Happy Mother's Day 2021 Poem: मदर्स डे पर मां से हैं दूर, मुनव्वर राणा की इन कविताएं से फील कराएं स्पेशल

मदर्स डे पर मां को दें कविताओं की सौगात

Happy Mother's Day 2021 Wish Mom With Poet Munawwar Rana Famous Poem- मदर्स डे पर लॉकडाउन के कारण अपनी मां से दूर भी हैं. ऐसे में क्यों न कविताओं के जरिए मां को स्पेशल फील कराया जाए?

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    Happy Mother's Day 2021 Wish Mom With Poet Munawwar Rana Famous Poem- आज हम सब मदर्स डे मना रहे हैं. इस ख़ास मौके पर कुछ अपनी मां के पास हैं तो कुछ लॉकडाउन के कारण अपनी मां से दूर भी हैं. ऐसे में क्यों न कविताओं के जरिए मां को स्पेशल फील कराया जाए? मुनव्वर राना उर्दू के वो मशहूर शायर जिन्होंने मां और बच्चों के पवित्र रिश्ते, प्रेम, लगाव, ममता और करुणा को बड़ी खूबसूरती के साथ अपनी कलम से उकेरा. मुनव्वर राणा की सबसे लोकप्रिय कविता 'मां' हैं. इस कविता को उन्होंने ग़ज़ल की शैली में ढाला है. मुनव्वर राणा को उनकी रचनाओं के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार,अमीर खुसरो पुरस्कार,मीर ताकी मीर पुरस्कार, गालिब पुरस्कार,डा जाकिर हुसैन अवॉर्ड और सरस्वती समाज पुरस्कार से नवाज़ा जा चुका है. मुनव्वर राणा ने कविता के लिए मां के मुकद्दस रिश्ते को चुना. एक जगह उन्होंने लिखा भी है कि-

    इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
    मां बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है.

    आज हम मदर्स डे पर आपके लिए लेकर आए हैं मुनव्वर राणा के मां पर लिखी कुछ ख़ास कविताएं कविताकोश और रेख्ता के सभार से...

    1. हँसते हुए माँ बाप की गाली नहीं खाते
    बच्चे हैं तो क्यों शौक़ से मिट्टी नहीं खाते

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    हो चाहे जिस इलाक़े की ज़बाँ बच्चे समझते हैं
    सगी है या कि सौतेली है माँ बच्चे समझते हैं

    हवा दुखों की जब आई कभी ख़िज़ाँ की तरह
    मुझे छुपा लिया मिट्टी ने मेरी माँ की तरह

    सिसकियाँ उसकी न देखी गईं मुझसे ‘राना’
    रो पड़ा मैं भी उसे पहली कमाई देते

    सर फिरे लोग हमें दुश्मन-ए-जाँ कहते हैं
    हम जो इस मुल्क की मिट्टी को भी माँ कहते हैं

    मुझे बस इस लिए अच्छी बहार लगती है
    कि ये भी माँ की तरह ख़ुशगवार लगती है

    मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू
    मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना

    भेजे गए फ़रिश्ते हमारे बचाव को
    जब हादसात माँ की दुआ से उलझ पड़े

    लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
    बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती

    तार पर बैठी हुई चिड़ियों को सोता देख कर
    फ़र्श पर सोता हुआ बेटा बहुत अच्छा लगा.

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    2. किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई

    मैं घर में सब से छोटा था मिरे हिस्से में माँ आई

    यहाँ से जाने वाला लौट कर कोई नहीं आया

    मैं रोता रह गया लेकिन न वापस जा के माँ आई

    अधूरे रास्ते से लौटना अच्छा नहीं होता

    बुलाने के लिए दुनिया भी आई तो कहाँ आई

    किसी को गाँव से परदेस ले जाएगी फिर शायद

    उड़ाती रेल-गाड़ी ढेर सारा फिर धुआँ आई

    मिरे बच्चों में सारी आदतें मौजूद हैं मेरी

    तो फिर इन बद-नसीबों को न क्यूँ उर्दू ज़बाँ आई

    क़फ़स में मौसमों का कोई अंदाज़ा नहीं होता

    ख़ुदा जाने बहार आई चमन में या ख़िज़ाँ आई

    घरौंदे तो घरौंदे हैं चटानें टूट जाती हैं

    उड़ाने के लिए आँधी अगर नाम-ओ-निशाँ आई

    कभी ऐ ख़ुश-नसीबी मेरे घर का रुख़ भी कर लेती

    इधर पहुँची उधर पहुँची यहाँ आई वहाँ आई .
    Published by:Bhagya Shri Singh
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