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विरोधों से न संस्कृत बचेगी, न बहुरंगी संस्कृति

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Updated: November 23, 2019, 1:17 PM IST
विरोधों से न संस्कृत बचेगी, न बहुरंगी संस्कृति
बीएचयू को बीएचयू बनाने में हिंदू और मुसलमान दोनों का आर्थिक और बौद्धिक योगदान रहा है.

आखिर संस्कृत मृतप्राय भाषा के मुहाने पर क्यों खड़ी हुई? आखिर वह कौन-सी ताकत थी जिसने देवों की भाषा को हाशिये पर ठेल दिया?

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  • Last Updated: November 23, 2019, 1:17 PM IST
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(अनुराग अन्वेषी)

संस्कृत देवों की भाषा रही है. यह बात मुझे क्लास सेवेंथ में मेरे संस्कृत के मास्टर ने बताई थी. उनकी छड़ी ने मुझसे देवः देवौ देवाः रटवाया था. दसवीं के बाद इस भाषा की जरूरत कभी नहीं पड़ी, नतीजतन दसवीं के बाद मैंने संस्कृत नहीं पढ़ी. कहने का मतलब यह कि संस्कृत हमारे स्कूली दिनों में ही शिक्षा केंद्रों तक सिमट कर रह गई थी. अब सोचता हूं कि अगर यह इतनी भी बची रह गई है तो इसकी वजहें क्या हैं?  बेहतर होगा कि पहले हम यह देखें कि आखिर संस्कृत मृतप्राय भाषा के मुहाने पर क्यों खड़ी हुई? आखिर वह कौन-सी ताकत थी जिसने देवों की भाषा को हाशिये पर ठेल दिया? जो भाषा अपने व्याकरण के स्तर पर इतनी मजबूत है, वह इतनी बेबस क्यों हो गई?

संस्कृत ने कालिदास जैसा महाकवि दिया
आज से 2500 साल पहले पाणिनि ने अष्टाध्यायी की रचना कर डाली. संस्कृत में लिङ्गानुशासनम् और जाम्बुवतीवजियम् जैसी अनमोल रचना दी. व्याकरण के नियम तय किए. इसी संस्कृत ने कालिदास जैसा महाकवि हमें दिया. फिर ऐसा क्या हुआ कि यह चमकीली भाषा अंधेरे में डूब गई. दरअसल, इसके पीछे एक बड़ी वजह रही कि इसे अतिविशिष्ट भाषा के तौर पर प्रचारित किया गया. शुद्धता और श्रेष्ठता के बोध ने इस भाषा को मारने का काम किया.

इसकी श्रेष्ठता को धार्मिक शुचिता के तौर पर प्रचारित किया
बदलते वक्त के साथ खुद को न बदलने की जिद में यह भाषा इस मुकाम पर पहुंची. इसके वैशिष्ट्य को पोषित करने वालों ने इसकी श्रेष्ठता को धार्मिक शुचिता के तौर पर प्रचारित किया. उन्होंने शंबूक को वेद पढ़ने की सजा दिलवाई. इस श्रेष्ठताबोध के आग्रह के सामने मर्यादा पुरुषोत्तम को झुकना पड़ा और यहीं से इस भाषा की जीवंतता हाशिये पर जाने लगी. शंबूक जैसे लोगों का जब इस खास वर्ग की भाषा पर पठन-पाठन का कोई अधिकार नहीं रहा तो जाहिर तौर पर उन्होंने अपने लिए नई भाषा गढ़ी.

इन दिनों फिर से संस्कृत चर्चा में है
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संस्कृत अपनी तमाम सरसता के बावजूद दुरूह प्रचलन के कारण बोझिल होती गई. धीरे-धीरे वेद से लेकर पाणिनि और कालिदास तक महज लोक-संवाद में याद किए जाने लगे. इन दिनों फिर से संस्कृत चर्चा में है. पर इस बार वह अपने व्याकरण या किसी ग्रंथ की विशिष्टता के कारण नहीं बल्कि भारत की बहुरंगी संस्कृति को हिंदुत्व के एकरंगे खांचे में डालने की कोशिश करने वालों के कारण चर्चा में है. दरअसल, काशी हिंदू विश्वविद्यालय यानी बीएचयू के संस्कृत संकाय में फिरोज खान नाम के एक मुस्लिम शिक्षक की नियुक्ति हुई है. इस संकाय के छात्रों का मानना है कि इस विभाग में गैर हिंदू शिक्षक की नियुक्ति नहीं होनी चाहिए.

छात्र कुलपति आवास के सामने धरना दे रहे हैं
उनकी मांग है कि उन्हें हटाया जाए. छात्रों की बात मानने से विश्वविद्यालय ने इनकार कर दिया है. विश्वविद्यालय का कहना है कि यह नियुक्ति नियम के तहत हुई है. हम भेदभाव नहीं कर सकते. इसके बाद छात्रों का आंदोलन अपनी धार पर है. ढोल-मजीरा लेकर वे कुलपति आवास के सामने धरना दे रहे हैं. बीते दिनों वहां हवन कुंड बनाकर हवन किया गया. बताया गया कि वह बुद्धिशुद्धि यज्ञ कर रहे हैं. इस आंदोलन के औचित्य के पक्ष या विपक्ष में सोचने से पहले हमें फिरोज खान के बारे में जानना चाहिए. फिरोज खान जयपुर के पास बांगरू के रहनेवाले हैं. उन्होंने संस्कृत में शास्त्री (ग्रैजुएशन), आचार्य (पोस्ट ग्रैजुएशन), शिक्षा शास्त्री (बीएड) की है.

