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Mirza Ghalib Shayari: 'हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे...' पढ़ें मिर्ज़ा ग़ालिब के क्लासिक शेर

मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी

मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी

Mirza Ghalib Classic Shayari: मिर्ज़ा 'ग़ालिब', उर्दू साहित्य (Urdu Shayari) की दुनिया का ऐसा नाम जो किसी परिचय का मोहताज नहीं है. 27 दिसंबर, 1797 को उत्तर प्रदेश के आगरा में पैदा हुए ग़ालिब का असल नाम मिर्ज़ा असद उल्लाह बेग ख़ान (Mirza Asadullah Baig Khan) था.

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    इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया, वर्ना हम भी आदमी थे काम के

    इश्क़ ने ‘ग़ालिब’ निकम्मा कर दिया,
    वर्ना हम भी आदमी थे काम के
    इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा, लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं

    इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा,
    लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं
    हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद, जो नहीं जानते वफ़ा क्या है

    हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद,
    जो नहीं जानते वफ़ा क्या है
    इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब', कि लगाए न लगे और बुझाए न बने

    इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’,
    कि लगाए न लगे और बुझाए न बने
    उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़ वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

    उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़,
    वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है
    हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

    हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
    बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

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