'पागल मानकर पेरेंट्स ने छोड़ दिया, अनाथाश्रम से उसे घर लाने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी'

वो अनाथालय में अलग-थलग पड़ा था. पालने में पड़ा टुकुर-टुकुर देखता. मैं पास गया तो उसने ऊंगलियां पकड़ लीं. उस पकड़ में जितनी मजबूती थी, उतनी मुलायमित. तभी से वो मेरा बेटा हो गया. मैं कमउम्र था. सिंगल था. मर्द था. गोद लेने के लिए डेढ़ साल संघर्ष चला. अब अवनीश मेरे साथ है.

News18Hindi
Updated: April 18, 2018, 4:45 PM IST
'पागल मानकर पेरेंट्स ने छोड़ दिया, अनाथाश्रम से उसे घर लाने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी'
अवनीश मेरे साथ है
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Updated: April 18, 2018, 4:45 PM IST
(आदित्य तिवारी देश के सबसे युवा पुरुष के तौर पर जाने जाते हैं, जिन्होंने अविवाहित रहते हुए एक 'स्पेशल' बच्चे को गोद लिया. अवनीश को अडॉप्ट करने के लिए उन्होंने लंबा सफर तय किया.)

उससे पहले मैं कभी अनाथालय नहीं गया था. संयोग ही था कि पापा के जन्मदिन पर पुणे से इंदौर पहुंचा और उससे मिला. उस अनाथालय में एक के बाद एक सारे बच्चे अडॉप्ट किए जा रहे थे, सिवाय अवनीश के. वो स्पेशल था, उसके दिल में दो छेद थे, घुटनों में दिक्कत थी. पेट हमेशा खराब रहता. ऐसे बच्चे को भला कौन लेना चाहेगा! मैं लौट तो आया लेकिन दिनों तक वही चेहरा याद आता रहा. महीनेभर मैं दोबारा इंदौर पहुंचा ताकि उससे मिल सकूं. अब मैं उसे गोद लेना चाहता था.

शुरू में सबने मेरी बात को मजाक में लिया. जब मैंने इस ओर कोशिशें शुरू कीं तो डराने लगे. किसी ने कहा, ऐसा बच्चा लेने से जिंदगी बर्बाद हो जाएगी. किसी ने कहा, मेरी नौकरी चली जाएगी. किसी ने कहा, मर्द बच्चे नहीं पाल सकते. कईयों ने डराया कि कोई लड़की मुझसे शादी नहीं करेगी. मैं सब सुनता.



रातभर बैठकर अलग-अलग विभागों को ई-मेल करता कि मुझे उसे गोद लेने दिया जाए. लगभग हर वीकेंड हजार किलोमीटर ड्राइव करता ताकि उससे मिल सकूं. अनाथालय के लोगों के सिखाने पर वो मुझे पापा बोलना शुरू कर चुका था. आखिरकार 1 अगस्त 2015 को अडॉप्शन लॉ में बदलाव हुए और जनवरी 2016 में अवनीश मेरे साथ था.

उसे गोद लेने में डेढ़ साल लगे. इस वक्त ने मुझे पूरी तरह से तैयार कर दिया था. मैंने डाउन सिंड्रोम के बारे में खूब पढ़ा. बच्चे को संभालने, डायपर बदलने, फॉर्मूला बनाने पर मेरी तैयारी किसी मां से कम नहीं थी. अवनीश घर आया. तब मैं पुणे में था. अपने पोते के साथ रहने के लिए मेरे पेरेंट्स भी आ चुके थे. शुरुआत में कई रातें मैंने जागकर बिताईं. अवनीश मेरे शरीर का हिस्सा न सही, मेरे दिल का हिस्सा बन चुका था. वो बीमार पड़ता तो मैं छुट्टी लेकर उसके साथ रहता. मांओं की साइट्स गूगल करता, बच्चों की दिक्कतें समझता. घंटों डॉक्टर दोस्तों से उसके बारे में पूछता.



जब मैं उसे लेकर आया, तब वो बार-बार बीमार पड़ता. डॉक्टरों ने कहा था कि दिल में छेद के कारण उसे तुरंत सर्जरी की जरूरत है. प्यार और देखभाल ने सब बदल दिया. अवनीश सेहतमंद हो गया. अब वो नॉर्मल बच्चों के स्कूल जाता है. इतना प्यारा है कि उसे छोटी-बड़ी क्लास के बच्चे, टीचर, हाउस कीपिंग स्टाफ यानी तमाम स्कूल जानता है. बड़े-बड़े शब्दों की कमी को उसकी मासूमियत भर देती है.

एक रोज एकाएक मुझे समझ आया कि उसे जानवर बहुत पसंद है, खासकर शेर. इंदौर के चिड़ियाघर में हमने एक बंगाल टाइगर को अडॉप्ट किया. उसके खाने-इलाज का खर्च हम उठाते हैं. जब भी इंदौर जाते हैं, चिड़ियाघर भी जाते हैं. अवनीश से उस शेर की मुलाकात बड़ी मजेदार होती है. शेर सोता रहता है, मूड में होता है तो बाहर निकलकर दहाड़ता है. अवनीश उसे 'हप्प' करता है. कई बार गले लगाने की जिद पकड़ लेता है. स्पेशल है इसलिए किसी से नहीं डरता, सबको प्यार देता है.



कई बार वो मेरी मां बन जाता है. दफ्तर से आता हूं तो मेरा बैग जगह पर रख देता है. उदास होता हूं तो मुझे दुलारता है. संडे को अक्सर मुझसे पहले जाग जाता है और पालथी लगाकर पास ही बैठा रहता है, जब तक मैं जाग न जाऊं. घंटों मेरा माथा, मेरी आंखें, नाक छूता रहता है. मैं नाचूं तो तपाक से साथ नाचने लगता है. मैं चुप रहूं तो वो भी एकदम गुमसुम हो मुझसे सटकर बैठा रहता है.

उसे मेरी नहीं, मुझे उसकी जरूरत है. उसकी हंसी मेरे दिनभर की थकान का मेहनताना है.

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