अपना ही पति है- पीटता है तो क्‍या हुआ, प्‍यार भी तो करता है

पति प्‍यार करता है तो प्‍यार के एवज में थोड़ा-बहुत पीट भी ले तो क्‍या बुरा है. ये इस देश की 51 फीसदी औरतें कह रही हैं. पता नहीं, इतने सालों में औरतें कहां पहुंचीं. पीटने वाले मर्द जहां थे, वही हैं, बल्कि अब वो कबीर सिंह के रूप में हमारे हीरो बन गए हैं.

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: July 8, 2019, 12:30 PM IST
अपना ही पति है- पीटता है तो क्‍या हुआ, प्‍यार भी तो करता है
घरेलू हिंसा की शिकार औरतें
Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: July 8, 2019, 12:30 PM IST
ये सवाल सिर्फ औरतों के लिए–

1- क्‍या आपको मार खाना अच्‍छा लगता है?
2- क्‍या आपको पसंद है कि आपका पुरुष साथी आप पर शासन करे?
3- मर्द गुस्‍सैल हो, हिंसक हो, हाथ उठा दे तो आपको कोई शिकायत नहीं?

4- क्‍या आपको लगता है कि घर के कामों में लापरवाही हो तो आपकी पिटाई जायज है?
5- क्‍या आपको लगता है कि अगर आप पति के माता-पिता का अनादर करें तो आपकी पिटाई होनी चाहिए?
6- क्‍या आपको लगता है कि रिश्‍तों में बेवफाई आपको पीटे जाने की जायज वजह है?
7- क्‍या आपको लगता है कि आप सेक्‍स से इनकार करें तो पति को हक है कि वो आपको पीटे.

आप एक औरत हैं और ये सारे सवाल आपसे हैं. आपका जवाब क्‍या है? क्‍योंकि इस देश की 51 फीसदी औरतों का जवाब तो ये है कि उन्‍हें इन सारी वजहों से पीटे जाने से कोई शिकायत नहीं.

नेशनल फैमिली हेल्‍थ सर्वे-4 2014-15 की रिेपोर्ट ये कह रही है. 15 से 49 आयु वर्ष की 51 फीसदी औरतों का कहना है कि पति अगर अपनी पत्‍नी पर हाथ उठाता है तो ये कोई इतनी बड़ी बात नहीं कि जिसे लेकर बखेड़ा खड़ा किया जाए. इतना ही नहीं, औरतों ने इसकी जायज वजहें भी गिनाई हैं.



1- पति के माता-पिता का अनादर करना
2- घर के कामों में लापरवाही
3- बिना बताए घर से जाना या कोई काम करना
4- यौन संबंध बनाने से इनकार करना
5- रिश्‍तों में बेवफाई

इस देश की आधी से ज्‍यादा औरतों को लगता है कि इन सारी वजहों से पति उनको पीट सकता है और इसमें कोई बुराई भी नहीं है. मर्दों का हाल कम-से-कम औरतों से बेहतर है. उनके मुकाबले इस सर्वे में सिर्फ 42 फीसदी मर्दों ने औरतों के खिलाफ हिंसा को जायज ठहराया है.

ये तो हैं मोटा-मोटी आंकड़े. हालांकि इसकी डीटेलिंग और भी है. जैसेकि 37 फीसदी औरतों को लगता है कि सास-ससुर के साथ बुरा व्‍यवहार करने पर उन्‍हें पीटना जायज है, जबकि सिर्फ 29 फीसदी मर्दों को ऐसा लगता है. 33 फीसदी औरतों को लगता है कि अगर वो घर के काम ठीक से न करें, खाना न बनाएं और घरेलू जिम्‍मेदारियों के प्रति लापरवाह हों तो इस वजह से पति उन्‍हें पीट सकता है. जबकि सिर्फ 20 फीसदी मर्दों को ऐसा लगता है कि खाना न बनाने पर पत्‍नी को पीटा जाना चाहिए. 13 फीसदी औरतें ये मानती हैं कि यौन संबंध बनाने से इनकार करने पर भी उन्‍हें पीटा जाना सही है, जबकि सिर्फ 9 फीसदी मर्द सेक्‍स न मिलने पर औरतों को पीटने की बात करते हैं.



सिर्फ आंकड़ों की नजर से देखें तो दो और महत्‍वपूर्ण बातें हैं. ये आंकड़ा बताता है कि कौन सी औरतें घरों में ज्‍यादा पिट रही हैं.

