#MeToo: ‘तब क्यों नहीं बोली थी’ का जवाब

#Metoo के ज़रिए जहां लड़कियां अपने अतीत के भयावह अनुभव साझा कर रही हैं. वहीं ऐसा करते हुए उन्हें कटघरे में भी खड़ा किया जा रहा है. यह पूछा जा रहा है कि तब क्यों नहीं बोली. लेकिन क्या तब बोलना या कभी भी बोलना इतना आसान होता है.

News18Hindi
Updated: October 11, 2018, 8:44 PM IST
#MeToo: ‘तब क्यों नहीं बोली थी’ का जवाब
यौन शोषण के पीड़ित पर जल्दी रिपोर्ट न करने का आरोप लगाया जाता है
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Updated: October 11, 2018, 8:44 PM IST
#MeToo ने भारत के सोशल मीडिया में हड़कंप मचा दिया है. लड़कियां और महिलाएं - विशेषकर मीडिया और सिनेमा जगत की – अपने साथ हुए यौन शोषण के बारे में न सिर्फ बात कर रही हैं, बल्कि आरोपियों का नाम लिया जा रहा है. दूसरी तरफ अपने अनुभव साझा करने वाली महिलाओं से सवाल पूछे जा रहे हैं कि क्यों वो इतने साल बाद बात कर रही हैं. क्यों नहीं 20 साल पहले जब उनके साथ यह हादसा हुआ, तब उन्होंने कुछ नहीं बोला. टीवी प्रोड्यूसर विनता नंदा ने अभिनेता आलोक नाथ पर 24 साल पहले बलात्कार किए जाने का आरोप लगाया है. विनता की बात का उस दौर की और अभिनेत्रियों ने भी समर्थन किया है. इसी तरह बीजेपी नेता एमजे अक़बर पर उनके साथ 20 साल पहले काम कर चुकी महिलाओं ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है.

उधर अमेरिका में सुप्रीम कोर्ट के लिए डोनाल्ड ट्रंप द्वारा नामांकित नाम ब्रेट कैवनॉ पर मनोविज्ञान की प्रोफेसर क्रिस्टीन ब्लैसे फोर्ड ने आरोप लगाया कि स्कूल के दिनों में कैवनॉ ने उनका यौन उत्पीड़न किया. काफी विवाद के बावजूद कैवनॉ ने जीत हासिल कर शपथ ग्रहण भी की. ऐसे में बार-बार सोशल मीडिया पर यह सवाल दिखाई दे जाता है कि 'अब बोल रही हो, तब क्यों नहीं बोली.'

जानकार कहते हैं कि तब नहीं बोलना या ठीक से पूरी बात न बता पाना ही दरअसल यौन उत्पीड़न का सबसे बड़ा संकेत है. किंबरले ए लॉन्सवे एक मनोवैज्ञानिक हैं और End Violence Against Women International संस्था में रिसर्च डायरेक्टर हैं. न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में वह कहती हैं - हम यौन उत्पीड़न के बारे में बहुत ही अलग तरीके से सोचते हैं और वह दरअसल इसके ठीक उलट तरीके से ऑपरेट करता है.'

आगे बढ़ने से पहले देखिए कुछ ट्वीट्स को जो #WhyIdidntReport के साथ बताते हैं कि वह तब क्यों नहीं बोली थीं.








अब आते हैं उन वैज्ञानिक और सामाजिक वजहों पर जो किसी भी पीड़ित को यौन उत्पीड़न के मामले को रिपोर्ट करने या किसी को बताने से रोकती हैं.

पहली वजह जो उस वक्त न बता पाने या #WhyIdidntReport के लिए जिम्मेदार हैं वह है पुरानी वर्जनाएं जो महिलाओं या पीड़ितों को अपने परिवार या पुलिस को बताने से रोकती हैं. भारत ही नहीं, अमेरिका जैसे कथित विकसित देश में भी सदियों से यौन उत्पीड़न को लड़कियों के जीवन का हिस्सा समझा जाता रहा है. ऐसे में यह पूछने से पहले कि क्यों नहीं उसी वक्त जाकर रिपोर्ट की गई या एक्शन लिया गया, उस जगह और माहौल के सामाजिक संदर्भ को ठीक से समझ लेना ज़रूरी है. कहीं न कहीं समाज के साथ साथ लड़कियों की सोच का भी इसे हिस्सा बना दिया गया है कि उनका उत्पीड़न होना है और वह इसके लिए कुछ नहीं कर सकती. गौर करें तो सामने आ रहे मामले भी 20-25 साल पुराने है जब अपनी बात कहने के फेसबुक जैसे मंच नहीं थे और न ही सामाजिक सोच भी काफी परंपरावादी थी.

