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'मां के जवान होते ही दादी ने उसे कोठे पर बिठा दिया और मैं वहीं बड़ा हुआ'

News18Hindi
Updated: March 8, 2018, 2:04 PM IST
'मां के जवान होते ही दादी ने उसे कोठे पर बिठा दिया और मैं वहीं बड़ा हुआ'
तूने मेरी फोटो क्यों नहीं लगायी

माँ का दूल्हा आगरा से था. वह आगरा का ताज महल दिखाने से रहा, अपने घर पर काम करवा कर कुछ सालों तक माँ को खटाया और खूब सताया. जब माँ जवान हुई तो उनकी सास ने उन्हें कोलकाता के एक कोठे पर बिठा दिया.

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मनीष गायकवाड़


एक बार जब मेरी माँ कोलकाता से मुंबई मुझसे मिलने आयी, तो उन्होंने मुझसे पूछा "ये कंप्यूटर- इंटरनेट पे कितने सारे लोगों की तस्वीरें आती हैं, तूने मेरी फोटो क्यों नहीं लगायी?" उन्हें लगा कि मैंने उनसे शर्मिंदा होकर उनकी तस्वीर अपने सोशल मीडिया पर शेयर नहीं कीं. मैंने इस बारे में कभी सोचा ही नहीं था, और क्योंकि मुझे सेल्फी लेने में ज़्यादा कुछ इंट्रेस्ट नहीं है तो वह बात बिना किसी प्रूफ के टल गयी.

माँ ने गिन-चुन के कुछ ही फोटो के लिए पोज़ किया है. उनके ज़िन्दगी का सबसे पहला फोटो शूट शायद तब का है जब उनकी शादी बचपन में करा दी गयी थी. तब उन्हें शायद यह होश भी नहीं था कि वह एक शादीशुदा औरत हैं.

उस फोटो को देख कर लगता है के उनकी उम्र 10 साल या उस से भी कम है. उस फोटो में उनके बगल में एक नौजवान आदमी खड़ा है. वह फोटोग्राफ एक स्टूडियो में लिया गया है, एक सबूत के तौर पर के वह शादी जायज़ है, हलाकि अगर सही नज़र से देखा जाए तो वह फोटोग्राफ एक सबूत है कि इस तरीके की शादी कानूनन जुर्म है. माँ की मांग में सिन्दूर, गले में मंगलसूत्र, और आँखों में एक जाना-पहचाना खालीपन है -उस बच्ची का जो यह पूछ नहीं सकती कि वह यहाँ क्या कर रही है, पूछ भी कैसे सकती है जब कोई अपना उसके पास है ही नहीं.



पुणे के कंजरभात समाज में जहाँ आज भी बेटियां मुसीबत का जड़ मानी जाती हैं, मेरी माँ एक ऐसे परिवार में जन्मी जिस घर में अनाज के दाने से ज़्यादा बेटियां पैदा हो गयी. बेटियों की लाइन इस उम्मीद में लग गई कि एक बेटे का सुख मिल जाए तो बच्चे-बनाने वाली मशीन यानी के मेरी नानी सांस ले सके.जब खाने को निवाला कम पढ़ने लगा तो तुरंत सब की शादी करा दी गयी. माँ का बनड़ा (समाज की भाषा में दूल्हा) आगरा से था. वह आगरा का ताज महल दिखाने से रहा, अपने घर पर काम करवा कर कुछ सालों तक माँ को खटाया और खूब सताया. उस दौर के बारे में जितना कम कहा जाए उतना कहना भी समझ लीजिए मुश्किल है दोहराना.

आगरा में जब माँ जवान हुई तो उनकी सास ने उन्हें कोलकाता के एक कोठे पर बिठा दिया. आगरा की काल कोठरी से कोलकाता की रंगीन गालियां ही सही. सास और बेटे का धंधा छोटी लड़कियों को ब्याह कर सोनागाछी में बेचने का था. पर माँ की किस्मत अच्छी निकली के वह नाबालिक नहीं रही. कोठे पर उन्हें नाचना और गाना सिखाया गया ताकि वह मुजरा कर सकें.

अपनी किस्मत से लड़ने की बजाये माँ ने उसे गले लगा लिया. जिस ने कभी स्कूल ना देखा हो, जिस ने अपना नाम का अक्षर तक न समझा हो, वह औरत अगर अपनी मर्ज़ी के खिलाफ ऐसी जगह पहुँच जाए जहाँ से निकलने का कोई सुराख न दिखे, तो वह वहां से भाग कर करेगी भी क्या? क्या आसान है उसके लिए एक इज़्ज़त की रोटी कमाना? क्या कंजरभात समाज खुद उसे सम्मान देकर एक नए सिरे से दूसरा मौका देगा? क्या लोग उसे अपने फैसले खुद करने देंगे?



ऐसा ना होके भी माँ ने अपने सारे फैसले खुद किये. अपने सम्मान और अपने परिवार वालों के सम्मान के लिए. उन्होंने कोठे पर काम कर के अपने परिवार वालों को उस माहौल से दूर रखा - अपने से छोटी बहनों को पढ़ाया, उनकी शादी करा कर उन्हें कोठे से बचाया. यहाँ तक की उनका छोटा भाई, जो नौ बेटियों के बाद पैदा हुआ, उसे पढ़ाया, लिखाया, उसकी शादी  करवा कर घर बसाया. यह सब कुछ एक ऐसी औरत ने किया जो इन सब खुशियों से महरूम थी - और शायद इसी वजह से वह इस का अर्थ और महत्त्व समझती है.

