'चांद तन्हा है आसमां तन्हा', पढ़ें महजबीं 'नाज़' का दर्द से लबरेज़ कलाम

'चांद तन्हा है आसमां तन्हा', पढ़ें महजबीं 'नाज़' का दर्द से लबरेज़ कलाम
महजबीं 'नाज़' का दर्द भरा कलाम. Image Credit/Pixabay

मीना कुमारी (Meena Kumari) का असल नाम महजबीं 'नाज़' (Mahjabeen Naaz) था, मगर शायरी में उन्‍होंने 'नाज़' तख़ल्‍लुस इख्तियार किया...

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उर्दू शेरो-सुखन (Urdu Shayari) की दुनिया में मशहूर अदाकारा मीना कुमारी (Meena Kumari) बतौर शायरा याद की जाती रहेंगी. उनका जन्‍म 1 अगस्‍त, 1933 को मुंबई में हुआ था. उनका असल नाम महजबीं 'नाज़' (Mahjabeen Naaz) था, मगर शायरी में उन्‍होंने 'नाज़' तख़ल्‍लुस  इख्तियार किया. उन्‍होंने एक से बढ़ कर एक ग़ज़ल लिखीं. उनके कलाम की यह ख़ासियत है कि इसमें उनकी जिंदगी का अक्‍स नज़र आता है. यही वजह है कि जहां इसमें मुहब्‍बत की रंगत है, वहीं दर्द का असर भी पूरी तरह छाया हुआ है. आज हम 'रेख्‍़ता' के साभार से हाजि़र हुए हैं महजबीं 'नाज़' का दर्द से लबरेज़ कलाम लेकर, तो पढ़िए और लुत्‍फ़ उठाइए...



वो नाम नहीं होता...
आग़ाज़ तो होता है अंजाम नहीं होता



जब मेरी कहानी में वो नाम नहीं होता
जब ज़ुल्फ़ की कालक में घुल जाए कोई राही

बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं होता

हंस हंस के जवां दिल के हम क्यों न चुनें टुकड़े

हर शख़्स की क़िस्मत में इनआम नहीं होता

दिल तोड़ दिया उस ने ये कह के निगाहों से

पत्थर से जो टकराए वो जाम नहीं होता

दिन डूबे है या डूबी बारात लिए कश्ती

साहिल पे मगर कोई कोहराम नहीं होता



कहां कहां तन्हा...
चांद तन्हा है आसमां तन्हा

दिल मिला है कहां कहां तन्हा

बुझ गई आस छुप गया तारा

थरथराता रहा धुआं तन्हा

ज़िंदगी क्या इसी को कहते हैं

जिस्म तन्हा है और जां तन्हा

हम-सफ़र कोई गर मिले भी कहीं

दोनों चलते रहे यहां तन्हा

जलती-बुझती सी रौशनी के परे

सिमटा सिमटा सा इक मकां तन्हा

राह देखा करेगा सदियों तक

छोड़ जाएंगे ये जहां तन्हा



आदत होती जाती है...
अयादत होती जाती है इबादत होती जाती है

मेरे मरने की देखो सब को आदत होती जाती है

नमी सी आंख में और होंट भी भीगे हुए से हैं

ये भीगा-पन ही देखो मुस्कुराहट होती जाती है

तेरे क़दमों की आहट को ये दिल है ढूंढ़ता हर दम

हर इक आवाज़ पर इक थरथराहट होती जाती है

ये कैसी यास है रोने की भी और मुस्कुराने की

ये कैसा दर्द है कि झुनझुनाहट होती जाती है

कभी तो ख़ूबसूरत अपनी ही आंखों में ऐसे थे

किसी ग़म-ख़ाना से गोया मुहब्बत होती जाती है

ख़ुद ही को तेज़ नाख़ूनों से हाए नोचते हैं अब

हमें अल्लाह ख़ुद से कैसी उल्फ़त होती जाती है

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आप का सवेरा है...
उदासियों ने मेरी आत्मा को घेरा है

रूपहली चांदनी है और घुप अंधेरा है

कहीं कहीं कोई तारा कहीं कहीं जुगनू

जो मेरी रात थी वो आप का सवेरा है

क़दम क़दम पे बगूलों को तोड़ते जाएं

इधर से गुज़रेगा तू रास्ता ये तेरा है

उफ़ुक़ के पार जो देखी है रौशनी तुम ने

वो रौशनी है ख़ुदा जाने या अंधेरा है

सहर से शाम हुई शाम को ये रात मिली

हर एक रंग समय का बहुत घनेरा है

ख़ुदा के वास्ते ग़म को भी तुम न बहलाओ

इसे तो रहने दो मेरा यही तो मेरा है
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