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फैसलों को नहीं अपनों के सीने की जलन को देखिए

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Updated: October 29, 2019, 5:46 PM IST
फैसलों को नहीं अपनों के सीने की जलन को देखिए
ये जहरीली धुंध साबित करती है कि कोई भी पहल , किसी का भी फैसला हमारे और त्यौहारों के बीच में रोड़ा नहीं लगा सकता है.

हम इस बात को लेकर खुशी मना सकते हैं कि पिछली बार की तरह इस बार हम थोड़े कम बुरे हाल में है. इस बार जो भी धुंध फैली है वो तो बस शगुन की है.

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(पंकज रामेन्दु)

'जब भी मैं इन बदसूरत खेतों की बदमस्त फसलों को झूमते हुए देखता हूं, तो मेरा सपना मेरी पलकें नोचने लगता है. मेरा सपना, बड़ी-बड़ी दैत्याकार मशीनें, बुलडोज़र्स, स्टोन क्रशर्स, क्रेन्स, हवाओं में उड़ता सूखा सीमेंट, हजारों की तादात में काम करते मजदूर, बादल उड़ाते कारखाने, भभकती हुईं भट्टियां, धधकती हुईं चिमनियां, यहां दाएं तरफ वर्कर्स का हाउसिंग प्रोजेक्ट और उधर दांई तरफ धूप उछालती हुई, रोशनी में नहाई हुई ऊंचे-ऊंचे शॉपिंग मॉल्स, मल्टी प्लेक्सेस में फिल्मों के रंगीन पोस्टर्स दिखाई दे रहे हैं तुम्हें, फैक्ट्री में हम एक हाथ से पगार दे रहे हैं और शॉपिंग मॉल्स में दूसरे हाथों से वापस ले रहे हैं. शाम के धुंधलके में फैक्ट्री की मीनारी चिमनी से उठता धुआं आसमान में हमारी नस्लों की दास्तान लिख रहा है.'

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बच्चों में पटाखे फोड़ने की दिलचस्पी नहीं दिखती

'मटरू की बिजली का मंडोला' में पंकज कपूर का यह संवाद दिल्ली शहर के ऊपर पसरे हुए उस धुंध की दास्तान को सुनाता है जो दिल्ली सरकार की पहल, माननीय न्यायालय के पटाखों की बिक्री पर रोक, पटाखे फोड़ने की समय सीमा तय करने के फैसले के बाद भी फैली हुई है. ये बताता है कि चाहकर भी नहीं रुक पा रहे विकास के कार्य, लगातार हवाओं में उड़ते सूखे सीमेंट के बीच दूर हवाओं के साथ उड़ कर आते जलते खेतों को धुएं के साथ किस तरह हमने पटाखों के धुएं को मिलाकर हमारी आने वाली नस्लों के भविष्य की इबारत लिखी है. हालांकि ये समझ पाना बेहद मुश्किल है कि ये पटाखे फोड़ना पसंद किसको है क्योंकि बच्चों को तो अब इसमें दिलचस्पी नज़र नहीं आती है और स्कूलों की पहल के बाद हर बच्चे की जबान पर 'से नो टू क्रेकर' भी चढ़ा हुआ है.

धुएं और धुंध का संगम हो रहा है

हालांकि हम इस बात को लेकर खुशी मना सकते हैं कि पिछली बार की तरह इस बार हम थोड़े कम बुरे हाल में है. इस बार जो भी धुंध फैली है वो तो बस शगुन की है क्योंकि हम सभी ने अपने घरों में शगुन के पटाखे ही तो जलाए थे. साथ ही ये जहरीली धुंध ये साबित करती है कि कोई भी पहल किसी का भी फैसला हमारे और त्यौहारों के बीच में रोड़ा नहीं लगा सकता है. हम अपनी संस्कृति (पता नहीं उसमें पटाखे फोड़ने का जिक्र का कहां और कौन से शास्त्र में उल्लेख है) को बचाने के लिए अपनी और आने वाली पीढ़ी की जिंदगी को भी दांव पर लगा सकते हैं. दिल्ली के एक कोने से लेकर पंजाब की सरहद तक फैला स्मॉग यानि धुएं और धुंध का संगम और हरियाणा से लेकर पंजाब के हाइवे के किनारे से लगे हुए खेतों से उठता हुआ धुंआ हमारी देश के जनता की बहादुरी का अफसाना गढ़ रही है.
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दुनिया को खूबसूरत नहीं रहने देंगे

ये वो अफसाना है जिसमें लिखा गया है कि हमने एक जिद ठान ली है कि हम इस दुनिया को खूबसूरत नहीं रहने देंगे. हम हमारे बच्चों को मास्क पहना कर ही बाहर निकालकर छोड़ेंगे. दिल्ली की सड़कों पर जब रात में लोग पटाखे फोड़ रहे थे तो उनके चेहरों पर एक अजीब सी जीत का जश्न नज़र आ रहा था. जैसे वो बताने की कोशिश कर रहे हों कि न्यायालय कौन होता है हमारे धार्मिकता को रोकने वाला. ये बात एक कहानी की याद दिलाता है. एक गांव में एक कई सालों पुराना मंदिर हुआ करता था. उस मंदिर की हालत जर्जर हो चुकी थी. लोगों को मंदिर के अंदर जाकर पूजा करने में भी डर लगता था क्योंकि उन्हें लगता था कि कहीं किसी दिन मंदिर उन पर भरभरा कर न गिर पड़े. फिर एक दिन धर्म को संभालने वाले, धर्म को पालने वाले और धर्म को ढालने वालों ने मिलकर इस बात का फैसला किया कि हमें मंदिर का जीर्णोद्धार करना चाहिए. फिर किसी ने सलाह दी कि इतना पुराना मंदिर है, हमारी पहचान है हम इसे यूं ही तोड़ नहीं सकते है तो मंदिर के दरवाज़ों और खिड़कियों को वैसा ही निकाल कर दोबारा लगाया जाएगा.

