'कोई हमदम न रहा कोई सहारा न रहा', पढ़ें 'मजरूह' सुल्‍तानपुरी का इश्‍क़ से सराबोर कलाम

'कोई हमदम न रहा कोई सहारा न रहा', पढ़ें 'मजरूह' सुल्‍तानपुरी का इश्‍क़ से सराबोर कलाम
'मजरूह' सुल्‍तानपुरी का इश्‍क़ से लबरेज़ कलाम...

'मजरूह' सुल्तानपुरी (Majrooh Sultanpuri) की शायरी में इश्क (Love) भी है और जिंदगी की उलझनों से दो-चार इंसान की आह भी...

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इश्क़ में घायल शायर 'मजरूह' सुल्‍तानपुरी (Majrooh Sultanpuri) गीतकार के तौर पर भी जाने जाते हैं. उनका जन्‍म 1 अक्‍टूबर, 1919 को सुल्तानपुर (Sultanpur) में हुआ था. उनका असल नाम असरार हसन ख़ान (Asrar Hasan Khan) था. मगर शायरी में मजरूह (Majrooh) तख़ल्‍लुस रखते थे. मजरूह यानी जिसकी रूह तक घायल हो. 'मजरूह' सुल्तानपुरी की शायरी में इश्क (Love) भी है और जिंदगी की उलझनों से दो-चार इंसान की आह भी. वह पेशे से हकीम थे मगर हर्फों के जादूगर के तौर पर जाने गए. अली सरदार जाफरी ने उनकी शायरी की अहमियत को कुछ इन शब्दों में पिरोया है कि 'मजरूह ग़ज़ल के आंगन में किसी सिमटी शरमाई दुल्हन की तरह नहीं, बल्कि एक निडर, बेबाक दूल्हे की तरह दाखिल हुए थे.' आज हम 'रेख्‍़ता' के साभार से हाजि़र हुए हैं 'मजरूह' सुल्‍तानपुरी का इश्‍क़ से लबरेज़ कलाम लेकर, तो पढ़िए और लुत्‍फ़ उठाइए...

 

कोई हमारा न रहा...
कोई हम-दम न रहा कोई सहारा न रहा
हम किसी के न रहे कोई हमारा न रहा



शाम तन्हाई की है आएगी मंज़िल कैसे

जो मुझे राह दिखा दे वही तारा न रहा

ऐ नज़ारो न हंसो मिल न सकूंगा तुम से

तुम मेरे हो न सके मैं भी तुम्हारा न रहा

क्या बताऊं मैं कहां यूंही चला जाता हूं

जो मुझे फिर से बुला ले वो इशारा न रहा

 

उल्फ़त में जुदा होते हैं...
यूं तो आपस में बिगड़ते हैं ख़फ़ा होते हैं

मिलने वाले कहीं उल्फ़त में जुदा होते हैं

हैं ज़माने में अजब चीज़ मुहब्बत वाले

दर्द ख़ुद बनते हैं ख़ुद अपनी दवा होते हैं

हाल-ए-दिल मुझ से न पूछो मेरी नज़रें देखो

राज़ दिल के तो निगाहों से अदा होते हैं

मिलने को यूं तो मिला करती हैं सब से आंखें

दिल के आ जाने के अंदाज़ जुदा होते हैं

ऐसे हंस हंस के न देखा करो सब की जानिब

लोग ऐसी ही अदाओं पे फ़िदा होते हैं

 

चमन कोई न सहरा...
ये रुके रुके से आंसू ये दबी दबी सी आहें

यूंही कब तलक ख़ुदाया ग़म-ए-ज़िंदगी निबाहें

कहीं ज़ुल्मतों में घिर कर है तलाश-ए-दश्त-ए-रहबर

कहीं जगमगा उठी हैं मेरे नक़्श-ए-पा से राहें

तेरे ख़ानुमां-ख़राबों का चमन कोई न सहरा

ये जहां भी बैठ जाएं वहीं इन की बारगाहें

कभी जादा-ए-तलब से जो फिरा हूं दिल-शिकस्ता

तेरी आरज़ू ने हंस कर वहीं डाल दी हैं बांहें

मेरे अहद में नहीं है ये निशान-ए-सरबुलंदी

ये रंगे हुए अमामे ये झुकी झुकी कुलाहें

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यह मौसम तो नहीं है...
गो रात मेरी सुब्ह की महरम तो नहीं है

सूरज से तेरा रंग-ए-हिना कम तो नहीं है

कुछ ज़ख़्म ही खाएं चलो कुछ गुल ही खिलाएं

हर-चंद बहारां का यह मौसम तो नहीं है

चाहे वो किसी का हो लहू दामन-ए-गुल पर

सय्याद ये कल रात की शबनम तो नहीं है

इतनी भी हमें बंदिश-ए-ग़म कब थी गवारा

पर्दे में तेरी काकुल-ए-पुर-ख़म तो नहीं है

अब कारगह-ए-दहर में लगता है बहुत दिल

ऐ दोस्त कहीं ये भी तेरा ग़म तो नहीं है

सहरा में बगूला भी है 'मजरूह' सबा भी

हम सा कोई आवारा-ए-आलम तो नहीं है
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