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लड़के स्‍वार्थी हो सकते हैं, लेकिन लड़कियों को नहीं होना चाहिए

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: September 25, 2019, 2:13 PM IST
लड़के स्‍वार्थी हो सकते हैं, लेकिन लड़कियों को नहीं होना चाहिए
प्रतीकात्‍मक चित्र

लड़कियों को स्‍वार्थी होना चाहिए और अपनी प्रिऑरिटी लिस्‍ट में खुद को सबसे ऊपर रखना चाहिए.

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  • Last Updated: September 25, 2019, 2:13 PM IST
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जब मैं किसी लड़की को खुद को अपनी प्रिऑरिटी लिस्‍ट में सबसे ऊपर रखते हुए देखती हूं तो मेरा दिल भर जाता है. उसकी इच्‍छा, उसकी जरूरत, उसका काम, उसका आराम, उसकी सेहत, उसका खाना, उसकी खुशी और उसका दुख. उसके सबकुछ का नंबर सबसे पहले आता है. ऐसी लड़कियों को देखकर खुशी होती है, लेकिन प्रॉब्‍लम ये है कि खुशी ज्‍यादा हो नहीं पाती. क्‍योंकि ऐसी लड़कियां ही ज्‍यादा नहीं होतीं.

लड़कियां ज्‍यादातर ऐसी ही होती हैं कि खुद से पहले दूसरों की जरूरतों, सुख, आराम सबकुछ को प्रिऑरिटी पर रखती हैं. खुद से पहले दूसरों के बारे में सोचती हैं. खुद से पहले दूसरों का ख्‍याल रखती हैं. लड़कियों को पाला ही इस तरह जाता है कि उन्‍हें खुद के बारे में सोचना स्‍वार्थी होना लगता है. ये बायलॉजिकल नहीं है.

तो फिर ऐसा क्‍यों है. कुछ ऐसे समझने की कोशिश करते हैं.

लड़कियां अपने मन की नहीं होतीं. अपने मन की नहीं करतीं. लड़कियां अपने मन की कब होती हैं? कहां होती हैं? कब और कहां तो तब पूछें कि जब ये जान लें कि होती भी हैं क्‍या?

अगर किसी बड़ी हो रही लड़की का स्‍वभाव, आदतें, व्‍यवहार, पसंद-नापसंद कभी भी रूटीन से हटकर हों तो क्‍या उसके आसपास की दुनिया, परिवार, समाज उसके इस व्‍यवहार के प्रति सहिष्‍णु और उदार होते हैं?

बिलकुल नहीं होते. उसे हर हाल ठोंक-पीटकर सही रास्‍ते पर लाने की कोशिश की जाती है.

बड़े होते हुए एक बात मेरे गले में फांस की तरह अटक गई थी. वो ये कि मेरे अकेले रहने, रिश्‍तेदारों से दूर भागने और किसी से बात न करना चाहने की इच्‍छा के प्रति पूरा घर बहुत उग्र था. मेरे साथ भी ये अचानक ही हुआ था कि एक खुशमिजाज, मिलनसार लड़की अचानक सबसे कट जाना चाहती थी. घर में कोई आए तो भी मैं बाहर नहीं निकलती. बात नहीं करती. मां कमरे में आकर आंखें तरेरतीं, "यहां क्‍या बैठी हो. बाहर जाकर पैर छुओ. बात करो. हालचाल पूछो."शादी-ब्‍याह के मौकों पर पूरा घर इकट्ठा होता और मैं चुपचाप एक कमरे में पड़ी रहती. मां फिर आंख दिखातीं, "सब क्‍या सोचेंगे. कैसी हो तुम. अनिता को देखो, सबसे कैसे घुलमिल गई है. जाओ, वहां जाकर बैठो. सबसे बात करो. जाकर काम में हाथ बंटाओ. भाभी को जाकर पूछो कि कुछ जरूरत तो नहीं है." हालांकि पचास औरतें वहां मौजूद हैं, पूछने के लिए कि कोई जरूरत तो नहीं है. एक मैं नहीं भी जाऊं तो क्‍या फर्क पड़ता है. लेकिन नहीं, जाना तो होगा.

मन नहीं है मेरा. मुझे यहां अकेले रहना अच्‍छा लग रहा है. लेकिन ये अच्‍छा लगना क्‍या होता है. पूछा किसने तुमसे कि तुम्‍हें क्‍या अच्‍छा लग रहा है.

कोई रिश्‍तेदार अचानक टपक पड़ा है और मेरा दो कौड़ी का मन नहीं कि मैं जाकर उसके साथ बैठूं, हालचाल पूछूं, बात करूं, लेकिन करना पड़ेगा. बाकी लोग तो कर ही रहे हैं, मुझे भी करना पड़ेगा. मुझे हमेशा से यही सिखाया गया था. दूसरों के बारे में सोचना, उनका ख्‍याल रखना, उनकी सुविधा-असुविधा, सुख-दुख, जरूरत, सबकुछ. जैसे पापा अभी गुस्‍से में हैं तो चुप हो जाओ. मैंने कभी नहीं सोचा कि मां गुस्‍से में हैं तो चुप हो जाते हैं. क्‍योंकि पापा गुस्‍सा होते हैं और मां दुखी. गुस्‍से से डर लगता है और दुख को हम कुछ नहीं समझते.

पापा दिन भर कमरे में बैठकर पढ़ते रहें. दादी चुपचाप कमरे में चाय, नाश्‍ता, खाना पहुंचा देंगी लेकिन एक भी बार सवाल नहीं करेंगी. बुआ ऐसा नहीं कर सकतीं. बुआ को पूरे घर का ख्‍याल रखना है. पापा को सिर्फ अपनी इच्‍छाओं का. मेरा कजिन भाई भी ऐसा ही है. कोई भी आए, वो अपने कमरे से बाहर नहीं आएगा. उसे भी किसी से बात नहीं करनी. इंट्रोवर्ट है, अपने में रहता है. पूरा घर अकेले रहने की उसकी इच्‍छा के प्रति बहुत उदार है. मेरी इच्‍छा के प्रति नहीं हैं. ननिहाल से कोई आया. पापा को पसंद नहीं. वो घर से चले जाएंगे. ददिहाल से कोई आया. मां को राई रत्‍ती पसंद न हो. वो नहीं जा सकती. वो स्‍वागत, सत्‍कार, ख्‍याल की जिम्‍मेदारी निभाएंगी. मैं भी जिम्‍मेदारियों को इग्‍नोर नहीं कर सकती. अपने कमरे में बैठकर किताब नहीं पढ़ती रह सकती. अगर वो मुझे पसंद नहीं तो भी ये नहीं कह सकती कि दोबारा आना मत.

ये जिम्‍मेदारियां निभाते-निभाते, सबको खुश करते-करते, सबके हिसाब से चलते-चलते लड़कियां भूल ही जाती हैं कि वो कौन हैं और क्‍या चाहती हैं. दूसरों को खुश रखना ही उनकी जिंदगी का मकसद बन जाता है.

होना तो ये चाहिए था कि मुझे वैसे ही होने दिया जाता, जैसी मैं होना चाहती हूं. जबर्दस्‍ती मैं किसी से बात क्‍यों करूं. बकवास क्‍यों झेलूं. जब मेरा मन होगा तो मैं दिन-रात बातें करूंगी. नहीं होगा, नहीं करूंगी.

और सबसे बेकार तर्क तो ये है कि सबका ख्‍याल रखना अच्‍छी बात होती है. सबका ख्‍याल रखना चाहिए क्‍योंकि बात दरअसल मानवीयता, उदारता, करूणा, प्रेम और ख्‍याल रखने की है ही नहीं. बात सबके हिसाब से चलने की है. क्‍योंकि बात दरअसल सेवा करने की है. बात दरअसल अपने आपको मार देने की है. अपने बारे में कभी न सोचने की है.

बात ये नहीं है कि अपने बारे में सोचना, अपने आपको प्रिऑरिटी पर रखना स्‍वार्थी होना है, बात ये है कि लड़कियों का अपने आप को प्रिऑरिटी पर रखना स्‍वार्थी होना है. बात ये नहीं है कि लड़कों को स्‍वार्थी नहीं होना चाहिए. बात ये है कि लड़के हो सकते हैं, लेकिन लड़कियों को स्‍वार्थी नहीं होना चाहिए. लड़कियां इस दुनिया में अपने लिए नहीं आई हैं. वो सेवार्थ आई हैं. अपना कर्त्‍तव्‍य निभाने आई हैं. अपने आपको प्रिऑरिटी पर रखने नहीं.

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First published: September 25, 2019, 1:14 PM IST
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