प्रदूषण की वजह से दुनिया में सबसे ज्यादा मौत

एक गुट ने सलाह दी कि हमें मंदिर से निकली हुई ईंट पत्थरों को ही दोबारा दीवार बनाने में इस्तेमाल करना चाहिए. किसी ने सलाह दी कि इस मंदिर की नींव तो खोदी ही नहीं जा सकती है तो उसी नींव पर दोबारा मंदिर खड़ा करना सही रहेगा. इस तरह से तमाम सलाह मशविरों के बाद मंदिर के निर्माण का फैसला कर दिया गया. उस गांव में वो मंदिर आज भी अपने गिरने का इंतज़ार कर रहा है. आज भी गांव का बाशिंदा अंदर पूजा करने से डर रहा है. लैंसेट जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक भारत में 2015 में वायु, जल, और दूसरे तरह के प्रदूषण की वजह से दुनिया में सबसे ज्यादा मौत हुई है. प्रदूषण की वजह से इस साल 25 लाख लोगों को अपनी जिंदगी गंवानी पड़ी. शोधकर्ताओं ने बताया है कि इनमें से ज्यादातर मौतें प्रदूषण की वजह से होने वाली दिल की बीमारियों, स्ट्रोक, फेफड़ों के कैंसर और सांस की गंभीर बीमारियों की वजह से हुई है.

हम खुद को सुरक्षित मान रहे हैं

इस अध्ययन के अनुसार इसमें सबसे अधिक मौतों की वजह वायु प्रदूषण है लेकिन बीते चार सालों में हमारे सबक सीखने की गति में कोई खास तेजी नज़र नहीं आई. बात सिर्फ दिल्ली की नहीं है पूरे देश की है, भोपाल जैसे शहर में तो इस बार दीपावली पर बारिश भी पटाखे फोड़ने वालो को निरुत्साहित नहीं कर पाई और रात के वक्त ठीक वैसे ही हाल हुए जैसे पिछले साल दिल्ली में नज़र आ रहे थे. कमोबेश पूरे देश भर में ही पटाखों को लेकर यही हाल है. ऐसा शायद इसलिए भी है क्योंकि हम खुद को सुरक्षित मान रहे हैं.
दरअसल हमें इस बात की गंभीरता ही समझ नहीं आ रही है कि पर्यावरण के साथ हम जो खिलवाड़ कर रहे हैं उसके दुष्परिणाम कितने घातक हैं.

इंसान के अंदर मौत का डर नहीं

‘इयर्स ऑफ लिविंग डेंजरसली’ नाम से पर्यावरण की बिगड़ती हालत पर बनाई गई डॉक्यूमेंट्री श्रखंला में अमेरिका के पूर्व प्रेसिडेंट ओबामा बोलते हैं कि उन्हें उनके एक गवर्नर ने बोला था कि हम शायद वो पहली पीढ़ी है जिसने प्रदूषण को महसूस किया है और अगर हम आज से ही शुरुआत नहीं करते हैं तो शायद हम आखिरी पीढ़ी होंगे. इस बार न्यायालय ने और शासन ने अपने फैसलों में जागरूकता के साथ सख्ती तो बरती थी  लेकिन अभी शायद उनके अंदर मौत का डर नहीं समाया है, अभी वो पंजाब हरियाणा के किसानों की तरह ये मान रहे हैं कि इससे हमारा तो कुछ नहीं होगा. हमारे अकेले के करने से क्या होता है और एक अकेला मैं करूंगा तो उससे क्या नुकसान होगा. ये वो मानसिकता है जो थोड़ा थोड़ा करके इस धरती को तबाह कर रही है.

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सीने की जलन और धुएं से जलती आंखो का तूफान

ये ठीक वैसा ही है कि एक बार एक राज्य में सूखा पड़ने की आशंका को देखते हुए वहां के राजा को किसी ने इससे निपटने के लिए एक सलाह दी. दूसरे दिन राजा ने मुनादी पिटवा दी कि गांव में सूखे को दूर करने के लिए हमें मिलकर कदम उठाने पड़ेंगे. ये इश्वरीय प्रकोप है इसलिए फैसला किया गया है कि सभी लोग अपने अपने घर से एक एक लोटा या जो जितना दे सकता है उतना दूध गांव के पास बनी हुई अलग अलग बावली में डाल दें. इस दूध से भगवान का अभिषेक किया जाएगा. आज रात तक सभी लोग अपना सहयोग दे दें. राज्य में ये बात फैल गई और सभी को सहयोग देने की बात मालूम चल गई. दूसरे दिन जब सुबह हुई तो राज्य की तमाम बावली पानी से भरी हुई थी. हर आदमी ने यही सोचा की सभी लोग तो दूध डाल ही रहे होंगे, मेरे एक लोटे पानी से क्या बिगड़ जाएगा और किसको मालूम चलेगा कि मैंने पानी डाला है या दूध. यही वो मानसिकता है जो लगातार इस दुनिया को गर्त में भेज रही है. एक बार के लिए आप अदालत के फैसले को अनसुना कर भी दें लेकिन अपने या अपनों के सीने की जलन और धुएं से जलती आंखो का तूफान तो अनदेखा नहीं किया जा सकता ना.

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First published: October 29, 2019, 5:46 PM IST
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