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Navratri 2019: नवरात्रि पर देवी मां के इस मंदिर का जरूर करें दर्शन, पूरी होगी मनोकामना

दंतेश्‍वरी देवी को बस्तर क्षेत्र की कुलदेवी का दर्जा प्राप्त है. यहां सच्चे मन से की गई मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं.

दंतेश्‍वरी देवी को बस्तर क्षेत्र की कुलदेवी का दर्जा प्राप्त है. यहां सच्चे मन से की गई मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं.

मान्यता है कि नवरात्रि के दिनों में मां के दर्शन और पूजन से विशेष फल मिलता है. इस समय मंदिर जाकर देवी मां के दर्शन करने से जीवन में सफलता मिलती है.

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    मां शक्ति के दर्शन के लिए किसी विशेष दिन की जरूरत नहीं पड़ती. मन में केवल आस्था और श्रद्धा का भा होना चाहिए. हालांकि नवरात्रि में देवी मां के दशर्न करने से भक्तों के मन को तो संतुष्टि मिलती ही है साथ ही मनोकामना भी पूरी होती है. मान्यता है कि नवरात्रि के दिनों में मां के दर्शन और पूजन से विशेष फल मिलता है. इस समय मंदिर जाकर देवी मां के दर्शन करने से जीवन में सफलता मिलती है. सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है. माता रानी के कुछ ऐसे मंदिर हैं जहां शारदीय नवरात्र में मां की विशेष कृपा पाने के लिए भक्‍तों की भारी भीड़ लगी रहती है. इस नवरात्रि पर अगर आप तीर्थयात्रा की योजना बना रहे हैं तो विशेष रूप से इन मंदिरों के दर्शन जरूर करें. यहां आकर आप अपनी मुरादों की झोली भर सकते हैं. इन्हीं में से एक मंदिर है मां दंतेश्‍वरी मंदिर.

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    मंदिर में सिले हुए वस्‍त्र पहनकर जाने की मनाही

    छत्‍तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में स्थित मां दंतेश्‍वरी मंदिर 52 शक्तिपीठों में से एक है. मान्‍यता है कि इस स्‍थान पर मां सती का दांत गिरा था. इसलिए इस जगह का नाम दंतेवाड़ा और मंदिर का नाम दंतेश्‍वरी मंदिर पड़ा है. आपको बता दें कि देवी मां के इस मंदिर में सिले हुए वस्‍त्र पहनकर जाने की मनाही है. यहां केवल लुंगी और धोती पहनकर ही देवी मां के दर्शन किए जा सकते हैं. दंतेश्‍वरी मंदिर शंखिनी और डंकिनी नदियों के संगम पर स्थित है. दंतेश्‍वरी देवी को बस्तर क्षेत्र की कुलदेवी का दर्जा प्राप्त है. यहां सच्चे मन से की गई मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं.

    दर्शानार्थी आस्था की जोत प्रज्वलित करते हैं

    संस्कृति और परंपरा का प्रतीक दंतेश्वरी मंदिर नवरात्रि में आस्था और विश्वास की ज्योति से जगमगा उठता है. देश एवं विदेश से मंदिर में आए दर्शानार्थी आस्था की जोत प्रज्वलित करते हैं. लाखों की संख्या में श्रद्धालु नवरात्रि पर यहां मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं. मान्यता है कि बस्‍तर के पहले काकातिया राजा अन्‍नम देव वारंगल से यहां आए थे. उन्‍हें दंतेश्‍वरी माता का वरदान मिला था. कहा जाता है कि अन्‍नम देव को माता ने वर दिया था कि जहां तक वह जाएंगे, उनका राज वहां तक फैलेगा. शर्त ये थी कि राजा को पीछे मुड़कर नहीं देखना था. माता उनके पीछे-पीछे जहां तक जाती, वहां तक की जमीन पर उनका राज
    हो जाता. अन्‍नम देव के रुकते ही माता भी रुक जाने वाली थीं.

    राजा के रुकते ही देवी मां भी वहीं रुक गईं

    अन्‍नम देव ने चलना शुरू किया और वह कई दिन और रात चलते रहे. वह चलते-चलते शंखिनी और डंकिनी नंदियों के संगम पर पहुंचे. यहां उन्‍होंने नदी पार करने के बाद माता के पीछे आते समय उनकी पायल की आवाज महसूस नहीं की. इसलिए वह वहीं रुक गए और माता के रुक जाने की आशंका से उन्‍होंने पीछे पलटकर देखा. माता तब नदी पार कर रही थीं. राजा के रुकते ही देवी मां भी वहीं रुक गईं और उन्‍होंने आगे जाने से इनकार कर दिया. दरअसल नदी के जल में डूबे पैरों में बंधी पायल की आवाज पानी के कारण नहीं आ रही थी.

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    मां दंतेश्वरी की षट्भुजा वाली मूर्ति अद्वितीय है

    पायल की आवाज नहीं आने से राजा को यह भ्रम हुआ कि शायद मां नहीं आ रही हैं और यह सोचकर वह पीछे पलट गए. तब से मां वहीं विराजमान हो गईं. मां दंतेश्‍वरी मंदिर के पास स्थित नदी के किनारे मां के चरण चिन्‍ह मौजूद हैं. नवरात्रि के दिनों में यहां दूर-दूर से भक्‍तजन दर्शन करने आते हैं. दंतेवाड़ा में काले ग्रेनाइट की मां दंतेश्वरी की षट्भुजा वाली मूर्ति अद्वितीय है. छह भुजाओं में दाएं हाथ की तीन भुजाओं में शंख, खड्ग, त्रिशूल और बाएं हाथ में घंटी, पद्म और राक्षस के बाल, मां ने धारण किए हुए हैं. मंदिर के मुख्य द्वार के सामने पर्वतीयकालीन गरुड़ स्तम्भ स्थित है. बत्तीस काष्ठ स्तम्भों और खपरैल की छत वाले महामण्डप, सिंह द्वार वाला यह मंदिर वास्तुकला का अनुपम उदाहरण है.

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