लड़कों के लिए वर्जिन पत्‍नी फरिश्‍ते की तरह होती है.”



कनक सरकार की फेसबुक पोस्ट का स्क्रीनशॉट


ये प्रोफेसर साहब के महान विचार हैं. प्रोफेसर साहब की एक खासियत और है कि ये पिछले दो दशकों से इंटरनेशनल रिलेशंस पढ़ा रहे हैं और ह्यूमन राइट्स में इनको महारत हासिल है. और इस महारत का लब्‍बोलुआब ये है कि इनके हिसाब से औरत एक कोल्‍ड ड्रिंक की बोतल या बिस्किट का पैकेट है. जैसे कोल्‍ड ड्रिंक की बोतल खुली हुई बेकार होती है, वैसे ही औरत सीलबंद न हो तो उनका चरित्र, संस्‍कार, मूल्‍य सब शक के दायरे में है. प्रोफेसर साहेब ने तो सेक्‍सुअल हाइजीन तक को नहीं बख्‍शा है. हालांकि वो ये नहीं बताते कि आदमी दस जगह मुंह मारे तो उसकी पत्‍नी के सेक्‍सुअल हाइजीन का क्‍या होगा.
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जाहिर है सोशल मीडिया पर कोई इस जाहिलियत का समर्थन नहीं कर रहा, लेकिन एक ऐसे समय में, जब मीटू मूवमेंट की आग ठंडी नहीं पड़ी है, जहां सोशल मीडिया पर हजारों की संख्‍या में औरतें अपने हक और बराबरी की बात कर रही हैं, अपनी देह पर अपने हक की बात कर रही हैं, जब इस पर सैकड़ों पन्‍ने काले किए जा रहे हैं, हजारों शब्‍द लिखे जा रहे हैं, वो कौन सी बात है, जो प्रोफेसर सरकार जैसे लोगों को औरत की तुलना कोल्‍ड ड्रिंक की बोतल और बिस्किट के पैकेट से करने की हिम्‍मत दे रही है. यह मानसिकता क्‍या है, यह विश्‍वास आता कहां से है.

सच तो ये है कि प्रोफसर साहब जाहिल हैं. उन्‍होंने भक्‍क से मुंह खोलकर बोल दिया कि पत्‍नी को वर्जिन होना चाहिए. वर्जिन बीवी ही संस्‍कारी बीवी होती है. शादी से पहले सेक्‍स करने वाली लड़कियां सब बर्बाद. आज भी हिंदुस्‍तान के बहुसंख्‍यक मर्दों की सोच ऐसी ही जाहिल किस्‍म की है. लेकिन ये जाहिल मर्द ये भूल जाते हैं कि शादी से पहले सेक्‍स करने वाली लड़कियों ने भी ये काम किसी लड़के के साथ ही किया होगा. तो शादी से पहले सेक्‍स करने वाला वो लड़का बर्बाद नहीं है. बर्बाद सिर्फ लड़की होती है. हालांकि वो प्रो. साहेब और उनके जैसे हजारों लड़कों लार टपकाते घूमते रहते हैं अपनी वर्जिनिटी गंवाने की तलाश में और पहला मौका मिलते ही काम को अंजाम दे डालते हैं. लेकिन मजाल है जो ऐसा करने से उनके चरित्र या संस्‍कार पर कोई आंच आ जाए. सेक्‍सुअल हाइजीन पर भी नहीं. वो सब करके भी इज्‍जत से सिर उठाकर घर जाते हैं और शादी करने के लिए वर्जिन बीवी तलाशते हैं.

हालांकि इतने बिल‍बिलाए हुए ये लोग इसलिए हैं क्‍योंकि इनके अरमान पूरे हो नहीं रहे हैं. लड़कियां वर्जिनिटी के आइडिया को कूड़े के डिब्‍बे में डाल रही हैं और सोशल मीडिया पर खुलेआम कह रही हैं कि वर्जिनिटी का नाश हो. शादी से पहले उन्‍हें सेक्‍स से परहेज नहीं. परहेज लड़कों को भी नहीं है, लेकिन शादी के लिए उन्‍हें वर्जिन बीवी चाहिए. वैसे मेरा सुझाव है कि उन्‍हें कोल्‍ड ड्रिंक की बोतल या बिस्किट के पैकेट से ही शादी कर लेनी चाहिए. उसकी सील एकदम गारंटेड है.

फ्रांस में जब अबॉर्शन गैरकानूनी था तो एक बार 343 महिलाओं ने एक घोषणापत्र पर साइन किया था, जिसमें उन्होंने अपने जीवन में कभी-न-कभी अबॉर्शन करवाने की बात स्वीकार की थी. वह घोषणापत्र इतिहास में “MENIFESTO OF 343 SLUTS” के नाम से जाना गया. 21वीं सदी के इस सामंती, मर्दवादी भारत को आज एक बार फिर ऐसे ही घोषणापत्र की जरूरत है, जिसका नाम हो “आय एम नॉट ए वर्जिन.” मैं कोई ऑलिव ऑइल नहीं कि वर्जिनिटी से मेरी गुणवत्‍ता में इजाफा होता हो.

इस बार इस घोषणापत्र पर हजारों-लाखों लड़कियों के हस्ताक्षर हों.

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