जो औरतें 12 साल से ज्‍यादा स्‍कूल गई हैं यानी पढ़ी-लिखी हैं, उनमें से 18-19 फीसदी घरेलू हिंसा की शिकार हैं. जबकि जो औरतें जिंदगी में कभी स्‍कूल नहीं गई, उनमें से 41.3 फीसदी के साथ घरों में शारीरिक, मानसिक और भावनात्‍मक प्रताड़ना होती है.

जो औरतें अपने पतियों से डरती हैं, उनके साथ हिंसा ज्‍यादा होती है. पति से डरने वाली 58 फीसदी औरतों के पति उन्‍हें पीटते हैं, जबकि पतियों से न डरने वाली 32 फीसदी औरतें घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं.
नेशनल फैमिली हेल्‍थ सर्वे-4 की रिेपोर्ट तो सिर्फ अपने देश की कहानी बता रही है. लेकिन हम जानते हैं कि पूरी दुनिया में घरों में औरतें हमेशा से पिटती रही हैं और आज भी पिट रही हैं. हमारे पड़ोसी मुल्‍क पाकिस्‍तान में तो बाकायदा इस बात पर कानून बनाने की बात कही गई कि पत्नियों को कब, कहां, कैसे और कितना पीटना जायज है.

ऐसे में पति परमेश्‍वर का कभी-कभार हाथ उठा देना, थप्‍पड़ मार देना तो दाल-भात है. होता ही रहता है. किसी को नहीं लगता कि ये कोई इतनी बड़ी बात है. नेशनल फैमिली हेल्‍थ सर्वे की पिछली रिपोर्ट 2004-05 की थी, जिसमें 54 फीसदी औरतों ने कहा था कि गलती करने पर पति पीटे तो ठीक है. वो 2005 था. समाज तब और भी ज्‍यादा मर्दवादी था. घरों में पिताओं का हुकुम चलता था. दफ्तरों में औरतों की संख्‍या बहुत कम थी. घर की नई पीढ़ी की जिन बहनों, बहुओं, बीवियों ने नया-नया नौकरी करने और पैसे कमाने का चलन शुरू किया था, वो भी दफ्तर से घर आकर सीधे रसोई में घुसती थीं. वो पैसे कमाने वाला “मर्दों का काम” तो करने लगी थीं, लेकिन मर्द खाना बनाने और बच्‍चे पालने वाला “औरतों का काम” नहीं कर रहे थे. तब दुनिया ऐसी ही थी. न सोशल मीडिया था, न मीटू मूवमेंट. हिंदी सिनेमा में भी औरतों के अधिकारों की कोई बात नहीं होती थी. टीवी के विज्ञापन भी नहीं कह रहे थे कि कपड़े धोना सिर्फ औरत का काम नहीं.



तब 54 फीसदी औरतें अगर बोलीं कि उनको पीटना जायज है तो बात समझ में आती है. अगर कुछ समझ में नहीं आता तो ये कि दस सालों के लंबे सफर में ये संख्‍या 54 ये घटकर सिर्फ 51 ही हुई. जेंडर के सवाल पर इतना लिखे, बोले, लड़े जाने का सिर्फ इतना ही असर हुआ कि 3 फीसदी औरतों ने अपनी राय बदल ली. बाकी वहीं खड़ी हैं, जहां पहले खड़ी थीं.

क्‍या यही वजह है कि महानगरीय अपर-मिडिल क्‍लास से उठी कुछ फेमिनिस्‍ट आवाजों के सिवा ‘कबीर सिंह’ से किसी औरत को दिक्‍कत नहीं हुई. हीरो के हाथों पिटती हिरोइन इस तर्क से बचा ली गई कि हीरो उसे बहुत प्‍यार करता है. जैसे मेरी दादी कहा करती थीं कि अपना ही पति है, पीटता है तो क्‍या हुआ, प्‍यार भी तो करता है.

पति प्‍यार करता है तो प्‍यार के एवज में थोड़ा-बहुत पीट भी ले तो क्‍या बुरा है. अब ये दादी नहीं, इस देश की 51 फीसदी औरतें कह रही हैं. पता नहीं, इतने सालों में औरतें कहां पहुंचीं. सिर्फ 54 फीसदी से 51 फीसदी पर पहुंच पाईं. पीटने वाले मर्द जहां थे, वही हैं, बल्कि अब वो कबीर सिंह के रूप में हमारे हीरो बन गए हैं.

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