2018 में संस्कृत में पीएचडी की डिग्री हासिल की
जयपुर स्थित राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान से उन्होंने 2018 में पीएचडी की डिग्री हासिल की. फिरोज खान के पिता रमजान खान खुद संस्कृत से स्नातक हैं. वे अपने आसपास के शहरों और गांवों में जा जाकर भजन और कीर्तन गाते हैं. बीएचयू के आंदोलनरत छात्रों का मानना है कि जो व्यक्ति उनकी भाषा और धर्म के आधार से नहीं जुड़ा है, वह उन्हें कैसे पढ़ा सकता है? संस्कृत भाषा से फिरोज खान के जुड़ाव को समझने के लिए उनका यह बयान काफी है कि वे कक्षा दो से संस्कृत पढ़ रहे हैं. आज की तारीख में वे जितना संस्कृत जानते हैं, उतना तो कुरान का भी ज्ञान नहीं है उन्हें.

मुस्लिम शिक्षक धर्म की शिक्षा कैसे दे सकता है
उनका कहना है कि जो लोग इस नाते प्रदर्शन कर रहे हैं कि मुस्लिम शिक्षक उन्हें धर्म की शिक्षा कैसे दे सकता है, उन्हें समझना चाहिए कि उनकी नियुक्ति संस्कृत विभाग में संस्कृत साहित्य के तकनीकी पहलुओं और बहुत प्रसिद्ध नाटक- अभिज्ञान शाकुंतलम्, उत्तर रामचरितम् और रघुवंशम् महाकाव्य और हर्षचरितम् महाकाव्य पढ़ाने के लिए हुई है, जिनका धर्म से कोई लेना-देना नहीं. वे मानते हैं कि वेद, धर्म शास्त्र, या ज्योतिष की शिक्षा देनी होती तो बेहतर होता कि मैं हिंदू होता. मेरी नियुक्ति तो साहित्य पढ़ाने के लिए हुई है, इसमें धर्म मुद्दा तो होना ही नहीं चाहिए था.

बीएचयू बनाने में हिंदू और मुसलमान दोनों का योगदान
छात्रों के इस विरोध प्रदर्शन के बीच हमें यह याद करने की जरूरत है कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय के निर्माण के वक्त मदन मोहन मालवीय को सातवें निजाम ने एक लाख रुपए का चंदा दिया था. यह ध्यान दिलाने का मकसद यह कि बीएचयू को बीएचयू बनाने में हिंदू और मुसलमान दोनों का आर्थिक और बौद्धिक योगदान रहा है. अब आते हैं उस सवाल पर कि संस्कृत अगर शिक्षा केंद्रों में बची रह गई तो आखिर क्यों? गौर करें तो संस्कृत देश के हिंदी प्रदेशों के स्कूलों और यूनिवर्सिटीज में पढ़ाई जाती है. दरअसल इसके पीछे हिंदी प्रदेश का वह छल है जो उसने देश की दूसरी भाषाओं के साथ किया.

हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में पूरा सम्मान मिले
देश में भाषा अध्ययन के मुद्दे पर त्रिभाषा सिद्धांत लागू किया गया था. इस त्रिभाषा सिद्धांत के तहत यह तय किया गया था कि भारत के हर क्षेत्र में बच्चों को तीन भाषाएं पढ़नी अनिवार्य होंगी. एक अंग्रेजी होगी, दूसरी मातृभाषा और तीसरी कोई अन्य भाषा. इस सिद्धांत का मकसद था कि हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में पूरा सम्मान मिले और अहिंदी प्रदेश की भाषाएं खुद को इसके सामने उपेक्षित महसूस नहीं करें. यह सिद्धांत अगर इसके मर्म के साथ लागू होता तो आज दक्षिण के लोग अपनी भाषा के साथ अंग्रेजी और हिंदी पढ़ रहे होते. पर इसके मर्म को चोट पहुंचाई हिंदी प्रदेशों की ओछी चालाकी ने.

आसान विकल्प संस्कृत को चुन लिया गया
हिंदी प्रदेशों ने भी त्रिभाषा सिद्धांत लागू किया जो आज तक चला आ रहा है, इसे लागू करने में सिर्फ यह छल किया गया कि तीसरी भाषा के रूप में अहिंदी प्रदेश की किसी भाषा को चुनने की जगह आसान विकल्प संस्कृत को चुन लिया गया. तो हिंदी प्रदेश के इस छल की वजह से संस्कृत इतनी भी बची रह गई है. हाल के दिनों में सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर कुछ ऐसे वीडियोज देखने को मिले हैं जिनसे यह ध्यान जाता है कि संस्कृत के चाहने वाले संस्कृत को लोक से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं.

गब्बर सिंह अमजद खान की आवाज में संस्कृत बोलता नजर आया
मसलन, शोले फिल्म के एक हिस्से को संपादित कर उसके संवाद संस्कृत में कर दिए गए. उस हिस्से में गब्बर सिंह अमजद खान की आवाज में संस्कृत बोलता नजर आया. इसी तरह कई चर्चित पुराने गीतों को उनकी ही धुन और आवाज में संस्कृत के बोल दिए गए. पर हमें यह समझने की जरूरत है कि संस्कृत भाषा में नई जान फूंकने के लिए मौलिक चिंतन की जरूरत है. नकल या हिंदुत्व के नाम पर विरोध के ऐसे तरीकों से न संस्कृत बचेगी न हमारी बहुरंगी संस्कृति.

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First published: November 23, 2019, 1:16 PM IST
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