वर्ष1980 में जब हम कोलकाता के बउबाजार के कोठे में और मुंबई में कांग्रेस हाउस के कोठे में रहा करते थे तब वहां के कोठों का माहौल ऐसा था जहाँ ग़ज़लें गायी जाती थी, जहाँ कत्थक नाच मशहूर हुआ करता था, जहाँ गुंडे-मवाली कभी-कभार शराफत से पेश आते थे. उस माहौल को अच्छा नहीं समझा जाता था, पर मेरे लिए वह इस लिए बुरा नहीं था क्योंकि मैंने कोई और माहौल देखा ही नहीं था. कैसा होगा वो माहौल जहाँ हर चीज़ सही हो? मुझे जो दिखा वो गलत कैसे हो सकता है जब मैंने कुछ सही देखा ही न हो? जो मेरे घर में था फिर वो गलत कैसे हो सकता था?

मेरा ऐसा सोचना सही इसलिए भी था क्योंकि शिक्षा से ही एक बच्चे का दिमाग बढ़ता है और तब ही उस में समझ आती है – मैं यह  भी मानता  हूँ  कि  ऐसा  कहना  मेरे  लिए  आसान  है  – क्योंकि मैंने  खुद  इसे  समझ  लेना  आसान  बनाया  - यह हर किसी के बस की बात नहीं. मेरे साथ और भी बच्चे थे कोठे में पर सब का नसीब एक जैसा तो नहीं होता है - खुद बनाना पड़ता है - जो शायद मैंने तब किया जब माँ ने मुझे दार्जिलिंग के एक बोर्डिंग स्कूल में दाखिला दिला कर मुझे शिक्षित किया. जिस वजह से मुझे दोनों दुनिया को समझने की बुद्धि मिली. स्कूल में पढाई की, और घर पर पढ़ाई पर ही ध्यान दिया. जो कोठे के दूसरे बच्चे शिक्षा के बावजूद नहीं कर सके. पर इसमें उनकी उतनी ही गलती है, जितना कि समाज में जहाँ उनका कोई मोल नहीं. शायद मैंने बिना कुछ सोचे-समझे इस सोच को बदलने का प्रयास किया सिर्फ अपनी शिक्षा पर ध्यान दे कर.



घर में तबला, बाजा, घुंघरू, यह सब देख कर, सुन कर, मुझे बहुत शौक़ था के मैं भी नाचू, गाऊं, पर माँ को मुझ से एक ही लौ थी के मैं पढ़-लिख कर एक अच्छा इंसान बनूं. बढ़ते-बढ़ते, पढाई-लिखाई में इतना कुछ ख़ास तो नहीं निकला. कॉलेज तक तो बोर हो गया था पढाई से, मार्क्स बुरे आने लगे, पर तब तक खुद पर विश्वास हो चुका था. अंग्रेजी फट-फट बोल लेता हूँ, और लिखने का बहुत शौक़ है.

बचपन से मेरी एक ही ख्वाहिश थी कि मैं एक दिन एक किताब लिखूं. वह ख्वाहिश आज पूरी हो गयी है. मैं कई सालों से एक जर्नलिस्ट की नौकरी करता आया हूँ. मिड डे न्यूज़ पेपर, स्क्रॉल वेबसाइट, और द हिन्दू  न्यूज़ पेपर के लिए रिपोर्टिंग करता आया हूँ. अगले महीने मेरी ट्रैवल-फिक्शन नॉवेल “लीन डेज (Lean Days)” छप रही है - प्रसिद्ध प्रकाशन  हार्पर कॉलिन्स से.

यह सब इस लिए मुमकिन हुआ क्योंकि मेरी माँ ने मुझे पांच साल की उम्र में बोर्डिंग स्कूल में भर्ती किया, जहाँ मेरी फर्स्ट लैंग्वेज इंग्लिश रही. इंग्लिश एक मात्र ऐसी भाषा है जिससे हम पूरी दुनिया में अपनी बात पहुंचा सकते हैं, और  जिस  के  कारण माँ  का  फोटो  भी  इंटरनेट  पर  छप सकता  है.

बहरहाल, माँ और में, हम दोनों ही अपनी बात को पेपर/वेबसाइट के द्वारा आप सब तक अन्य भाषाओं (हिंदी, मराठी, उर्दू) में भी पहुंचा सकते हैं. यह ज़रूरी नहीं  की  हम सब की ज़बान एक ही हो, कहानियां हम सब की मिल -जुल के एक जैसी ही होती है. फ़र्क़ सिर्फ समझने में होता है, फर्क सिर्फ इंसानियत से होती है.

महिला दिवस के अवसर  पर  अगर  हम ऐसी  एक माँ  को  सलाम  करें  (जिस  का  नाम  अब  तक  मैंने  नहीं बताया , और  आप  ने  भी  नहीं  पूछा ), तो   यह  कहना  बिलकुल  सही  होगा  कि  हैं  तो सब मांएं  एक  जैसी  ही. मां से ऊंचा दर्जा और किस नाम में हैं?

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First published: March 8, 2018, 12:34 PM IST
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