metoo, sexual assault
Metoo के ज़रिए महिलाओं ने चुप्पी तोड़ी है


दूसरी वजह है घटना का टुकड़ों में याद रहना - विज्ञान कहता है कि हम अपने अनुभवों को बहुत ही टुकड़ों टुकड़ों में याद रखते हैं, ऐसे में जब दर्दनाक हादसों की बात आती है तो दाव पर बहुत कुछ लगा होता है. अपराधी से ज्यादा बोझ आरोप लगाने वाले पर होता है. अगर कहीं उसका आरोप गलत साबित हुआ तो उसका करियर, उसका परिवार बहुत कुछ दाव पर होता है. ऐसे में यही डर उन्हें रिपोर्ट करने से भी रोकता है. वह एकदम परफेक्ट तरीके से हादसे को बयां नहीं कर पाएंगे और बार बार सवाल पूछे जाने पर हो सकता है कि उन्हें ही झुठला दिया जाए. जबकि सच तो यह है कि हादसे ही नहीं, हम अपने हर एक अनुभव को जस का तस कम ही बता पाते हैं.

तीसरी वजह जो उन्हें रिपोर्ट करने या बताने से रोकती है - उन्हें नहीं पता था कि वह उत्पीड़न है. ट्विटर पर #WhyIdidntReport में ऐसे कई मामले साझा किए गए जिसमें पीड़ित 7-8 साल की बच्ची थी जब उसके साथ हादसा हुआ. ऐसे में उसे यह भी नहीं पता था कि यह गलत है या सही. गौरतलब है कि ज्यादातर #metoo मामलों में लड़कियां बचपन की घटनाएं साझा कर रही हैं. यानी ऐसा समय जब अपराधी को पता होता है कि बच्ची को सही गलत की समझ नहीं है. वह अगर समझेगी भी तो उसे अपनी गलती मानेगी, उसे किसी को बताएगी नहीं या उसे बहला फुसलाकर चुप रहने के लिए कहा जा सकता है. सिर्फ यही नहीं, एक्सपर्ट्स एक और बात की तरफ ध्यान दिलाते हैं - जब अपराधी कोई ऐसा हो जिस पर आप भरोसा करते हो तो कई बार पीड़ित को यह समझने में सालों लग जाते हैं कि उसके साथ जो हुआ वह दरअसल अपराध था या उत्पीड़न था.

भारत के संदर्भ में मैरिटल रेप पर यह बात सटीक बैठती है. महिलाओं और पुरुषों को शादी के बाद सेक्स में आपसी रज़ामंदी के महत्व की बहुत कम स्तर पर जानकारी है. बलात्कार या उत्पीड़न से जुड़ी एक अमेरिकी हेल्पलाइन नंबर के अध्यक्ष स्कॉट बेर्कोविट्ज़ कहते हैं - कई लोग हमारे नंबर पर कॉल करके पहला सवाल यह पूछते हैं कि 'क्या मेरा रेप हुआ है.' दरअसल समाज में सहमति को लेकर इतनी धुंधली लकीर है कि कई बार महिलाएं - यह सोचने से ज्यादा कि उनके साथ अभी अभी क्या हुआ - अपराधबोध में ज्यादा सिमट जाती है. ऐसा तब होता है जब उत्पीड़न करने वाला आपका करीबी हो.

चौथी वजह शर्म. एक बलात्कार पीड़ित या यौन उत्पीड़न की शिकार की समाज में एक अलग तरह की तस्वीर खींची जाती रही है. आलम यह है कि दोषी न होते हुए भी टीवी या अखबार में पीड़ित की तस्वीर छुपाई जाती है, मानो गुनाह उसने किया है. उसने कैसे कपड़े पहने थे, वो कितने बजे रात को निकली थी, जैसे सवाल इतने ज़्यादा व्याप्त हैं कि ख़ुद पीड़ित भी रिपोर्ट करने से पहले अपने आप से यह सारे सवाल पूछने लग जाती है. ऊपर से अगर आरोपी कोई ताकतवर व्यक्ति है तो ऐसे में यह डर अंदर अपने आप ही बैठ जाता है कि कुछ नहीं होने वाला है. जैसा कि विनता नंदा के मामले में हुआ. उनके मुताबिक अपराधी उस वक्त के बहुत बड़े टीवी कलाकार थे जिनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता था. इसलिए विनता ने 20 साल तक बलात्कार और हिंसा की इस डरावनी याद को अपने अंदर ही कहीं गाड़कर रख दिया था.
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