उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले, पढ़ें मिर्ज़ा ग़ालिब के शेर

उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले, पढ़ें मिर्ज़ा ग़ालिब के शेर
मिर्ज़ा ग़ालिब शेर और शायरी

मिर्ज़ा ग़ालिब शेर और शायरी (Mirza Ghalib Shayari): न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता, डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता...

  • News18Hindi
  • Last Updated: July 14, 2020, 11:49 AM IST
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मिर्ज़ा ग़ालिब शेर और शायरी (Mirza Ghalib Shayari): शायरों के दुनिया में मिर्ज़ा ग़ालिब का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है. उर्दू के मशहूर शायर अजीम शायर हैं मिर्ज़ा ग़ालिब . ग़ालिब ने उर्दू और फारसी में भी ऐसे कई शेर और शायरियां लिखीं हैं जिनकी लोग दाद दिया करते थे. ग़ालिब ने अपनी शायरियों में मानो अपने दिल की हर बात बड़ी नफ़ासत के साथ बयां आकर दी. ग़ालिब ही वो शायर हैं जिन्होंने हकीकत जानते हुए भी लिखा किकास दिल को खुश रखने के लिए ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है. आज हम रेख्ता डॉट कॉम के हवाले से लेकर आए हैं मिर्ज़ा ग़ालिब के चंद मशहूर शेर और शायरियां...

1.हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले

बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले.



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2.मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का

उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले.

3.हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन

दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है.

4. उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़

वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है.

5. इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना

दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना .

6.रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल

जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है.

7.ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता

अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता.

8. न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता

डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता.



9.रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज

मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं.

10. आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक

कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक.
11.बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना

आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना.

12. बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे

होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे.

13. रेख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो 'ग़ालिब'

कहते हैं अगले ज़माने में कोई 'मीर' भी था.

14. हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे

कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और

15. काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब'

शर्म तुम को मगर नहीं आती.

16.कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश को

ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता.

17. क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हाँ

रंग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन.
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