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Mother’s Day Shayari: 'मुद्दतों बाद मयस्सर हुआ मां का आंचल', मदर्स डे पर शायरों के ख़ास कलाम

मदर्स डे शायरी: 'ऐ रात मुझे मां की तरह गोद में ले ले...' Image/shutterstock

Mother’s Day Shayari: शायरी में जहां महबूब की ख़ूबसूरती और उसकी अदाओं का जिक्र है, वहीं मां के लिए भी शायरों (Shayar) ने बहुत दिलकश अंदाज़ में कलाम कहे हैं और इस तरह अपने जज्‍़बात (Emotion) को बयां किया है...

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    Mother’s Day Shayari: शायरी (Urdu Shayari) अल्‍फ़ाज़ के वे मोती हैं जिनमें सच्‍ची मुहब्‍बत का अक्‍स नज़र आता है. ऐसा ही एक पाक जज्‍़बा (Emotion) है मां से मुहब्बत का. जहां शायरी में महबूब की ख़ूबसूरती और उसकी अदाओं का जिक्र है, वहीं मां के लिए भी शायरों ने बहुत दिलकश अंदाज़ में कलाम कहे हैं. कहीं बचपन की मासूमियत का जिक्र मां से जोड़ा है, तो कहीं जवानी में हालात की तपिश में मां की याद और उसके आंचल के छांव की बात कही गई है. वैसे तो मुहब्‍बत के इज़हार के लिए कोई एक दिन तय नहीं किया जा सकता, लेकिन बात जब मां की आए तो किसी खास दिन, मौके पर अपनों के लिए प्‍यार और एहतराम (Love And Respect) को जताना दिल को सुकून देता है. आइए इस मदर्स डे पर मां के लिए शायरों के कहें अशआर का लुत्‍फ़ उठाएं-

    दुआ को हाथ उठाते हुए लरज़ता हूं
    कभी दुआ नहीं मांगी थी मां के होते हुए
    इफ़्तिख़ार आरिफ़

    एक मुद्दत से मेरी मां नहीं सोई 'ताबिश'
    मैं ने इक बार कहा था मुझे डर लगता है
    अब्बास ताबिश

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    घर लौट के रोएंगे मां बाप अकेले में
    मिट्टी के खिलौने भी सस्ते न थे मेले में
    क़ैसर-उल जाफ़री

    मां की दुआ न बाप की शफ़क़त का साया है
    आज अपने साथ अपना जन्‍मदिन मनाया है
    अंजुम सलीमी

    मां बाप और उस्ताद सब हैं ख़ुदा की रहमत
    है रोक-टोक उन की हक़ में तुम्हारे नेमत
    अल्ताफ़ हुसैन हाली

    मां की आग़ोश में कल मौत की आग़ोश में आज
    हम को दुनिया में ये दो वक़्त सुहाने से मिले
    कैफ़ भोपाली

    तिफ़्ल में बू आए क्या मां बाप के अतवार की
    दूध तो डिब्बे का है तालीम है सरकार की
    अकबर इलाहाबादी

    किताबों से निकल कर तितलियां ग़ज़लें सुनाती हैं
    टिफ़िन रखती है मेरी मां तो बस्ता मुस्कुराता है
    सिराज फ़ैसल ख़ान

    मुद्दतों बाद मयस्सर हुआ मां का आंचल
    मुद्दतों बाद हमें नींद सुहानी आई
    इक़बाल अशहर

    ऐ रात मुझे मां की तरह गोद में ले ले
    दिन भर की मशक़्क़त से बदन टूट रहा है
    तनवीर सिप्रा

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    दूर रहती हैं सदा उन से बलाएं साहिल
    अपने मां बाप की जो रोज़ दुआ लेते हैं
    मोहम्मद अली साहिल

    इस लिए चल न सका कोई भी ख़ंजर मुझ पर
    मेरी शह-रग पे मिरी मां की दुआ रक्खी थी
    नज़ीर बाक़री (साभार/रेख्‍़ता)
    Published by:Naaz Khan
    First published: