Meer Taqi Meer Shayari: नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए, पुण्यतिथि पर करें 'मीर' को याद

आज शायरी के खुदा-ए-सुख़न मीर तकी मीर की पुण्यतिथि है
आज शायरी के खुदा-ए-सुख़न मीर तकी मीर की पुण्यतिथि है

मीर तक़ी 'मीर' के शेर और शायरी (Meer Taqi Meer Shayari): आज 'खुदा-ए-सुख़न' यानी कि शायरी के खुदा मीर तक़ी 'मीर' की पुण्यतिथि (Death Anniversary) है. ऐसा कहा जाता है कि मिर्ज़ा ग़ालिब (Ghalib) ने एक बार एक फकीर से मीर की एक नज्म सुनी तो उनके मुंह से बरबस ही निकला, 'रेख्ते के तुम ही नहीं हो उस्ताद ग़ालिब, कहते हैं पिछले ज़माने में कोई मीर भी था.'

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  • Last Updated: September 20, 2020, 9:58 AM IST
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मीर तक़ी 'मीर' के शेर और शायरी (Meer Taqi Meer Shayari): आज 'खुदा-ए-सुख़न' यानी कि शायरी के खुदा मीर तक़ी 'मीर' की पुण्यतिथि है. उर्दू शायरों में भले ही ग़ालिब का नाम लोगों की जुबान बन रहता है लेकिन शायरी का खुदा तो आज भी मीर को ही माना जाता है. मीर ने अपनी शायरी में मोहब्बत की कशमकश को बयां करते हुए खुद मीर ने लिखा है कि- पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है , जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है. ऐसा कहा जाता है कि मिर्ज़ा ग़ालिब ने एक बार एक फकीर से मीर की एक नज्म सुनी तो उनके मुंह से बरबस ही निकला, 'रेख्ते के तुम ही नहीं हो उस्ताद ग़ालिब, कहते हैं पिछले ज़माने में कोई मीर भी था.' मीर तक़ी 'मीर' की प्रसिद्ध रचनाएं हैं- ज़िक्र-ए-मीर (आत्मकथा), कुल्लीयते-मीर, कुल्लीयते-फ़ारसी, फ़ैज़-ए-मीर, कहानियों , नुकत-उस-शूरा. आइए पढ़ते हैं आज कविता कोश के सभार से हम आपके लिए लाए हैं मीर की मशहूर शायरी....

1.हस्ती अपनी हबाबकी सी है ।
ये नुमाइश सराबकी सी है ।।

नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए,
हर एक पंखुड़ी गुलाब की सी है ।



चश्म[5]-ए-दिल खोल इस आलम पर,
याँ की औक़ात ख़्वाब की सी है ।

बार-बार उस के दर पे जाता हूँ,
हालत अब इज़्तिराब की सी है ।

नुक़्ता-ए-ख़ाल[8] से तिरा अबरू
बैत[10] इक इंतिख़ाबकी-सी है

मैं जो बोला कहा के ये आवाज़,
उसी ख़ाना ख़राब की सी है ।

आतिश-ए-ग़म में दिल भुना शायद
देर से बू कबाब की-सी है ।

देखिए अब्र की तरह अब के
मेरी चश्म-ए-पुर-आब की-सी है ।

‘मीर’ उन नीमबाज़ आँखों में,
सारी मस्ती शराब की सी है .



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2.पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने, बाग़ तो सारा जाने है

लगने न दे बस हो तो उस के गौहर-ए-गोश के बाले तक
उस को फ़लक चश्म-ए-मै-ओ-ख़ोर की तितली का तारा जाने है

आगे उस मुतक़ब्बर के हम ख़ुदा ख़ुदा किया करते हैं
कब मौजूद् ख़ुदा को वो मग़रूर ख़ुद-आरा जाने है

आशिक़ सा तो सादा कोई और न होगा दुनिया में
जी के ज़िआँ को इश्क़ में उस के अपना वारा जाने है

चारागरी बीमारी-ए-दिल की रस्म-ए-शहर-ए-हुस्न नहीं
वर्ना दिलबर-ए-नादाँ भी इस दर्द का चारा जाने है

क्या ही शिकार-फ़रेबी पर मग़रूर है वो सय्यद बच्चा
त'एर उड़ते हवा में सारे अपनी उसारा जाने है

मेहर-ओ-वफ़ा-ओ-लुत्फ़-ओ-इनायत एक से वाक़िफ़ इन में नहीं
और तो सब कुछ तन्ज़-ओ-कनाया रम्ज़-ओ-इशारा जाने है

क्या क्या फ़ितने सर पर उसके लाता है माशूक़ अपना
जिस बेदिल बेताब-ओ-तवाँ को इश्क़ का मारा जाने है

आशिक़ तो मुर्दा है हमेशा जी उठता है देखे उसे
यार के आ जाने को यकायक उम्र दो बारा जाने है

रख़नों से दीवार-ए-चमन के मूँह को ले है छिपा य'अनि
उन सुराख़ों के टुक रहने को सौ का नज़ारा जाने है

तशना-ए-ख़ूँ है अपना कितना 'मीर' भी नादाँ तल्ख़ीकश
दमदार आब-ए-तेग़ को उस के आब-ए-गवारा जाने है.
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