बे-क़रारी है कि सौ बार लिए फिरती है, पढ़ें शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ की शायरी

Shayari: शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ की शायरी
Shayari: शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ की शायरी

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ की शायरी (Mohammad Ibrahim Zauq Shayari): सब को दुनिया की हवस ख़्वार लिए फिरती है , कौन फिरता है ये मुर्दार लिए फिरती है...

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  • Last Updated: November 4, 2020, 11:17 AM IST
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शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ की शायरी (Mohammad Ibrahim Zauq Shayari): शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ का नाम शेर और शायरी की दुनिया में बड़े अदब के साथ लिया जाता है. मुग़ल सलतनत के बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के दौर में, शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ को मलक-उश-शोअरा के ख़िताब से नवाजा गया था. उस समय उनकी गिनती दूसरे नामचीन शायरों, ग़ालिब और मोमिन से बड़े शायरों में होती थी लेकिन समय ने तेजी से करवट बदली और जल्द ही लोग ग़ालिब को महान शायर कहने लगे. आज हम आपके लिए रेख्ता के साभार से लेकर आए हैं शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ की शायरी ...

1.सब को दुनिया की हवस ख़्वार लिए फिरती है

कौन फिरता है ये मुर्दार लिए फिरती है



घर से बाहर न निकलता कभी अपने ख़ुर्शीद
हवस-ए-गर्मी-ए-बाज़ार लिए फिरती है

वो मिरे अख़्तर-ए-ताले की है वाज़ूँ गर्दिश

कि फ़लक को भी निगूँ-सार लिए फिरती है

कर दिया क्या तिरे अबरू ने इशारा क़ातिल

कि क़ज़ा हाथ में तलवार लिए फिरती है

जा के इक बार न फिरना था जहाँ वाँ मुझ को

बे-क़रारी है कि सौ बार लिए फिरती है.

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2. अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएँगे

मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएँगे

तुम ने ठहराई अगर ग़ैर के घर जाने की

तो इरादे यहाँ कुछ और ठहर जाएँगे

ख़ाली ऐ चारागरो होंगे बहुत मरहम-दाँ

पर मिरे ज़ख़्म नहीं ऐसे कि भर जाएँगे

पहुँचेंगे रहगुज़र-ए-यार तलक क्यूँ कर हम

पहले जब तक न दो आलम से गुज़र जाएँगे

शोला-ए-आह को बिजली की तरह चमकाऊँ

पर मुझे डर है कि वो देख के डर जाएँगे

हम नहीं वो जो करें ख़ून का दावा तुझ पर

बल्कि पूछेगा ख़ुदा भी तो मुकर जाएँगे

आग दोज़ख़ की भी हो जाएगी पानी पानी

जब ये आसी अरक़-ए-शर्म से तर जाएँगे

नहीं पाएगा निशाँ कोई हमारा हरगिज़

हम जहाँ से रविश-ए-तीर-ए-नज़र जाएँगे

सामने चश्म-ए-गुहर-बार के कह दो दरिया

चढ़ के गर आए तो नज़रों से उतर जाएँगे

लाए जो मस्त हैं तुर्बत पे गुलाबी आँखें

और अगर कुछ नहीं दो फूल तो धर जाएँगे

रुख़-ए-रौशन से नक़ाब अपने उलट देखो तुम

मेहर-ओ-माह नज़रों से यारों की उतर जाएँगे

हम भी देखेंगे कोई अहल-ए-नज़र है कि नहीं

याँ से जब हम रविश-ए-तीर-ए-नज़र जाएँगे

'ज़ौक़' जो मदरसे के बिगड़े हुए हैं मुल्ला

उन को मय-ख़ाने में ले आओ सँवर जाएँगे.

3. वो कौन है जो मुझ पे तअस्सुफ़ नहीं करता

पर मेरा जिगर देख कि मैं उफ़ नहीं करता

क्या क़हर है वक़्फ़ा है अभी आने में उस के

और दम मिरा जाने में तवक़्क़ुफ़ नहीं करता

कुछ और गुमाँ दिल में न गुज़रे तिरे काफ़िर

दम इस लिए मैं सूरा-ए-यूसुफ़ नहीं करता

पढ़ता नहीं ख़त ग़ैर मिरा वाँ किसी उनवाँ

जब तक कि वो मज़मूँ में तसर्रुफ़ नहीं करता

दिल फ़क़्र की दौलत से मिरा इतना ग़नी है

दुनिया के ज़र-ओ-माल पे मैं तुफ़ नहीं करता

ता-साफ़ करे दिल न मय-ए-साफ़ से सूफ़ी

कुछ सूद-ओ-सफ़ा इल्म-ए-तसव्वुफ़ नहीं करता

ऐ 'ज़ौक़' तकल्लुफ़ में है तकलीफ़ सरासर

आराम में है वो जो तकल्लुफ़ नहीं करता .
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